अश्वत्थामा चरित - माता कृपाचार्य की बहन कृपी और पिता द्रोणाचार्य. द्रोणाचार्य भारद्वाज ऋषि और घृताची अप्सरा के पुत्र थे. अश्वत्थामा सप्त चिरंजीवियों में से एक. अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, और परशुराम.
माना जाता है कि ये दिव्य शक्तियों से संपन्न हैं और आज भी पृथ्वी पर मौजूद हैं.
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मिले द्रोण भरद्वाज को, दिया पिता का नाम,
बनी घृताची अप्सरा, उनकी माता नाम.
उनकी शादी कृपी से, कृपाचार्य थे भ्रात,
सुत अश्वत्थामा हुआ, करे गरीबी बात.
मणि मस्तक पर थी लगी, दिखी जन्म के साथ ,
वीर महान बहुत रहा, सीख पिता के हाथ.
करती रक्षा वह सदा, दानव, किन्नर दैत्य,
पिता उसे अजेय कहें, सबको जीते ध्येय.
सुत को दूध मिला नहीं, होते द्रोण निराश,
हाल गरीबी देख कर, करें नौकरी आस.
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चावल घोल पिला दिया, छोटा लाल अबोध,
नहीं सामर्थ्य कुछ रही, हृदय अपराध बोध.
निर्धन बामन द्रोण थे, नहीं जीविका पास,
तब गुरु भाई भीष्म ने, दी जीवन की आस.
ब्राह्मण करता चाकरी, भीष्म राज दरबार,
शिक्षा को सम्मान दे, युवराज हुए उदार.
पा नाम देवव्रत का, बड़ा हुआ युवराज,
परशुराम शिक्षा दिए, योद्धा बना समाज.
नाविक सुता सत्यवती, कर ले प्रणय विचार,
शासक उसके लाल हो, मिले पहला अधिकार.
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भीष्म कहते ठान लिया, नहीं करूं मैं ब्याह,
उसके सुत जल्दी मरे, करी व्यास से चाह.
सहमत नहीं व्यास रहे, पर माता आदेश,
अंधे, दुर्बल सुत रहे, विदुर नीति संदेश.
कौरव, पांडव सुत हुए, शासन का अधिकार,
चुना भीष्म ने द्रोण को, शिक्षा का आधार.
राज सुतों के साथ ही, शिक्षा पाता लाल,
अस्त्र-शस्त्र वह सीखता, कोई नहीं मलाल.
द्रुपद राजकुमार रहे, पिता पृषत पांचाल,
कंपाला के राज का, पृषति होते लाल.
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आश्रम भारद्वाज रहा, द्रुपद पाते ज्ञान,
शिक्षा पाते द्रोण भी, सहपाठी थे मान.
मीत दोनों द्रोण, द्रुपद, आश्रम में थे यार,
द्रोण बहुत गरीब रहे, द्रुपद राज कुमार.
बड़े हुए, अंतर मिला, राजा जनता साथ,
समझ उपेक्षा द्रोण ने, चढ़ा उपहास माथ.
वैरी बनते काल वश, कभी रहे जो मीत,
पद, वैभव, पैसा मिला, बढ़ा वैर जग रीत.
शिक्षण चुनते द्रोण तब, जीवन का आधार,
सीखें शासन लाल सब, भीष्म बृहत परिवार.
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शिक्षा सुत को भी दिए, शांतनु वंशज साथ,
भीम, युधिष्ठिर साथ में, दुर्योधन का हाथ.
सारी शिक्षा लाल को, सिखा दिया उपयोग,
ज्ञान सभी हथियार का, अनुपम शक्ति प्रयोग.
मीत बनाया हो युवा, कौरव राजकुमार,
पांडव से विवाद हुआ, जो शासन हकदार.
बड़ा तपस्वी वह रहा, पा ब्रह्मा वरदान,
नहीं किसी से मर सके, अद्भुत मणि का मान.
बहुत प्रेम करते पिता, उनका उस पर विश्वास,
मात पिता का लाड़ला, उससे जीवन श्वास.
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राज नहीं पांडव मिले, ना माना युवराज,
हारे कृष्ण समझा कर, होता चकित समाज.
