Saturday, 26 September 2026

सुदामा चरित - 60



सुदामा चरित - 60

    सुदामा जिसे *कुचेला* के नाम से भी जाना जाता है, श्रीकृष्ण के बचपन के दोस्त थे, जिनकी कहानी कृष्ण से मिलने के लिए द्वारका की यात्रा का उल्लेख भागवत पुराण में किया गया है. सुदामा ने श्री कृष्ण और बलराम के साथ सांदीपनि ऋषि के आश्रम में शिक्षा पाई थी. ऋषि की पत्नी का नाम गौतमी या सुश्रूषा था. पास की एक गरीब बुढिया के घर से एक चोर ने कुछ चने चुराए थे, जिससे उसने यह श्राप दिया कि जो उन चनों को खाएगा, वह महा दरिद्र हो जाएगा. 
   पारलौकिक लीलाओं का आनंद लेने के लिए उनका जन्म एक अत्यंत गरीब व्यक्ति के रूप में हुआ था. सुदामा पोरबंदर के रहने वाले थे. उनकी पत्नी का नाम सुशीला था. उनके 4 पुत्र होने का उल्लेख मिलता है. 
   इन्हें पूर्व जन्म में श्रीदामा और फिर बाद में शंखचूड़ राक्षस का जन्म मिला था, जिसका वध शिव ने त्रिशूल से किया था. श्रीदामा तब कृष्ण के द्वारपाल थे, जब राधा जी से इनकी किसी गलतफहमी में श्रापों का आदान-प्रदान हुआ था. राधा ने उन्हें दानव योनि में जन्म लेने का तथा श्रीदामा ने राधा को कृष्ण से 100 वर्षों के वियोग के श्राप दिए थे.
  इनकी साध्वी पत्नी वृंदा या तुलसी थी, जिसके सतीत्व और कृष्ण के भक्ति कवच के कारण वह अजेय था. उसके वध के लिए विष्णु ने उसका सतीत्व भंग करने का प्रयास किया था. इस कारण वृंदा ने उन्हें पत्थर का हो जाने का श्राप दिया था, जिसे आज शालिग्राम के रूप में पूजा जाता है, और उस पर तुलसी अर्पित की जाती है.


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राधा कृष्ण सदा रहे, कहता है इतिहास,
ध्यान पूर्वक भक्ति करो, समझो अपने पास.

पहले त्रेता युग से, श्रीदामा शिव भक्त, 
द्वारपाल कृष्ण के, राधा राय विभक्त.

राधा होतीं क्रोध में, लो धरा दनुज रूप, 
शंखचूड़ राक्षस बना, भूलोक कहे भूप.

उसकी निष्ठा कृष्ण में, अधिक रहा विश्वास,
हो वियोग सौ बरस का, कान्हा जी के साथ.

वृंदा या तुलसी कहो, पतिव्रता शंखचूड़,
कृष्ण कवच पति को मिला, ब्रह्मा अच्छे मूड.
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उसका वध संभव था, केवल शिव के हाथ,
वृंदा सतीत्व भंग हो, कवच नहीं हो माथ. 

छल से विष्णु ले गए, वृंदा, कवच हरीश,
शिव ने उसका वध किया, बन ब्रह्मा वागीश.

पता चला जब मूल का, हरि पाहन बन जाय, 
विष्णु ने तब वर दिया, वह तुलसी हो जाय.

विष्णु की हो उपासना, शालिग्राम के रूप,
वृंदा तुलसी बन गई, पूजन करते भूप.

त्रेता में केवट बने, लिया राम का नाम,
भव सागर पार भक्ति से, गए राम के धाम.
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अगले युग में मिल गया, उसे सुदामा नाम,
साथ रहा श्री कृष्ण का, जनम जनम का काम.

दाऊ भाई साथ में, ले चले पढ़ें श्याम,
संदीपनि आश्रम गए, क्षिप्रा नद तट धाम.

भेंट वहां पर हो गई, सखा सुदामा नाम,
सहपाठी मिल कर पढ़ें, सोना, रहना काम. 

गुरुमाता थी गौतमी, सुश्रूषा अन्य नाम, 
आश्रम में सेवा करें, श्याम सहित बलराम.

भोजन, रहना, साथ में, पाते शिक्षा धाम,
सारे बालक मिल करें, सभी वहां के काम.
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चोर गए इक बार में, गरीब महिला ग्राम,
चुरा लिए घर से चने, रखे गुरू के धाम. 

जान हुए, चोरी चने, महिला देती शाप,
जो खाएगा वह चने, अति निर्धनता पाप.

मौसम वर्षा का रहा, बांधे साथ श्याम,
चले सुदामा साथ में, पीपल‌ वृक्ष छाम.

भान सुदामा को रहा, मित्र ना हो गरीब,
सो सभी चने खा लिए, श्याम सबसे करीब.

भूखा रख कर कृष्ण को, किया बड़ा उपकार,
ओढ़ी स्वयं दरिद्रता, जीवन बनता भार. 
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शिक्षा पा जीवन बढ़े, रहती यापन चाह,
भिक्षा से परिवार को, मिलती जीवन राह.

नाम सुशीला पत्नि का, चार पुत्र उल्लेख,
घोर गरीबी छा गई, यही भाग्य की रेख.

रहते उसके नगर में, कहें चक्रधर मीत, 
राज दरबार में चले, दरबारी की रीत.

राजा के गुणगान से, उन्हें मिले पुरस्कार,
राय दी सुदामा वही, करी नहीं स्वीकार.

सुनी नहीं तारीफ जब, उसका कर अपमान,
बाहर कर दरबार से, घटी नहीं कुछ शान.
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‌अडिग भक्त भगवान के, रखते श्रद्धा भाव,
किसी तरह जीवन चले, पग-पग दिखे अभाव.

घर-घर करते याचना, बिन भोजन भरपेट,
शिक्षा सब को दे रहे, पा जाते कुछ भेंट.

धर्म-कर्म से चल रहा, निर्धन का संसार,
क्यों कर पूरी जरूरतें, कैसे करें गुजार.

भोग लगा कर श्याम को, लेते कुछ आहार,
मिली कभी भिक्षा नहीं, रहते बिन आहार.

सहन शक्ति थी गजब की, नहीं कहीं अफ़सोस,
कभी शिकायत ना करें, भूख से दिल मसोस.
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पत्नी सदा निभा रही, पति का अपना धर्म,
जीवन में जो कुछ मिला, उसके होते कर्म.

लाल तड़पते भूख से, दिल होता बेहाल,
पत्नी देती सलाह तब, मिलो कन्हैयालाल.

शैशव काल रहे सखा, आज बड़े सम्राट,
राज द्वारिका पर करें, देखें तुमरी वाट.

एक झिझक मन में रही, मतलब का है यार,
आया है कुछ मांगने, था संकोच विचार.

दे हवाला गृहस्थ का, पत्नी मांग उधार,
चावल मुट्ठी तीन ले, हो पड़ोस उपकार.
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चावल ले वह चल पड़े, मान पत्नी सुझाव,
फटेहाल यात्रा करें, मीत मिलन की चाह.

पत्नी आई छोड़ने, सीमा जब तक गांव, 
काफी कष्ट मार्ग रहे, कृष्ण खेलते दांव.

बड़ा कठिन रास्ता रहा, बहुत द्वारिका दूर,
भेष बदल पहुंचा दिए, अपनी नगरी नूर.

फटे हाल मीत चले, करें श्याम से भेंट, 
प्रजा जन उपहास करें, तंदुल रख कर टेंट.

