Wednesday, 4 February 2026

जामवंत चरित - 57



जामवंत चरित - 57 

  जामवंत को ब्रह्मा का अंशावतार और अग्नि पुत्र कहा जाता है, जिन्हें अमर होने का वरदान प्राप्त था. सतयुग में वामन अवतार, त्रेता युग में राम और द्वापरयुग में कृष्ण जी के काल में उनकी उपस्थिति का उल्लेख है. इन्हें *ऋक्षराज* भी कहा जाता है. यह भी कहा जाता है कि वह ब्रह्मा जी की जमुहाई से उत्पन्न हुए थे, और बहुत बलवान थे. वह अग्नि देव और गंधर्व कन्या के पुत्र कहे जाते हैं. उनकी पत्नी का नाम जयवंती था. जामवंती उनकी पुत्री थी, जो बाद में श्री कृष्ण की पत्नी बनीं. नारद और हिमवत उनके भाई कहे जाते हैं.


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ब्रह्मा की संतति हुए, मानव में भगवंत,
मिला नाम संसार में, सब कहें जामवंत.

दैवी पुरुष बोल कर, सब करते सम्मान,
अष्ट चिरंजीवी गिनें, दीर्घायु वरदान. 

ब्रह्मा जमुहाई लिए, प्रकट हुई संतान,
रूप विलक्षण मिल गया, इस वेश भगवान.

माता जयवंती कहें, नारद, हिमवत भ्रात,
भालू लगते सभी को, रही सोच अज्ञात.

ऋक्षराज बन हो बड़े, जग में करते नाम,
त्रेता, द्वापर युग रहे, बने भक्त प्रभु राम.
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कहते अग्नि देव पिता, अति बली जन्म जात, 
मात कहें गंधर्व को, सुनी सुनाई बात. 

अधिक आयु थी राम से, कहते वानर जात,
वेद, शास्त्र, पुराण के, ज्ञाता रहे विख्यात.

कहते अमर उन्हें सभी, युगों में योगदान,
लोहा उनका मानते, कहें सभी विद्वान.

सतयुग के भी मिल रहे, आज भी कुछ प्रमाण, 
किस्से उनके तेज के, करते सब सम्मान.

रहे उपस्थित यज्ञ में, कराते असुर राज, 
पौत्र रहे प्रह्लाद के, बालि यजमान आज. 
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भांपा अपनी बुद्धि से, वामन का वरदान,
सब देवों का हो भला, असुरों का कल्यान.

वामन ने दो पग रखे, मांग बालि से दान,
तब तक जामवंत करें, धरा के सात ध्यान.

चक्र सात में नख लगा, महामेरु शीर्ष पाप,
शिखर भंग जब हो गया, दिया बलहीन श्राप,

अनुपम बल उनका कहे, नहीं उचित अभिमान,
फौरन बूढ़े बन गए, लिया बुद्धि प्रतिदान.

द्वापर युग में महान था, प्रभु राम का नाम, 
उनको भी सहयोग दे, कुछ यादगार काम.
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जामवंत उसको मिले, करें समझ की बात,
बनते सचिव सुग्रीव के, हर उसका आपात.

मयदानव का पुत्र था, रहा दुंदुभी नाम,
भाई था मंदोदरी, आतंकी बदनाम.

गज दस हज़ार का बली, रखता भैंसा रूप,
तप कर शिव से वर लिया, था अभिमान अनूप.

सागर व हिमवान ने, उकसाया अभिमान,
समर बालि से वह करे, तभी बढ़ेगी शान.

मुष्टिक एक प्रहार कर, बालि ने किया अंत,
शव उस का उछाल दिया, फेंका आश्रम संत.
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आश्रम रहा मतंग का, रिष्यमूक आधार, 
श्राप बालि को ऋषि दिया, निषिद्ध योजन चार.

बालि के गलत कोप से, थे सुग्रीव भयभीत,
लिया लाभ तब श्राप का, जा कर बसे सप्रीत.

ऋषि आश्रम में सेविका, शबरी उसका नाम,
कहें मतंग अंत समय, सेवा करना राम.

कहना तब तुम राम से, गमन गिरि रिष्यमूक,
हो सुग्रीव से मित्रता, करो प्रयास अचूक.

