सुदामा चरित - 60
सुदामा जिसे *कुचेला* के नाम से भी जाना जाता है, श्रीकृष्ण के बचपन के दोस्त थे, जिनकी कहानी कृष्ण से मिलने के लिए द्वारका की यात्रा का उल्लेख भागवत पुराण में किया गया है. सुदामा ने श्री कृष्ण और बलराम के साथ सांदीपनि ऋषि के आश्रम में शिक्षा पाई थी. ऋषि की पत्नी का नाम गौतमी या सुश्रूषा था. पास की एक गरीब बुढिया के घर से एक चोर ने कुछ चने चुराए थे, जिससे उसने यह श्राप दिया कि जो उन चनों को खाएगा, वह महा दरिद्र हो जाएगा.
पारलौकिक लीलाओं का आनंद लेने के लिए उनका जन्म एक अत्यंत गरीब व्यक्ति के रूप में हुआ था. सुदामा पोरबंदर के रहने वाले थे. उनकी पत्नी का नाम सुशीला था. उनके 4 पुत्र होने का उल्लेख मिलता है.
इन्हें पूर्व जन्म में श्रीदामा और फिर बाद में शंखचूड़ राक्षस का जन्म मिला था, जिसका वध शिव ने त्रिशूल से किया था. श्रीदामा तब कृष्ण के द्वारपाल थे, जब राधा जी से इनकी किसी गलतफहमी में श्रापों का आदान-प्रदान हुआ था. राधा ने उन्हें दानव योनि में जन्म लेने का तथा श्रीदामा ने राधा को कृष्ण से 100 वर्षों के वियोग के श्राप दिए थे.
इनकी साध्वी पत्नी वृंदा या तुलसी थी, जिसके सतीत्व और कृष्ण के भक्ति कवच के कारण वह अजेय था. उसके वध के लिए विष्णु ने उसका सतीत्व भंग करने का प्रयास किया था. इस कारण वृंदा ने उन्हें पत्थर का हो जाने का श्राप दिया था, जिसे आज शालिग्राम के रूप में पूजा जाता है, और उस पर तुलसी अर्पित की जाती है.
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राधा कृष्ण सदा रहे, कहता है इतिहास,
ध्यान पूर्वक भक्ति करो, समझो अपने पास.
पहले त्रेता युग से, श्रीदामा शिव भक्त,
द्वारपाल कृष्ण के, राधा राय विभक्त.
राधा होतीं क्रोध में, लो धरा दनुज रूप,
शंखचूड़ राक्षस बना, भूलोक कहे भूप.
उसकी निष्ठा कृष्ण में, अधिक रहा विश्वास,
हो वियोग सौ बरस का, कान्हा जी के साथ.
वृंदा या तुलसी कहो, पतिव्रता शंखचूड़,
कृष्ण कवच पति को मिला, ब्रह्मा अच्छे मूड.
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उसका वध संभव था, केवल शिव के हाथ,
वृंदा सतीत्व भंग हो, कवच नहीं हो माथ.
छल से विष्णु ले गए, वृंदा, कवच हरीश,
शिव ने उसका वध किया, बन ब्रह्मा वागीश.
पता चला जब मूल का, हरि पाहन बन जाय,
विष्णु ने तब वर दिया, वह तुलसी हो जाय.
विष्णु की हो उपासना, शालिग्राम के रूप,
वृंदा तुलसी बन गई, पूजन करते भूप.
त्रेता में केवट बने, लिया राम का नाम,
भव सागर पार भक्ति से, गए राम के धाम.
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अगले युग में मिल गया, उसे सुदामा नाम,
साथ रहा श्री कृष्ण का, जनम जनम का काम.
दाऊ भाई साथ में, ले चले पढ़ें श्याम,
संदीपनि आश्रम गए, क्षिप्रा नद तट धाम.
भेंट वहां पर हो गई, सखा सुदामा नाम,
सहपाठी मिल कर पढ़ें, सोना, रहना काम.
गुरुमाता थी गौतमी, सुश्रूषा अन्य नाम,
आश्रम में सेवा करें, श्याम सहित बलराम.
भोजन, रहना, साथ में, पाते शिक्षा धाम,
सारे बालक मिल करें, सभी वहां के काम.
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चोर गए इक बार में, गरीब महिला ग्राम,
चुरा लिए घर से चने, रखे गुरू के धाम.
जान हुए, चोरी चने, महिला देती शाप,
जो खाएगा वह चने, अति निर्धनता पाप.
मौसम वर्षा का रहा, बांधे साथ श्याम,
चले सुदामा साथ में, पीपल वृक्ष छाम.
भान सुदामा को रहा, मित्र ना हो गरीब,
सो सभी चने खा लिए, श्याम सबसे करीब.
भूखा रख कर कृष्ण को, किया बड़ा उपकार,
ओढ़ी स्वयं दरिद्रता, जीवन बनता भार.
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शिक्षा पा जीवन बढ़े, रहती यापन चाह,
भिक्षा से परिवार को, मिलती जीवन राह.
नाम सुशीला पत्नि का, चार पुत्र उल्लेख,
घोर गरीबी छा गई, यही भाग्य की रेख.