संपन्न नगरी द्वारिका, आया गरीब द्वार,
सारे जन हैरान थे, ऐसा पहली बार.
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दर-दर सब से पूछता,  कहां मिलेंगे श्याम,
अनदेखा कुछ कर रहे, कुछ पूछ रहे नाम.

उत्तर सब को दे रहा, शुद्ध हृदय से दीन, 
द्वारपाल से कह रहा, मैं हूं प्यासा मीन.

दे दो उनको सूचना, आया उन का मीत,
वह मेरा साथी रहा, दिल में अप्रतिम प्रीत.

द्वारपाल आ कर कहे, मीत सुदामा नाम,
देर नहीं, दौड़े तुरत, छोड़े सारे काम.

कोई भेद नहीं रखा, गले मिल गए श्याम,
बाहों में समेट लिया, दो तन में इक जान.
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आई याद बचपन की, दोनों भाव विभोर,
खुशी चेहरे पर दिखी, लेता हृदय हिलोर.

साथ लिवा भीतर गए, अपने महल प्रवेश,
ससम्मान परिचय करा, भले दिखे दरवेश.

रानी सोलह सहस्त्र थीं, नाना थीं संतान,
आठ पटरानी रहीं, नहीं कहीं कुछ भान.

कान्हा पुकारें उन को, लो इनसे आशीष,
चरण स्पर्श कतार बना, दर्शन कर लो ईश.

एक एक कर आ रहीं, दें सुदामा अशीश,
कितनी बाकी और हैं, जान सकूं जगदीश.
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बोले श्याम मजाक में, सब अपनी हैं नार, 
आएं बच्चे बाद में, रहो लुटाते प्यार.

पूछी कुशल भावज की, कर लो कुछ विश्राम,
झपकी पलक तंदुल को, छीन खाए घनश्याम.

माया से प्रभु खेलते, रचना को आदेश,
हो मैत्री बराबरी, हों समान भावेश.

कहा नहीं कुछ मीत से, दिया नहीं कुछ ज्ञान,
बिना मांगे बदल गया, कान्हा का वरदान.

अपने घर की वापसी, मन था बहुत उदास, 
पत्नी भेजा द्वारका, रख कर ढेरों आस.
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लीला खेली श्याम ने, भेज पास के गांव,
पहचानी पत्नी नहीं, ना घर, बच्चे गांव.

थी सुदामा को हैरत, कान्हा करें कमाल,
मिलने गए गरीब थे, वापस मालामाल.

लख हाल पत्नी, सुत का, हुआ नहीं विश्वास,
बात सुशीला जब कहे, बढ़ी श्याम में आस.

चर्चा नहीं पुराण में, कब छोड़ा यह लोक,
आया काल चले गए, नहीं रहा कुछ शोक.

नाम सुदामा अमर था, भक्त बन गए यार,
महानता थी कृष्ण की, याद करे संसार.
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Wednesday, 26 August 2026

कुंती चरित - 68




     कुंती चरित : -


द्वापर युग की बात है, प्रसिद्ध राजा भोज,
उनकी कन्या थी पृथा, पूजा करती रोज.

सेवा करती अतिथि की, श्रद्धा, भक्ति अपार,
रूपवती, गुण, सुन्दरी, सबका पाय दुलार.

अक्सर ऋषि आते दिखें, राजा जी के राज,
सेवा कुंती कर रही, पूरी निष्ठा, लाज.

एक बार की बात है, मिले दुर्वासा भोज.
स्वागत, सम्मान कर दिया, कुंती लाई खोज.

सेवा से प्रसन्न हुए, कुंती पाई मंत्र,
करे आव्हान किसी का, मिले देवता यंत्र. 
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आ कर कोई देवता, दे जाए आशीश, 
प्रसन्न कुंती हो गई, दर्शन की बक्शीश.

मंत्र परीक्षा सोच कर, हो जाती हैरान,
जांच करी यदि मंत्र की, जीवन में व्यवधान.

अनजाने में ले लिया, मंत्र का इम्तिहान, 
किया आव्हान सूर्य का, मिला पुत्र संतान.

मात बनी विवाह बिना, डर गई लोक लाज,
नहीं खबर घर में करी, क्या कहेगा समाज.

परेशान हो बंद कर, छोड़ा गंगा धार, 
हाथ लगा बहता हुआ, रथी वसुसेन पार.
------10
तेजस्वी सुत पल गया, राधा अधिरथ पूत,
दानवीर धनुर्धर को, बोलें कर्ण सपूत.

राज हस्तिनापुर रहा, शांतनु बने प्रधान,
शासक वीर प्रसिद्ध थे, आस पास में मान.

पीड़ा शांतनु काम की, मानी शर्त मल्लाह,
रही प्रतिज्ञा भीष्म की, नहीं करेंगे ब्याह.

चित्रांगद के अनुज रहे, विचित्रवीर्य नाम, 
नाविक पुत्री सुत मिले, गए अल्पायु राम.

वंश चलाने के लिए, किया अनुरोध व्यास,
अंबालिका व अंबिका, सुत थे पांडु धृतराष्ट्र.
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नेत्रहीन धृतराष्ट्र थे, रहे पांडु कमजोर,
दासी संतति विदुर जी, कहें राय पुरजोर.

गांधारी पत्नी रही, साथी बन धृतराष्ट्र,
पति से सहानुभूति में, पट्टी बांधी टाट.

भाई गांधारी रहा, शकुनि अनुज का नाम,
उसे कष्ट बहु भॉंति थे, बदला लेना काम.

नाना छल उसने रचे, बने पांडु  युवराज,
जीजा राजा ना बना, आदर नहीं समाज.

राज हस्तिनापुर दिया, पांडु एक ही नाम,
नहीं कहीं विरोध हुआ, नेत्रहीन की खाम.
------20
रचा स्वयंवर भोज ने, आए राजकुमार,
कृपा, आशीश भीष्म की, खुशियों की भरमार.

कुंती वरती पांडु को, डाला भीष्म प्रभाव,
रानी बन कर आ गई, दिखता नहीं अभाव.

माद्री भी पत्नी बनी, कुमारी मद्र देश,
भाई उसके शल्य थे, प्रिय थी गदा विशेष.

पिकनिक करते पांडु को, दिखे ऋषि रति विचार,
भूल पांडु से हो गई, ऋषि पर किया प्रहार.  

ऋषि ने श्राप पांडु दिया, कर न सकें सहवास,
यही कमी उसकी रही, बाधा बनी प्रवास. 
------25
कुंती संतति के लिए, मंत्र दुर्वासा जाप,
धर्मराज, पवनदेव दें, युधिष्ठिर, भीम आप.

इंद्र दिए वर रूप में, प्रिय अर्जुन संतान,
माद्री को भी कह सकी, आश्विनी आव्हान.

बहना माद्री ने जने, नकुल और सहदेव,
जुड़वां दोनों पल रहे, पिता पांडु थे देव.

वन विहार में पांडु को, चढ़ा काम आवेग,
माद्री थी सहवास में, शाप दिखाया नेग.

निधन पांडु का हो गया, माद्री माने दोष, 
सती हुई पति साथ में, कुंती करती रोष.
------30
राजा बन धृतराष्ट्र ने, मानी भीष्म सलाह,
शिक्षा सब को एक सी, गुरू द्रोण की राह.

सभी सुतों को पालते, रख उनमें सम भाव,
संतति सभी निपुण बनें, रहे ना कुछ अभाव.

एक ग्लानि मन में रही, इसका राजा अंध,
राय मान कर वह चले, लगे सदा प्रतिबंध.