जामवंत उसको मिलें, करें समझ की बात,
जो हों सचिव सुग्रीव के, हर उसका आपात.
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बल, बुद्धि के योग रहे, ऋक्षराज जामवंत, 
धैर्य सहित थी वीरता, बात कहें श्रीमंत.

मंत्री बने सुग्रीव के, मिला साथ हनुमान, 
बाली को प्रवेश नहीं, रिष्यमूक का स्थान.

सीता को हर ले गया, रावण दैत्य महान,
राम लखन थे खोजते, वन बाग परेशान.

घटनाएं घटीं उसी तरह, विधि जो रचा विधान, दर्शन शबरी को हुए, ज्यों पा ली भगवान.

शबरी से मिल कर बढ़े, रिष्यमूक की राह, 
मार्ग में हनुमान मिले, दर्शन जिनकी चाह.
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बाली वध के बाद में, राजा बने सुग्रीव,
जामवंत को सचिव चुन, सीता सुध संजीव.

वानर सेना साथ में, ले कर जटायु राय,
दक्षिण में वह सब चले, सागर तट पर आय.

सागर देखा सामने, सेना हुई हताश,
पार उसे कैसे करें, जामवंत की आश.

देखा तब हनुमान को, कर साहस संचार,
क्षमता याद दिला उन्हें, कर लो सागर पार.

ऊर्जा बचपन में दिखी, गुरु जन थे हैरान,
शाप क्रोध में तब दिया, शक्ति भूल हनुमान.
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विनती करते केसरी, कम प्रभाव हो जाय, 
वापस उसे शक्ति मिले, कोई याद दिलाय.

जामवंत ने तब कहा, जीवन का उद्देश्य,
अर्पित राम काज करो, एकमात्र हो ध्येय.

सागर पार कूद चले, लंका में हनुमान,
सीता मिल, लंका जला, रखा विभीषण मान.

वानर लंका जा सकें, रचना सेतु उपाय, 
जामवंत ने तब कहा, पूजन हित आचार्य.

पहले पूजा कर सकें, लंकेश इंतजाम,  
जामवंत लाए बुला, सफल किया अंजाम.
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युद्ध राम से जब हुआ, वीर भिड़ा लंकेश, 
रावण मूर्छित हो गया, मुष्टिक एक संदेश.

अधिक आयु के बाद भी, उसकी शक्ति अपार,
चाह अधूरी रह गई, देखे रावण हार.

समझ राम फौरन गए, शेष अभी अभिमान.
द्वापर युग में लड़ सकें, दिया उन्हें वरदान.

लंबी आयु उन्हें मिली, निरखी लीला राम,
त्रेता से द्वापर हुआ, जीवन था निष्काम.

सत्राजित राजा रहे, द्वापर युग में खास,
सूर्य देव के भक्त थे, पा स्यंतक मणि पास.
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मणि देती सोना उसे, हर दिन तोला आठ, 
जीवन में अभाव नहीं, बड़े निराले ठाठ.

रक्षा प्रसेनजित करें, सत्राजित के भ्रात, 
उस मणि को देखें सदा, रखते अपने साथ.

एक दिन शेर ने किया, उस का काम तमाम, 
गया खोह में मणि लिए, जामवंत के धाम.

जामवंत ने मणि लखी, दिया सुता उपहार,
मणि को खिलौना समझा, जामवंती बहार.

भाई की हत्या सुनी, सत्राजित आरोप,
मणि चुराई कृष्ण ने, मोह स्वर्ण का कोप.
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धन का था अभाव नहीं, व्यर्थ लांछन श्याम,
खोजा मणि को खोह में, करो नहीं बदनाम.

जामवंत से भिड़ गए, पूर्व जन्म के राम, 
दिन अठाइस समर चली, पूरी इच्छा काम.

अंत में पहचान लिया, श्याम राम के रूप,
शरण का निवेदन किया, सुता नहीं अनुरूप.

अपनाई जामवंती, दिए अनेकों तर्क,
बड़ी तो रुक्मिणी रही, उससे रखा न फर्क.

मणि वापस सत्राजित को, नहीं करी स्वीकार,
बेटी सत्यभामा दे, मणि अद्भुत उपहार.
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दोनों रानी श्याम की, मणि का बनता फेर, 
नहीं अभाव स्वर्ण कभी, काल चक्र अंधेर.

लोग आज भी कह रहे, जामवंत बलवान,
बीच हमारे रह रहे, अदृश्य रूप भगवान.
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