उर्मिला चरित - 62
उर्मिला लक्ष्मण (शेषनाग के रूप) की पत्नी, सीता की छोटी बहन व राजा जनक व सुनयना की बेटी थी. जनक के छोटे भाई कुश ध्वज थे, जिनकी पत्नी चंद्रभागा व पुत्रियां मांडवी व श्रुति कीर्ति थीं. वह सांकस्य के राजा थे. उन्हें नागलक्ष्मी या क्षीरसागरा का अवतार भी कहते हैं. उनका जन्म जया एकादशी को हुआ था.
रामायण समाप्त होने पर सीता, मांडवी व श्रुति कीर्ति के जाने के बाद उर्मिला ने बच्चों को अच्छे संस्कार दे कर सरयू में समाधि ली थी. अंगद व चंद्र केतु उसके पुत्र थे. अंगद को करुपाधेश राज्य का राजा बनाया गया था. चंद्रकेतु को माल्या राज्य का राजा बनाया गया था.
संवेदनशीलता, दयालुता, आत्म-समर्पण, शांत स्वभाव, सकारात्मकता, आत्मविश्वास, रचनात्मकता, मंजूरी देने की क्षमता, निष्ठा व अपेक्षा उसकी चारित्रिक विशेषताएं हैं.
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पढ़ते हम इतिहास में, चार युगों का काल,
सतयुग, त्रेता, द्वापर के, बाद कलियुग धमाल.
त्रेता काल विशेष है, सभी करो अभिमान,
मिथिला नगरी के हुए, राजा जनक महान.
बड़े तपस्वी जनक थे, धन दौलत से दूर,
नहीं कष्ट कोई सहे, ना कोई मजबूर.
उनकी रानी सुनयना, चाहे इक संतान,
दो बेटी उनको मिलीं, सुंदर रूपवान.
नाम बड़ी का जानकी, बाद उर्मिला जान,
साथ रहीं, युवती बनीं, थीं बहुत बुद्धिमान.
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पाख उजाला माघ का, जया इकाशी बोल,
सीता भगिनी उर्मिला, रखें बात का मोल.
क्षीरसागरा भी कहें, दूजा उसका नाम,
नागलक्ष्मी कहें उसे, परिचय बोले काम.
जनक अनुज कुशध्वज रहे, राज करें सांकस्य,
बेटी उनकी मांडवी, बहन श्रुतिकीर्ति तस्य.
चारों बहनें साथ में, विदुषी एक समान,
शिक्षा ज्ञान था एक सा, होती साथ जवान.
बड़ी हुईं, चिंता बढ़ी, करते जनक विचार,
कौन, कहां, कब वर मिले, शादी को तैयार.
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दशरथ राजा अवध के, पाए चार कुमार,
लछमन, शत्रुघ्न भ्रात थे, भगवन, भरत उदार.
दशरथ से ऋषि मांगते, उनके राजकुमार,
तप में उनकी हो मदद, दानव का संहार.
पुत्र प्रेम दशरथ रहा, मन में था विषाद,
दी राय गुरु वशिष्ठ ने, भर पाया आह्लाद.
आए मिथिला राज में, विश्वामित्र के साथ,
राम, लखन सुत अवध से, रहे जगत के नाथ.
सीता हित स्वयंवर था, हो भंग शिव पिनाक,
वरण करे, वह सफल हो, रखे जनक की नाक.
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आमंत्रित मिथिला रहे, सब जगह के कुमार,
अवसर पाया राम ने, किया जनक उद्धार.
दशरथ आए अवध से, ले पूरी बारात,
देख भरत सौमित्र को, हृदय न प्रेम समात.
चार भाई देख कर, करते जनक विचार,
बन जाएं यह वर अगर, मेरा हो उद्धार.
पहले समय रही प्रथा, गुरु सुझाव स्वीकार,
राजा भी मानें उसे, करें नहीं इनकार.
सहमति दशरथ की हुई, मिथिला हर्ष अपार,
चारों बहनें खुश दिखें, आपस बढ़ता प्यार.
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सीता मिलती राम को, उर्मिला लखन पास,
रही भरत की मांडवी, अनुज श्रुति कीर्ति दास.
चारों बहनें आ गईं, साथ अयोध्या धाम,
दशरथ तो राजा रहे, रहे युवराज राम.
मिल जुल कर सब रह रहे, हुआ सुखी परिवार,
जनता भी खुशहाल थी, उचित सभी व्यवहार.
काल चक्र ऐसा चला, हुआ सब उलट फेर,
कैकेई मत्थे चढ़ा, घटनाओं का शेर.
दशरथ के लंबित रहे , दो वरदान उधार,
समय देख कर मांगती, राम करें वन प्यार.