कुंती भी स्वीकारती, सिंहासन धृतराष्ट्र,  
कोई नहीं विरोध था, दुर्योधन युवराज.

बेटा दुर्योधन चुना, अपना राजकुमार,
बड़े युधिष्ठिर को तजा, बिना किसी प्रतिकार.
----35
जलने दुर्योधन लगा, देख पांडव बुद्धि,
उसकी अकल घूम गई, पनपी जब दुर्बुद्धि. 

रही शत्रुता भीम से, दोनों गदा प्रवीर, 
विष मिलाया भोजन में, फेंका नदिया नीर, 

बेहोशी में भीम गए, तल नदिया पाताल,
नाग लोक स्वागत करे, उसकी थी ननिहाल.

दस सहस्त्र गज बल मिला, नाग लोक उपहार,
वापस आकर मात ने, खूब लुटाया प्यार.

मामा शकुनी रच रहे, कुरु वंश में प्रपंच,
नाना विधि से छल करें, नहीं तनिक भी रंच.
-----40
रचा स्वयंवर द्रुपद ने, अग्नि सुता का प्यार,
पांचों पाण्डव साथ में, लिए कन्हैया यार.

खुश खबरी दी मात को, लाए सुंदर चीज,
बिन देखे आदेश दे, बांट लो मिल अजीज.

पूरी बात पता लगी, मिले उसे पति पॉंच,
चाह द्रौपदी की रही, नाना गुण मिल साॅंच.

छीनें राज पांडव से, अपने पासे डाल,
बुला युधिष्ठिर को लिया, शौक द्यूत का पाल.

हारे पांडव द्यूत में, सारे भाई, राज,
लगी द्रौपदी दाॅंव पर, देखे सकल समाज.
-----45
सभी बड़े मौजूद थे, पर दिखते लाचार.
छल से हर कर शकुनि ने, किया गलत व्यवहार.

राज सभा में कर्ण ने, उस से कहा दुराव,
पहले से पति पांच हैं, छठा यार प्रस्ताव.

शर्त बदल कर उन्हें दिया, बारह साल प्रवास,
एक साल अज्ञात रहें, नहीं तो फिर प्रयास.

कुंती ने बनवास में, चुना सुतों का साथ, 
बच्चों को आशीश का, सिर पर रखती हाथ.

एक साल का बाद में, रहा अज्ञातवास,
विदुर किया अनुरोध तो, उसके घर में वास.
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बीत गया बनवास भी, नहीं पा सके राज, 
नहीं कुछ प्रतिरोध हुआ, धरता मौन समाज.

समझाने को चल दिए, शांति दूत बन श्याम, 
दिखा रूप विराट दिया, बना नहीं कुछ काम.

सेनापति पितामह थे, जानें कुंती राज,
वंचित कर्ण युद्ध रखा, दुर्योधन नाराज.

बाद पितामह द्रोण थे, योद्धा कौरव राज,
कर्ण वहां सैनिक बने, आहत पांडु समाज.

कौरव शिविर कुंती थी, घायल कर्ण इलाज,
नकुल सहदेव साथ ले, रूप चिकित्सक राज.
-----55
ममता अपने पुत्र की, सारे पुत्र समान, 
लोक लाज में ना कहे, बड़ा कर्ण को मान.

विनती करती कर्ण से, हते न उसके लाल,
अर्जुन केवल लक्ष्य है, शेष सुरक्षित काल.

माता कुंती एक दिन, गई कर्ण के पास,
राय इंद्र ने दी उसे, ऐसा था विश्वास.

इन्द्र छलते कर्ण से, कवच अभेद्य मांग,
भूल सब नि:शस्त्र गया, अर्जुन हरते प्रान.

तर्पण समर बाद करें, पूर्वज का युवराज,
कुंती तब घोषित करे, अनुज तुम धर्मराज.
----60
पूछें कुंती से सभी, कह देती वह राज, 
अग्रज कहती कर्ण को, पहना देते ताज.

राज महल में आ गई, दे पुत्रों को प्यार,
काफी समय बीत गया, सिंहासन परिवार. 

राय विदुर से मिल गई, जाएं तीरथ आप,
गांधारी धृतराष्ट्र भी, वन में धोने पाप.

ज्ञान युधिष्ठिर को दिया, विदुर हुए विलीन,  
राज कर्म पूरा हुआ, छोड़े गुरुजन तीन.

आग लगी वन वास में, तीनों लिए लपेट, 
कुंती तन का अंत हो, आत्मा मन का पेट.
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ममता की मूरत रही, कुंती उसका नाम,
नाम अमर इतिहास में, याद रखेंगे काम.

एक सीख ले लीजिए, जांच नहीं वरदान,
गलती अनजाने हुई, दुर्वासा अपमान.

करी जांच कुंती नहीं, सूर्य का आव्हान, 
महाभारत टल सकता, होनी है बलवान.
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Thursday, 16 April 2026

भागवत कथा चालीसा


भागवत कथा विवरण : -

कथा भागवत की हुई, मंदिर में इस बार, 
व्यास तिवारी जी बने, गणपति का उपकार.

मनोयोग से कर दिया, गीता का प्रचार,
अनिल जी ने बुला लिए, पंडित के अवतार.

प्रकाश जी ने प्रस्ताव दिया, वसंत जी ने समर्थन किया. 
संगीत साधक बुलवाए, फेसबुक पर कथा चलाए. 
सोनी कंपनी शान बढ़ाए, व्हाट्सएप पर धाक जमाए. 
भक्तों ने श्रद्धा दिखलाई, दो घर से यजमान बनाई. 
आठ अप्रैल को कलश रखा, भागवत श्रवण का पुण्य चखा.
सुबह देव, ग्रह‌ पूजन होता, पंडित जी का आशीश होता.
नौ तारीख से नियमित कथा, भागवत हरती मन की व्यथा.
सूत जी ने कथा सुनाई, सुनी परीक्षित मन लगाई.
भागवत का महत्व बताया, पाप पुण्य अंतर समझाया.
धुंधकारी ने पाप कमाए, गोकर्ण कथा कह धुलवाए.
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अपने पूर्वज याद कराए, उनमें श्रद्धा भाव जगाए.
रोज सुबह आरती गाएं, शाम को सब कथा सुन पाएं.
बीच में ध्यान लगाएं, अक्सर व्यास भजन सुनाएं.
भक्त भागवत में रम जाएं, साथ मिलकर ताली बजाएं .
उचित समय साथ गुनगुनाएं, मस्ती आए, नाच दिखाएं.
नर से कहीं कम नहीं नारी, झूम झूम कर नाचीं सारी.
सृष्टि सृजन की कथा सुनाई, सती का इतिहास बताई.
पति अवज्ञा परिणाम बताया, अपमान का बदला चुकाया.
सती का बलिदान बताया, वीरभद्र का दर्श कराया.
बालक ध्रुव का तप बतलाया, नारद जी का कार्य बताया.
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सब कुछ संभव कठिन तप से, एकनिष्ठ लक्ष्य से ध्रुव लसे.
भक्त प्रह्लाद की गाथा गाई, कष्ट सहन की विधि समझाई. 
विविध नरक की गति बतलाई, पुनर्जन्म व्यथा सह पाई.
गज ग्राह की कथा सुनाई, उनका पिछला जन्म बताई.
भक्ति ध्यान की महिमा गाई, नारायण ना देर लगाई. 
सब भक्तों को मोक्ष दिलाया, भव बंधन से मुक्त कराया.
सागर मंथन दृश्य दिखाया, वामन का वर्णन सुनवाया.
दान, वचन की महिमा गाई, लखी शुक्राचार्य चतुराई.
राम कथा संक्षेप में गाई, कृष्ण जन्म की कथा सुनाई.
मार कंस मुक्ति मात दिलाते, नाना को गद्दी पर बिठाते. 
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गोवर्धन का भ्रमण कराया, इंद्र को सही मार्ग दिखाया. 
भक्तों ने छप्पन भोग कराया, लीला से अवगत करवाया.
दानवों को मार गिराया, भक्तों को स्वलोक पहुंचाया.
महारास कर जग भरमाया, रुक्मिणी से विवाह रचाया.
सभी रानियों से मिलवाया, जरासंध का वध करवाया.
सखा सुदामा भाव सुनाया, कर्मफल से सबको चेताया.
भील बाण से तन तजवाया, देवलोक को गमन कराया. 
यज्ञ करा कर फल दिलवाया, परीक्षित को मोक्ष दिलाया.
सबको भागवत भोज कराया, लोगों में भक्ति भाव जगाया.
गर्व सनातन हमें बताया, हमें सही इतिहास बताया.