युद्ध बिना कुछ भी नहीं, उसका सारा राज,
सेना ले कर कृष्ण से, छोड़ श्याम युवराज.
अश्वत्थामा भी लड़ा, कौरव सेना साथ,
सेनापति भीष्म रहे, द्रोण, जयद्रथ हाथ.
चक्र व्यूह में फंस गया, एक अभिमन्यु वीर,
योद्धा सात घेर लिए, हरते जीवन पीर.
द्रुपद सुत धृष्टद्युम्न था, पांचाली का भ्रात,
वह भी महाभारत में, लड़ता पांडव साथ.
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कूटनीति थी कृष्ण की, मरवाया गजराज,
अश्वत्थामा मर गया, कह रहे धर्म राज.
अश्वत्थामा पर टिका, पिता द्रोण विश्वास,
अर्धसत्य युधिष्ठिर कह, तोड़ी जीवन श्वास.
धृष्टद्युम्न सर काट कर, गुरू द्रोण का अंत,
बेटे ने बदला लिया, युद्ध बाद में हंत.
बाद द्रोण के कर्ण ने, पा सेनापति भार,
घोर लड़ाई वह लड़ा, गया मृत्यु के द्वार.
सत्रह दिन में युद्ध का, अंत कर्ण के साथ,
शल्य, शकुनि को भी मिला, सेना नायक हाथ.
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नायक अगले दिन बने, अर्जुन के गुरु भ्रात,
युद्ध भयंकर हो रहा, बचे चार ही साथ.
अश्वत्थामा को मिली, रण की बुझती जोत,
व्यापक विचित्र शांति थी, नाच रही थी मौत.
समर भूमि में शव दिखें, रहे कभी थे वीर,
प्राण छोड़ कर चल बसे, थे निर्जीव शरीर.
हाल समर का देखता, बर्बरीक का शीश,
उसे काट लटका दिया, दे अपना आशीश.
दुर्योधन तब कर रहा, प्रायश्चित इतिहास,
पांडव अब होंगे मगन, रहे विजय अहसास.
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नेता गड़ता शर्म से, चला नदी विश्राम,
श्वास रोक आसन लिया, जल समाधि अभिराम.
याद प्रतिज्ञा को करे, सौ कौरव संहार,
भीम ने निर्देश लिए, माधव का उपकार.
गदा युद्ध ललकार कर, भीम करते प्रहार,
दुर्योधन विकलांग कर, बना दिया लाचार.
अश्वत्थामा मित्र को, दिया वचन इस बार,
मैं पांडवों से ले लूं, आज रात प्रतिकार.
विजय रात्रि को चल दिए, कृष्ण नदी के तीर,
पांडव दें श्रद्धांजली, हते समर में वीर.
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सोए थे उस रात को, सब पांडव संतान,
शिविर में गैर हाजिरी, दिखते पिता समान.
धृष्टद्युम्न को मार कर, चला शिविर की ओर,
पांचों पांडव सुतों के, शीश काट कर भोर.
पता लगा जब भ्रम हुआ, उसको होता खेद,
लक्ष्य हुआ पूरा नहीं, दिखा नहीं कुछ भेद.
लौटे पांडव शिविर में, देखा हाहाकार,
उलटे पैर निकल पड़े, किस का अत्याचार.
समझाया जब कृष्ण ने, अश्वत्थामा कृत्य,
जब तक मणि मस्तक रहे, गुरु पुत्र नहीं वध्य.
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दोषी पांचाली रहा, उसे दंड अधिकार,
जीवित कृपी पुत्र रहे, माता का चीत्कार.
सबकी यह सहमति बनी, मस्तक मणि निकाल,
घायल कर छोड़ा उसे, क्रन्दन हो विकराल.
वह तभी से घूम रहा, सहता सारी पीर,
दें कर जीवन द्रौपदी, कष्ट दिया गंभीर.
अब वह मर सकता नहीं, हो गया चिरंजीव,
अद्भुत एक वीर हुआ, पाया विचित्र नसीब.
गणना उसकी सात में, बलि, व्यास, परशुराम,
कृपा, हनु, विभीषण सहित, अश्वत्थामा नाम.
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