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बाल समय बदायूँ में काटो, घुटने चल कर काल निकारो,
बाप की बीमारी में, रही उपेक्षित, रो रो के घर उजारो,
बरेली आय के, साँस लई, नाना के घर में पग धारो,
कौन सो कष्ट सहो नहिं तुमने, पैदल ही स्कूल बिचारो.
सादा पास भयीं जब ही, अपनी भाषा को करो सुधारो,
कौन सो त्रास सहो नहिं तुमने, इंटर पास न भयो तुमारो,
पूरक परीक्षा से पिंड छुड़ायो, पर ठप्पा फेल को लग्यो सारो,
एम. ए. करके नौकरी करी, किसी तरह से करो गुजारो.
मुन्नी संग कानपुर जाय, गृहस्थी मां करो सुधारो,
मम्मी, विनय की सेवा कर, मजे में कुछ समय गुजारो,
प्रसव में ऋतु, सविता के, अपनी सेवा को करो उधारो,
शादी कर, पाले बच्चे, पति सेवा से लायो बहारो.
अफसोस रहो आज यही, जन्मदिन पर न विश लेय हमारो,
केहि बिधि संदेसो भेजूँ, हम नहिं बिरोधि तुमारो.
मजबूरी समझ तुम्हारी, हम कुछ उपाय न कर डारो,
बस घुट-घुट कर, रच गयो यह अष्टक हमारो.
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