करते हैं हम कामना, कथा यहां हर साल,
सभी का सहयोग मिले, पा भागवत प्रवाल.

दायित्व सभी का रहे, दें अपना सहयोग,
खुश मन सबका बने, रहे न कोई रोग.








Monday, 23 February 2026

अश्वत्थामा चरित - 55


अश्वत्थामा चरित - माता कृपाचार्य की बहन कृपी और पिता द्रोणाचार्य. द्रोणाचार्य भारद्वाज ऋषि और घृताची अप्सरा के पुत्र थे. अश्वत्थामा सप्त चिरंजीवियों में से एक. अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, और परशुराम. 
माना जाता है कि ये दिव्य शक्तियों से संपन्न हैं और आज भी पृथ्वी पर मौजूद हैं. 

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मिले द्रोण भरद्वाज को, दिया पिता का नाम, 
बनी घृताची अप्सरा, उनकी माता नाम.

उनकी शादी कृपी से, कृपाचार्य थे भ्रात, 
सुत अश्वत्थामा हुआ, करे गरीबी बात.

मणि मस्तक पर थी लगी, दिखी जन्म के साथ , 
वीर महान बहुत रहा, सीख पिता के हाथ.

करती रक्षा वह सदा, दानव, किन्नर दैत्य, 
पिता उसे अजेय कहें, सबको जीते ध्येय.

सुत को दूध मिला नहीं, होते द्रोण निराश, 
हाल गरीबी देख कर, करें नौकरी आस.
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चावल घोल पिला दिया, छोटा लाल अबोध,
नहीं सामर्थ्य कुछ रही, हृदय अपराध बोध.

निर्धन बामन द्रोण थे, नहीं जीविका पास,
तब गुरु भाई भीष्म ने, दी जीवन की आस.

ब्राह्मण करता चाकरी, भीष्म राज दरबार,
शिक्षा को सम्मान दे, युवराज हुए उदार.

पा नाम देवव्रत का, बड़ा हुआ युवराज,
परशुराम शिक्षा दिए, योद्धा बना समाज. 

नाविक सुता सत्यवती, कर ले प्रणय विचार, 
शासक उसके लाल हो, मिले पहला अधिकार.
------10
भीष्म कहते ठान लिया, नहीं करूं मैं ब्याह,
उसके सुत जल्दी मरे, करी व्यास से चाह.

सहमत नहीं व्यास रहे, पर माता आदेश,
अंधे, दुर्बल सुत रहे, विदुर नीति संदेश.

कौरव, पांडव सुत हुए, शासन का अधिकार,
चुना भीष्म ने द्रोण को, शिक्षा का आधार.

राज सुतों के साथ ही, शिक्षा पाता लाल,
अस्त्र-शस्त्र वह सीखता, कोई नहीं मलाल.

द्रुपद राजकुमार रहे, पिता पृषत पांचाल,
कंपाला के राज का, पृषति होते लाल. 
------15
आश्रम भारद्वाज रहा, द्रुपद पाते ज्ञान,
शिक्षा पाते द्रोण भी, सहपाठी थे मान.

मीत दोनों द्रोण, द्रुपद, आश्रम में थे यार,
द्रोण बहुत गरीब रहे, द्रुपद राज कुमार.

बड़े हुए, अंतर मिला, राजा जनता साथ,
समझ उपेक्षा द्रोण ने, चढ़ा उपहास माथ.

वैरी बनते काल वश, कभी रहे जो मीत,
पद, वैभव, पैसा मिला, बढ़ा वैर जग रीत.

शिक्षण चुनते द्रोण तब, जीवन का आधार,
सीखें शासन लाल सब, भीष्म बृहत परिवार.
------20
शिक्षा सुत को भी दिए, शांतनु वंशज साथ,
भीम, युधिष्ठिर साथ में, दुर्योधन का हाथ.

सारी शिक्षा लाल को, सिखा दिया उपयोग,
ज्ञान सभी हथियार का, अनुपम शक्ति प्रयोग.

मीत बनाया हो युवा, कौरव राजकुमार,
पांडव से विवाद हुआ, जो शासन हकदार.

बड़ा तपस्वी वह रहा, पा ब्रह्मा वरदान,
नहीं किसी से मर सके, अद्भुत मणि का मान.

बहुत प्रेम करते पिता, उनका उस पर विश्वास,
मात पिता का लाड़ला, उससे जीवन श्वास.
-----25
राज नहीं पांडव मिले, ना माना युवराज, 
हारे कृष्ण समझा कर, होता चकित समाज.

युद्ध बिना कुछ भी नहीं, उसका सारा राज,
सेना ले कर कृष्ण से, छोड़ श्याम युवराज.

अश्वत्थामा भी लड़ा, कौरव सेना साथ, 
सेनापति भीष्म रहे, द्रोण, जयद्रथ हाथ.

चक्र व्यूह में फंस गया, एक अभिमन्यु वीर, 
योद्धा सात घेर लिए, हरते जीवन पीर.

द्रुपद सुत धृष्टद्युम्न था, पांचाली का भ्रात,
वह भी महाभारत में, लड़ता पांडव साथ.
-----30
कूटनीति थी कृष्ण की, मरवाया गजराज, 
अश्वत्थामा मर गया, कह रहे धर्म राज.

अश्वत्थामा पर टिका, पिता द्रोण विश्वास,
अर्धसत्य युधिष्ठिर कह, तोड़ी जीवन श्वास.

धृष्टद्युम्न सर काट कर, गुरू द्रोण का अंत,
बेटे ने बदला लिया, युद्ध बाद में हंत.

बाद द्रोण के कर्ण ने, पा सेनापति भार,
घोर लड़ाई वह लड़ा, गया मृत्यु के द्वार.

सत्रह दिन में युद्ध का, अंत कर्ण के साथ,
शल्य, शकुनि को भी मिला, सेना नायक हाथ.
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नायक अगले दिन बने, अर्जुन के गुरु भ्रात,
युद्ध भयंकर हो रहा, बचे चार ही साथ.

अश्वत्थामा को मिली, रण की बुझती जोत, 
व्यापक विचित्र शांति थी, नाच रही थी मौत.

समर भूमि में शव दिखें, रहे कभी थे वीर,
प्राण छोड़ कर चल बसे, थे निर्जीव शरीर.

हाल समर का देखता, बर्बरीक का शीश,
उसे काट लटका दिया, दे अपना आशीश. 