रहते उसके नगर में, कहें चक्रधर मीत,
राज दरबार में चले, दरबारी की रीत.
राजा के गुणगान से, उन्हें मिले पुरस्कार,
राय दी सुदामा वही, करी नहीं स्वीकार.
सुनी नहीं तारीफ जब, उसका कर अपमान,
बाहर कर दरबार से, घटी नहीं कुछ शान.
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अडिग भक्त भगवान के, रखते श्रद्धा भाव,
किसी तरह जीवन चले, पग-पग दिखे अभाव.
घर-घर करते याचना, बिन भोजन भरपेट,
शिक्षा सब को दे रहे, पा जाते कुछ भेंट.
धर्म-कर्म से चल रहा, निर्धन का संसार,
क्यों कर पूरी जरूरतें, कैसे करें गुजार.
भोग लगा कर श्याम को, लेते कुछ आहार,
मिली कभी भिक्षा नहीं, रहते बिन आहार.
सहन शक्ति थी गजब की, नहीं कहीं अफ़सोस,
कभी शिकायत ना करें, भूख से दिल मसोस.
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पत्नी सदा निभा रही, पति का अपना धर्म,
जीवन में जो कुछ मिला, उसके होते कर्म.
लाल तड़पते भूख से, दिल होता बेहाल,
पत्नी देती सलाह तब, मिलो कन्हैयालाल.
शैशव काल रहे सखा, आज बड़े सम्राट,
राज द्वारिका पर करें, देखें तुमरी वाट.
एक झिझक मन में रही, मतलब का है यार,
आया है कुछ मांगने, था संकोच विचार.
दे हवाला गृहस्थ का, पत्नी मांग उधार,
चावल मुट्ठी तीन ले, हो पड़ोस उपकार.
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चावल ले वह चल पड़े, मान पत्नी सुझाव,
फटेहाल यात्रा करें, मीत मिलन की चाह.
पत्नी आई छोड़ने, सीमा जब तक गांव,
काफी कष्ट मार्ग रहे, कृष्ण खेलते दांव.
बड़ा कठिन रास्ता रहा, बहुत द्वारिका दूर,
भेष बदल पहुंचा दिए, अपनी नगरी नूर.
फटे हाल मीत चले, करें श्याम से भेंट,
प्रजा जन उपहास करें, तंदुल रख कर टेंट.
संपन्न नगरी द्वारिका, आया गरीब द्वार,
सारे जन हैरान थे, ऐसा पहली बार.
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दर-दर सब से पूछता, कहां मिलेंगे श्याम,
अनदेखा कुछ कर रहे, कुछ पूछ रहे नाम.
उत्तर सब को दे रहा, शुद्ध हृदय से दीन,
द्वारपाल से कह रहा, मैं हूं प्यासा मीन.
दे दो उनको सूचना, आया उन का मीत,
वह मेरा साथी रहा, दिल में अप्रतिम प्रीत.
द्वारपाल आ कर कहे, मीत सुदामा नाम,
देर नहीं, दौड़े तुरत, छोड़े सारे काम.
कोई भेद नहीं रखा, गले मिल गए श्याम,
बाहों में समेट लिया, दो तन में इक जान.
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आई याद बचपन की, दोनों भाव विभोर,
खुशी चेहरे पर दिखी, लेता हृदय हिलोर.
साथ लिवा भीतर गए, अपने महल प्रवेश,
ससम्मान परिचय करा, भले दिखे दरवेश.
रानी सोलह सहस्त्र थीं, नाना थीं संतान,
आठ पटरानी रहीं, नहीं कहीं कुछ भान.
कान्हा पुकारें उन को, लो इनसे आशीष,
चरण स्पर्श कतार बना, दर्शन कर लो ईश.
एक एक कर आ रहीं, दें सुदामा अशीश,
कितनी बाकी और हैं, जान सकूं जगदीश.
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बोले श्याम मजाक में, सब अपनी हैं नार,
आएं बच्चे बाद में, रहो लुटाते प्यार.
पूछी कुशल भावज की, कर लो कुछ विश्राम,
झपकी पलक तंदुल को, छीन खाए घनश्याम.
माया से प्रभु खेलते, रचना को आदेश,
हो मैत्री बराबरी, हों समान भावेश.
कहा नहीं कुछ मीत से, दिया नहीं कुछ ज्ञान,
बिना मांगे बदल गया, कान्हा का वरदान.
अपने घर की वापसी, मन था बहुत उदास,
पत्नी भेजा द्वारका, रख कर ढेरों आस.
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लीला खेली श्याम ने, भेज पास के गांव,
पहचानी पत्नी नहीं, ना घर, बच्चे गांव.
थी सुदामा को हैरत, कान्हा करें कमाल,
मिलने गए गरीब थे, वापस मालामाल.
लख हाल पत्नी, सुत का, हुआ नहीं विश्वास,
बात सुशीला जब कहे, बढ़ी श्याम में आस.
चर्चा नहीं पुराण में, कब छोड़ा यह लोक,
आया काल चले गए, नहीं रहा कुछ शोक.
नाम सुदामा अमर था, भक्त बन गए यार,
महानता थी कृष्ण की, याद करे संसार.
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