दुर्योधन तब कर रहा, प्रायश्चित इतिहास,
पांडव अब होंगे मगन, रहे विजय अहसास.
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नेता गड़ता शर्म से, चला नदी विश्राम,
श्वास रोक आसन लिया, जल समाधि अभिराम.

याद प्रतिज्ञा को करे, सौ कौरव संहार,
भीम ने निर्देश लिए, माधव का उपकार.

गदा युद्ध ललकार कर, भीम करते प्रहार, 
दुर्योधन विकलांग कर, बना दिया लाचार. 

अश्वत्थामा मित्र को, दिया वचन इस बार,
मैं पांडवों से ले लूं, आज रात प्रतिकार.

विजय रात्रि को चल दिए, कृष्ण नदी के तीर,
पांडव दें श्रद्धांजली, हते समर में वीर.
------
सोए थे उस रात को, सब पांडव संतान,
शिविर में गैर हाजिरी, दिखते पिता समान.

धृष्टद्युम्न को मार कर, चला शिविर की ओर, 
पांचों पांडव सुतों के, शीश काट कर भोर.

पता लगा जब भ्रम हुआ, उसको होता खेद,
लक्ष्य हुआ पूरा नहीं, दिखा नहीं कुछ भेद.

लौटे पांडव शिविर में, देखा हाहाकार,
उलटे पैर निकल पड़े, किस का अत्याचार.

समझाया जब कृष्ण ने, अश्वत्थामा कृत्य,
जब तक मणि मस्तक रहे, गुरु पुत्र नहीं वध्य.
-----50
दोषी पांचाली रहा, उसे दंड अधिकार,
जीवित कृपी पुत्र रहे, माता का चीत्कार.

सबकी यह सहमति बनी, मस्तक मणि निकाल,
घायल कर छोड़ा उसे, क्रन्दन हो विकराल.

वह तभी से घूम रहा, सहता सारी पीर,
दें कर जीवन द्रौपदी, कष्ट दिया गंभीर.

अब वह मर सकता नहीं, हो गया चिरंजीव,
अद्भुत एक वीर हुआ, पाया विचित्र नसीब.

गणना उसकी सात में, बलि, व्यास, परशुराम,
कृपा, हनु, विभीषण सहित, अश्वत्थामा नाम.
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Wednesday, 4 February 2026

जामवंत चरित - 57



जामवंत चरित - 57 

  जामवंत को ब्रह्मा का अंशावतार और अग्नि पुत्र कहा जाता है, जिन्हें अमर होने का वरदान प्राप्त था. सतयुग में वामन अवतार, त्रेता युग में राम और द्वापरयुग में कृष्ण जी के काल में उनकी उपस्थिति का उल्लेख है. इन्हें *ऋक्षराज* भी कहा जाता है. यह भी कहा जाता है कि वह ब्रह्मा जी की जमुहाई से उत्पन्न हुए थे, और बहुत बलवान थे. वह अग्नि देव और गंधर्व कन्या के पुत्र कहे जाते हैं. उनकी पत्नी का नाम जयवंती था. जामवंती उनकी पुत्री थी, जो बाद में श्री कृष्ण की पत्नी बनीं. नारद और हिमवत उनके भाई कहे जाते हैं.


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ब्रह्मा की संतति हुए, मानव में भगवंत,
मिला नाम संसार में, सब कहें जामवंत.

दैवी पुरुष बोल कर, सब करते सम्मान,
अष्ट चिरंजीवी गिनें, दीर्घायु वरदान. 

ब्रह्मा जमुहाई लिए, प्रकट हुई संतान,
रूप विलक्षण मिल गया, इस वेश भगवान.

माता जयवंती कहें, नारद, हिमवत भ्रात,
भालू लगते सभी को, रही सोच अज्ञात.

ऋक्षराज बन हो बड़े, जग में करते नाम,
त्रेता, द्वापर युग रहे, बने भक्त प्रभु राम.
----5
कहते अग्नि देव पिता, अति बली जन्म जात, 
मात कहें गंधर्व को, सुनी सुनाई बात. 

अधिक आयु थी राम से, कहते वानर जात,
वेद, शास्त्र, पुराण के, ज्ञाता रहे विख्यात.

कहते अमर उन्हें सभी, युगों में योगदान,
लोहा उनका मानते, कहें सभी विद्वान.

सतयुग के भी मिल रहे, आज भी कुछ प्रमाण, 
किस्से उनके तेज के, करते सब सम्मान.

रहे उपस्थित यज्ञ में, कराते असुर राज, 
पौत्र रहे प्रह्लाद के, बालि यजमान आज. 
----10
भांपा अपनी बुद्धि से, वामन का वरदान,
सब देवों का हो भला, असुरों का कल्यान.

वामन ने दो पग रखे, मांग बालि से दान,
तब तक जामवंत करें, धरा के सात ध्यान.

चक्र सात में नख लगा, महामेरु शीर्ष पाप,
शिखर भंग जब हो गया, दिया बलहीन श्राप,

अनुपम बल उनका कहे, नहीं उचित अभिमान,
फौरन बूढ़े बन गए, लिया बुद्धि प्रतिदान.

द्वापर युग में महान था, प्रभु राम का नाम, 
उनको भी सहयोग दे, कुछ यादगार काम.
----15
जामवंत उसको मिले, करें समझ की बात,
बनते सचिव सुग्रीव के, हर उसका आपात.

मयदानव का पुत्र था, रहा दुंदुभी नाम,
भाई था मंदोदरी, आतंकी बदनाम.

गज दस हज़ार का बली, रखता भैंसा रूप,
तप कर शिव से वर लिया, था अभिमान अनूप.

सागर व हिमवान ने, उकसाया अभिमान,
समर बालि से वह करे, तभी बढ़ेगी शान.

मुष्टिक एक प्रहार कर, बालि ने किया अंत,
शव उस का उछाल दिया, फेंका आश्रम संत.
----20
आश्रम रहा मतंग का, रिष्यमूक आधार, 
श्राप बालि को ऋषि दिया, निषिद्ध योजन चार.

बालि के गलत कोप से, थे सुग्रीव भयभीत,
लिया लाभ तब श्राप का, जा कर बसे सप्रीत.

ऋषि आश्रम में सेविका, शबरी उसका नाम,
कहें मतंग अंत समय, सेवा करना राम.

कहना तब तुम राम से, गमन गिरि रिष्यमूक,
हो सुग्रीव से मित्रता, करो प्रयास अचूक.

जामवंत उसको मिलें, करें समझ की बात,
जो हों सचिव सुग्रीव के, हर उसका आपात.
----25
बल, बुद्धि के योग रहे, ऋक्षराज जामवंत, 
धैर्य सहित थी वीरता, बात कहें श्रीमंत.

मंत्री बने सुग्रीव के, मिला साथ हनुमान, 
बाली को प्रवेश नहीं, रिष्यमूक का स्थान.

सीता को हर ले गया, रावण दैत्य महान,
राम लखन थे खोजते, वन बाग परेशान.

घटनाएं घटीं उसी तरह, विधि जो रचा विधान, दर्शन शबरी को हुए, ज्यों पा ली भगवान.

शबरी से मिल कर बढ़े, रिष्यमूक की राह, 
मार्ग में हनुमान मिले, दर्शन जिनकी चाह.
----30
बाली वध के बाद में, राजा बने सुग्रीव,
जामवंत को सचिव चुन, सीता सुध संजीव.

वानर सेना साथ में, ले कर जटायु राय,
दक्षिण में वह सब चले, सागर तट पर आय.

सागर देखा सामने, सेना हुई हताश,
पार उसे कैसे करें, जामवंत की आश.

देखा तब हनुमान को, कर साहस संचार,
क्षमता याद दिला उन्हें, कर लो सागर पार.

ऊर्जा बचपन में दिखी, गुरु जन थे हैरान,
शाप क्रोध में तब दिया, शक्ति भूल हनुमान.
----35
विनती करते केसरी, कम प्रभाव हो जाय, 
वापस उसे शक्ति मिले, कोई याद दिलाय.

जामवंत ने तब कहा, जीवन का उद्देश्य,
अर्पित राम काज करो, एकमात्र हो ध्येय.

सागर पार कूद चले, लंका में हनुमान,
सीता मिल, लंका जला, रखा विभीषण मान.

वानर लंका जा सकें, रचना सेतु उपाय, 
जामवंत ने तब कहा, पूजन हित आचार्य.

पहले पूजा कर सकें, लंकेश इंतजाम,  
जामवंत लाए बुला, सफल किया अंजाम.
-----40
युद्ध राम से जब हुआ, वीर भिड़ा लंकेश, 
रावण मूर्छित हो गया, मुष्टिक एक संदेश.

अधिक आयु के बाद भी, उसकी शक्ति अपार,
चाह अधूरी रह गई, देखे रावण हार.

समझ राम फौरन गए, शेष अभी अभिमान.
द्वापर युग में लड़ सकें, दिया उन्हें वरदान.

लंबी आयु उन्हें मिली, निरखी लीला राम,
त्रेता से द्वापर हुआ, जीवन था निष्काम.

सत्राजित राजा रहे, द्वापर युग में खास,
सूर्य देव के भक्त थे, पा स्यंतक मणि पास.
-----45
मणि देती सोना उसे, हर दिन तोला आठ, 
जीवन में अभाव नहीं, बड़े निराले ठाठ.

रक्षा प्रसेनजित करें, सत्राजित के भ्रात, 
उस मणि को देखें सदा, रखते अपने साथ.

एक दिन शेर ने किया, उस का काम तमाम, 
गया खोह में मणि लिए, जामवंत के धाम.

जामवंत ने मणि लखी, दिया सुता उपहार,
मणि को खिलौना समझा, जामवंती बहार.

भाई की हत्या सुनी, सत्राजित आरोप,
मणि चुराई कृष्ण ने, मोह स्वर्ण का कोप.
----50
धन का था अभाव नहीं, व्यर्थ लांछन श्याम,
खोजा मणि को खोह में, करो नहीं बदनाम.

जामवंत से भिड़ गए, पूर्व जन्म के राम, 
दिन अठाइस समर चली, पूरी इच्छा काम.

अंत में पहचान लिया, श्याम राम के रूप,
शरण का निवेदन किया, सुता नहीं अनुरूप.

अपनाई जामवंती, दिए अनेकों तर्क,
बड़ी तो रुक्मिणी रही, उससे रखा न फर्क.

मणि वापस सत्राजित को, नहीं करी स्वीकार,
बेटी सत्यभामा दे, मणि अद्भुत उपहार.
----55
दोनों रानी श्याम की, मणि का बनता फेर, 
नहीं अभाव स्वर्ण कभी, काल चक्र अंधेर.

लोग आज भी कह रहे, जामवंत बलवान,
बीच हमारे रह रहे, अदृश्य रूप भगवान.
------57

Wednesday, 10 December 2025

उर्मिला चरित - 62

  
    उर्मिला चरित - 62

उर्मिला लक्ष्मण (शेषनाग के रूप) की पत्नी, सीता की छोटी बहन व राजा जनक व सुनयना की बेटी थी. जनक के छोटे भाई कुश ध्वज थे, जिनकी पत्नी चंद्रभागा व पुत्रियां मांडवी व श्रुति कीर्ति थीं. वह सांकस्य के राजा थे. उन्हें नागलक्ष्मी या क्षीरसागरा का अवतार भी कहते हैं. उनका जन्म जया एकादशी को हुआ था.
     रामायण समाप्त होने पर सीता, मांडवी व श्रुति कीर्ति के जाने के बाद उर्मिला ने बच्चों को अच्छे संस्कार दे कर सरयू में समाधि ली थी. अंगद व चंद्र केतु उसके पुत्र थे. अंगद को करुपाधेश राज्य का राजा बनाया गया था. चंद्रकेतु को माल्या राज्य का राजा बनाया गया था. 
    संवेदनशीलता, दयालुता, आत्म-समर्पण, शांत स्वभाव, सकारात्मकता, आत्मविश्वास, रचनात्मकता, मंजूरी देने की क्षमता, निष्ठा व अपेक्षा उसकी चारित्रिक विशेषताएं हैं. 
   
------
पढ़ते हम इतिहास में, चार युगों का काल,
सतयुग, त्रेता, द्वापर के, बाद कलियुग धमाल.

त्रेता काल विशेष है, सभी करो अभिमान, 
मिथिला नगरी के हुए, राजा जनक महान.

बड़े तपस्वी जनक थे, धन दौलत से दूर, 
नहीं कष्ट कोई सहे, ना कोई मजबूर.

उनकी रानी सुनयना, चाहे इक संतान,
दो बेटी उनको मिलीं, सुंदर रूपवान.

नाम बड़ी का जानकी, बाद उर्मिला जान, 
साथ रहीं, युवती बनीं, थीं बहुत बुद्धिमान.
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पाख उजाला माघ का, जया इकाशी बोल, 
सीता भगिनी उर्मिला, रखें बात का मोल.

क्षीरसागरा भी कहें, दूजा उसका नाम,
नागलक्ष्मी कहें उसे, परिचय बोले काम.

जनक अनुज कुशध्वज रहे, राज करें सांकस्य, 
बेटी उनकी मांडवी, बहन श्रुतिकीर्ति तस्य.

चारों बहनें साथ में, विदुषी एक समान,
शिक्षा ज्ञान था एक सा, होती साथ जवान.

बड़ी हुईं, चिंता बढ़ी, करते जनक विचार,
कौन, कहां, कब वर मिले, शादी को तैयार.
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दशरथ राजा अवध के, पाए चार कुमार,
लछमन, शत्रुघ्न भ्रात थे, भगवन, भरत उदार.

दशरथ से ऋषि मांगते, उनके राजकुमार,
तप में उनकी हो मदद, दानव का संहार.

पुत्र प्रेम दशरथ रहा, मन में था विषाद,
दी राय गुरु वशिष्ठ ने, भर पाया आह्लाद.

आए मिथिला राज में, विश्वामित्र के साथ,
राम, लखन सुत अवध से, रहे जगत के नाथ.

सीता हित स्वयंवर था, हो भंग शिव पिनाक,
वरण करे, वह सफल हो, रखे जनक की नाक.
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आमंत्रित मिथिला रहे, सब जगह के कुमार, 
अवसर पाया राम ने, किया जनक उद्धार.

दशरथ आए अवध से, ले पूरी बारात,
देख भरत सौमित्र को, हृदय न प्रेम समात.

चार भाई देख कर, करते जनक विचार,
बन जाएं यह वर अगर, मेरा हो उद्धार.

पहले समय रही प्रथा, गुरु सुझाव स्वीकार, 
राजा भी मानें उसे, करें नहीं इनकार.

सहमति दशरथ की हुई, मिथिला हर्ष अपार,
चारों बहनें खुश दिखें, आपस बढ़ता प्यार.
------20
सीता मिलती राम को, उर्मिला लखन पास,
रही भरत की मांडवी, अनुज श्रुति कीर्ति दास.

चारों बहनें आ गईं, साथ अयोध्या धाम,
दशरथ तो राजा रहे, रहे युवराज राम.

मिल जुल कर सब रह रहे, हुआ सुखी परिवार,
जनता भी खुशहाल थी, उचित सभी व्यवहार.

काल चक्र ऐसा चला, हुआ सब उलट फेर,
कैकेई मत्थे चढ़ा, घटनाओं का शेर.

दशरथ के लंबित रहे , दो वरदान उधार,
समय देख कर मांगती, राम करें वन प्यार.
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चौदह वर्ष जंगल में, सुत हो राजकुमार,
हामी भरी मजबूर हो, पिता वचन का प्यार.

सीता पति के संग थी, भाई लखन उदास,
पत्नी देखूं या करूं, सद्विचार का नास.

मलिन उर्मिला थी नहीं, मुख दिखता उत्साह, 
प्रसन्न मन से दूं विदा, दिल की थी यह चाह.

कारण उसको ज्ञात था, क्यों पाया अवतार,
साधारण नारी नहीं, स्वागत को तैयार.

आए स्वामी भुवन में, दिखा थाल में दीप,
उत्साहित थी उर्मिला, लगता लक्ष्य समीप.
------30
आशा और विश्वास से, लखन मांगते नीर,
पत्नी की सहमति मिली, भूले सारी पीर.

जल लिए उर्मिला सुने, चौदह वर्ष इंतजार,
फौरन पा उठ चल पड़े, वन गमन समाचार.

एक कहानी यह कहे, था उर्मिल कर नीर,
चौदह वर्ष खड़ी रही, हरती भव की पीर.

मिले कथा इतिहास में, मेघनाद वरदान,
जागा चौदह वर्ष जो, बिना नींद आव्हान.

नींद उर्मिला पा गई, लखन नींद के साथ, 
सोती थी सारे समय, हो नाश मेघनाथ. 
-----
जाग रहे प्रभु भक्ति में, दिया नींद को त्याग,
अविरल सेवा वह करें, सदा राम का राग.

हरण जानकी का हुआ, बुला मारीच राम,
लंकापति रावण धरा, साधु वेश अभिराम.

सीता को थे खोजते, दोनों भाई खिन्न, 
शबरी मिलती मार्ग में, दोनों हुए प्रसन्न.

पता मिला हनुमान का, मदद करें सुग्रीव, 
जामवंत की विद्वता, सेना बने सजीव.

बालि मार कर चल पड़े, सीता जी की खोज,  
रामेश्वर सेतु बना, भरते सेना ओज.
-----40
मेघनाद ने तप किया, पाई शक्ति अचूक,
समर भूमि में लखन पर, वीर घातिनी मूक.
 
गिरे लखन रण भूमि पर, मचता हाहाकार,
चाहा ले चलूं इसको, करें पिता जयकार.

राम दुखी हो कर रहे, भीषण रुदन, विलाप,
रखा लखन सिर गोद में, कह दो उपाय आप.

राय विभीषण से मिली, हनुमत कहें सुषेन,
फौरन दो संजीवनी, बीत न पाए रैन.

हनुमत भेजें राम ने, लाओ बूटी द्रोण,
पूरा पर्वत उठा ले, उड़े अवध की ओर.
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हनुमत उड़ते देख कर, करते भरत विचार,
कहीं निशाचर रात में, अद्भुत करे विहार.

उसे गिराने के लिए, भरत छोड़ते तीर,
राम राम कह घायल हुए, उड़ते हनुमत वीर.

पीड़ा में ही कह गए, घटना क्रम इतिहास,
दुखी अवध जनता हुई, माता का विश्वास.

ढाढस भेजें राम को, भेजूं दोनों भ्रात,
दिखा विश्वास उर्मिला, करें विश्राम तात.

लखन अहित संभव नहीं, मम पतिव्रत महान, 
उनका सिर प्रभु गोद में, यह है उनकी शान.
-----50
सूर्योदय होगा नहीं, ना बीते यह रात, 
दो दिवस आराम करें, चिंता की क्या बात.

समझी पति की वेदना, रहा समय आभास,
फिर भी मन में दिख रहा, गजब आत्म विश्वास.

विदा किया हनुमान को, प्रार्थना पति स्वास्थ्य, 
पूरी निष्ठा पति रही, वह उसके आराध्य.

सकुशल आए लखन जब, सीता दीदी साथ,
जोश भरा स्वागत किया, ले कर पति का हाथ.

सीता संग लव कुश थे, रहा राम दरबार,
उन्हें राम को सौंप कर, धरा को नमस्कार.
------
सीता सुत पालन किया, जैसे अपनी जान,
भगिनी सुत अंतर नहीं, ज्यों खुद की संतान,

उसे मिले पति लखन से, दो कुमार अवधेश.
चंद्रकेतु, अंगद बसे, माल्या, करुपाधेश.

काल, राम की भेंट में, कोई नहीं प्रवेश,
मृत्यु दंड पाए लखन, दुर्वासा का वेश.

सीता बाद लखन गए, पालन कर्ता धाम,
क्षीरसिन्धु मौजूद थे, जब आएंगे राम.

चारों भ्रात के सुत को, सौंपे उनके देश, 
भरत, सौमित्र साथ में, बैकुंठ में प्रवेश.
-----60
गई उर्मिला साथ में, तज देती यह लोक,
नाम अमर उसका हुआ, नहीं किसी को शोक.

माता, पत्नी साथ में, छोड़ अयोध्या धाम, 
बैठे राम विमान में, सभी करें विश्राम.
------




Sunday, 14 September 2025

दुर्वासा चरित - 65


  1⃣ 4⃣ - 0⃣ 9⃣ - 2⃣ 5⃣

        आज, आप की सेवा में स्वरचित *दुर्वासा चरित* के सभी 6⃣ 5⃣ दोहे एक साथ प्रस्तुत हैं : -

*ब्रह्मा जी के सुत रहे, मिला दुर्वासा नाम,
शिव जी के अवतार भी, रहा क्रोध ऋषि काम.

अनुसूया माता रहीं, अत्रि पिता संसार,
ज्ञान जगत का ले लिया, साथ में अहंकार.

दत्तात्रेय, चंद्र रहे, दुर्वासा के भ्रात,
मिला नहीं प्रमाण कहीं, कहे अंत की बात.

और्व ऋषि भ्रमण करें, पुत्री कदली साथ,
दुर्वासा से बात कर, देते उसका हाथ.

क्रोधी दोनों ही रहे, पर सौ गुनाह माफ, 
पत्नी सोती रह गई, पूजा मुहूर्त साफ.
-----5
दुर्वासा ने श्राप से, किया क्रोध का अंत, 
कदली बदली राख में, नहीं काम वह संत. 

देवों से आशीश पा, कदली हुई महान, 
पूजा उसकी सब करें, बिना बीज वरदान.

अंत लखन में भूमिका, ऋषि वर योगदान,
काल चक्र कारण बना, लखन स्वर्ग आव्हान.

सीता बाद गमन करें, लखन अधिक प्रिय भ्रात,
अनुमति नहीं कोई सुने, गुप्त राम की बात.

पहरा देते लखन थे, दुर्वासा का आदेश,
ध्यान अयोध्या हित धरा, अंदर किया प्रवेश, 
----10
दंड कहें अपराध का, रहा नियति का खेल,
लखन जा बैकुंठ बसें, रच देवों का मेल.

दिया श्राप महादेव को, तजें जटा का रूप, 
चाहें अंबा से मिलन, बनें जगत के भूप.

दुर्वासा ने भेंट में, इंद्र दिया इक हार,
डाल ऐरावत गले, कर दिया तिरस्कार.

क्रोधित दुर्वासा हुए, दिया इंद्र को श्राप,
नहीं संपदा साथ हो, साथ रहेंगे पाप.

शक्ति हीन देवता बने, असुर राज हथियाय, 
विष्णु से की प्रार्थना, हमको लेउ बचाय.
------15
सागर मंथन में मिला, अमरत का परसाद, 
केवल देवों को दिया, करते असुर फसाद.

देव लोक की अप्सरा, विचर रही आकाश,  
पुंजिकस्थला नाम रहा, निकली ऋषि के पास, 

ऋषि तप में बाधा पड़ी, दुर्वासा का क्रोध,
बन जाए वह वानरी, तभी अपराध बोध. 

उस ने तप शिव का किया, पाया यह वरदान,
दिया जन्म शिवांश को, रहा नाम हनुमान.

कृष्ण रुक्मिणी घूमते, अपनी शादी बाद,
दुर्वासा आश्रम में, ले लें आशीर्वाद.
----20
दिया निमंत्रण महल में, आ कर दें आशीश,
शर्त रखी रथ हो अलग, अश्व द्वारकाधीश.

लगी प्यास जब राह में, श्याम निकाली धार,
पांव लगाया भूमि में, ऐसा जल तैयार.

श्राप दिया तब क्रोध में, मिलें न बारह साल,
राजा, रानी अलग हों, कुदरत करे कमाल.

खेद रुक्मिणी को हुआ, बारह वर्ष वियोग,
सागर को छोड़ा नहीं, खारे जल का रोग.

पांव लगाने से हुआ, दुर्वासा से वैर,
कारण होगा अंत का, वही श्याम का पैर.
-----25
एक बार द्वारका में, ऋषि आए बरसात,
अतिथि नहीं उन को कहे, स्वागत से घबरात. 

घूम रहे तो मिल गए, महल द्वारकाधीश, 
अलग झोंपड़ी बोल दी, तब देंगे आशीश.

आग लगा कर आ गए, अतिथि का अधिकार,
खीर पकाए रुक्मिणी, तब स्वागत स्वीकार.

थोड़ा खा कर फेंक दी, ऊपर श्याम शरीर, 
पूरे बदन इसे मलो, ऋषिवर कहते पीर.

तलवे छोड़ कान्हा मले, पैर पर ना प्रसाद,
बोले दुर्वासा तभी, रहा कवच अपवाद.
----30
इस कारण तब भील ने, किया श्याम का अंत, 
लिया तीर उस पैर में, तजे प्रान भगवंत.

अंबरीष के अतिथि बन, राजन तप में लीन,
एकादशी का व्रत रखा, द्वादशी पारण बीन.

दुर्वासा आए वहां, भोजन का आव्हान,
पारण पहले अतिथि से, रहा काल विधान.

प्रकट जटा कृत्या करी, हो नाश अंबरीष, 
राजन भक्ति विपति हरे, छोड़ सुदर्शन ईश.

कृत्या का संहार कर, चक्र चला ऋषि ओर, 
करें देव सब प्रार्थना, दुर्वासा को छोड़.
-----35
हू-हू इक गंधर्व था, पूर्व जन्म का हाल,
करता ठिठोली मुनि से, श्राप करे बेहाल.

दुर्वासा तप कर रहे, हू-हू आया राह, 
अनजाने टकरा गया, उसे बनाते ग्राह. 

हो जाएगा मगर वह, रहता सागर तीर,
हरि दर्शन का वर दिया, हर कर उसकी पीर.

इंद्रद्युम्न जब तप करे, सत्कार गया भूल,
जड़मति होकर गज बने, ग्रसे ग्राह का मूल.

मुक्ति दे, उद्धार किया, इंद्रद्युम्न कल्यान,
नाम मिला जय विजय का, ईश्वर का वरदान.
----40
माता होती मेनका, रही कण्व के पास, 
पिता विश्वामित्र रहे, नहीं मिलन की आस.

यौवन में उसको हुआ, प्यार राज दुष्यंत,   
गर्भवती वह हो गई, चिंतन गहन अनंत.

दुर्वासा जा घूमते, आश्रम कण्व पधार,
चिंतित रही शकुन्तला, ना करा नमस्कार. 

दुर्वासा ने क्रोध में, दिया बालिका श्राप,
भूलेगा राजा तुझे, याद रखो यह पाप.

करें कण्व जब प्रार्थना, बने ऋषि दयावान,
आए याद उसे जहां, देखे प्रेम निशान.
-----45
सरवर में मुद्रिका गिरी, गई बुझाने प्यास, 
मछुआरे ने ला दिखा, दुष्यंत रखी आस.

गलत पाठ सुन वेद का, करे शारदा हास,
नदी छोड़ मानव बने, कटु वचनों का त्रास.

इसी तरह की बात कुछ, होती गंगा साथ,
बहन पार्वती ने कहा, फेंको जल नर माथ.

इस विधि से वह कर सके, शिव जी को प्रसन्न, 
किया टोटका बहन ने, दुर्वासा अवसन्न.

शापित तब गंगा हुई, बनी नीर की धार, 
नदी रूप बहती रहे, पाए सब का प्यार.
----50
देते नहीं शाप सदा, अक्सर दें वरदान, 
दुर्वासा के चित्त का, नहीं किसी को भान.

प्रसन्न यदि किसी पर हों, कर दें कृपा अपार, 
अद्भुत वर समृद्ध करें, भरें खुशी भंडार.

एक बार पधारे, कुंत भोज के द्वार, 
कुंती ने सेवा करी, दी आशीश अपार.

ऋषिवर ने कुंती दिया, खास एक वरदान,
मंत्र जाप से हो सके, किसी देव का ध्यान. 

कुंती थी तब बालिका, कुंवारी नादान, 
अनजाने में कर लिया, परीक्षण का निशान.
-----55
विनय जिज्ञासा में करी, सूर्य देव आव्हान.
उसे सूर्य ने दे दिया, पुत्र प्राप्ति वरदान. 

रहे कुवारी बालिका, जन कितनी संतान,
दुर्वासा ने साथ में, उसे दिया वरदान.

दुर्वासा प्रसन्न हुए, हो द्रौपदी अक्षीर, 
करें मदद मुसीबत में, हरी चीर की पीर. 

पांडव थे बनवास में, लाए शिष्य हजार,
दुर्योधन की चाल थी, दुर्वासा दें खार.

तप से पाई द्रौपदी, भोजन का भंडार,
अक्षय पात्र के रूप में, मिला उसे उपहार.
-----60
आ कर बोले स्नान करूं, भोजन की हो रीत,
जीम द्रौपदी तब चुकी, अक्षय पात्र भी रीत.

याद द्रौपदी कृष्ण करे, चखा लगा इक पात,
पेट भरा सब शिष्य का, टाल दिया अपघात.

लीन रहा भगवान में, दुर्वासा का रूप,
चाहे जहां भ्रमण करें, सब देवों के भूप.

बनता कारण क्रोध का, सब जग में पहचान,
फिर भी उन के तेज से, रहा कौन अनजान.

दुर्वासा के निधन का, मिलता नहीं प्रमान,
नाम अमर फिर भी हुआ, करते सब सम्मान.
-----65*
  
   इस शृंखला को पूरे मनोयोग से पढ़ने व सराहने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार.  जो मित्र किसी कारणवश इसे पूरा न पढ़ सके हों, उनकी सुविधा के लिए इस शृंखला के सभी *65* दोहे एक साथ पोस्ट किए जा रहे हैं.

 सादर. 
   🌹💐🙏