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चौदह वर्ष जंगल में, सुत हो राजकुमार,
हामी भरी मजबूर हो, पिता वचन का प्यार.
सीता पति के संग थी, भाई लखन उदास,
पत्नी देखूं या करूं, सद्विचार का नास.
मलिन उर्मिला थी नहीं, मुख दिखता उत्साह,
प्रसन्न मन से दूं विदा, दिल की थी यह चाह.
कारण उसको ज्ञात था, क्यों पाया अवतार,
साधारण नारी नहीं, स्वागत को तैयार.
आए स्वामी भुवन में, दिखा थाल में दीप,
उत्साहित थी उर्मिला, लगता लक्ष्य समीप.
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आशा और विश्वास से, लखन मांगते नीर,
पत्नी की सहमति मिली, भूले सारी पीर.
जल लिए उर्मिला सुने, चौदह वर्ष इंतजार,
फौरन पा उठ चल पड़े, वन गमन समाचार.
एक कहानी यह कहे, था उर्मिल कर नीर,
चौदह वर्ष खड़ी रही, हरती भव की पीर.
मिले कथा इतिहास में, मेघनाद वरदान,
जागा चौदह वर्ष जो, बिना नींद आव्हान.
नींद उर्मिला पा गई, लखन नींद के साथ,
सोती थी सारे समय, हो नाश मेघनाथ.
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जाग रहे प्रभु भक्ति में, दिया नींद को त्याग,
अविरल सेवा वह करें, सदा राम का राग.
हरण जानकी का हुआ, बुला मारीच राम,
लंकापति रावण धरा, साधु वेश अभिराम.
सीता को थे खोजते, दोनों भाई खिन्न,
शबरी मिलती मार्ग में, दोनों हुए प्रसन्न.
पता मिला हनुमान का, मदद करें सुग्रीव,
जामवंत की विद्वता, सेना बने सजीव.
बालि मार कर चल पड़े, सीता जी की खोज,
रामेश्वर सेतु बना, भरते सेना ओज.
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मेघनाद ने तप किया, पाई शक्ति अचूक,
समर भूमि में लखन पर, वीर घातिनी मूक.
गिरे लखन रण भूमि पर, मचता हाहाकार,
चाहा ले चलूं इसको, करें पिता जयकार.
राम दुखी हो कर रहे, भीषण रुदन, विलाप,
रखा लखन सिर गोद में, कह दो उपाय आप.
राय विभीषण से मिली, हनुमत कहें सुषेन,
फौरन दो संजीवनी, बीत न पाए रैन.
हनुमत भेजें राम ने, लाओ बूटी द्रोण,
पूरा पर्वत उठा ले, उड़े अवध की ओर.
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हनुमत उड़ते देख कर, करते भरत विचार,
कहीं निशाचर रात में, अद्भुत करे विहार.
उसे गिराने के लिए, भरत छोड़ते तीर,
राम राम कह घायल हुए, उड़ते हनुमत वीर.
पीड़ा में ही कह गए, घटना क्रम इतिहास,
दुखी अवध जनता हुई, माता का विश्वास.
ढाढस भेजें राम को, भेजूं दोनों भ्रात,
दिखा विश्वास उर्मिला, करें विश्राम तात.
लखन अहित संभव नहीं, मम पतिव्रत महान,
उनका सिर प्रभु गोद में, यह है उनकी शान.
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सूर्योदय होगा नहीं, ना बीते यह रात,
दो दिवस आराम करें, चिंता की क्या बात.
समझी पति की वेदना, रहा समय आभास,
फिर भी मन में दिख रहा, गजब आत्म विश्वास.
विदा किया हनुमान को, प्रार्थना पति स्वास्थ्य,
पूरी निष्ठा पति रही, वह उसके आराध्य.
सकुशल आए लखन जब, सीता दीदी साथ,
जोश भरा स्वागत किया, ले कर पति का हाथ.
सीता संग लव कुश थे, रहा राम दरबार,
उन्हें राम को सौंप कर, धरा को नमस्कार.
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सीता सुत पालन किया, जैसे अपनी जान,
भगिनी सुत अंतर नहीं, ज्यों खुद की संतान,
उसे मिले पति लखन से, दो कुमार अवधेश.
चंद्रकेतु, अंगद बसे, माल्या, करुपाधेश.
काल, राम की भेंट में, कोई नहीं प्रवेश,
मृत्यु दंड पाए लखन, दुर्वासा का वेश.
सीता बाद लखन गए, पालन कर्ता धाम,
क्षीरसिन्धु मौजूद थे, जब आएंगे राम.
चारों भ्रात के सुत को, सौंपे उनके देश,
भरत, सौमित्र साथ में, बैकुंठ में प्रवेश.
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गई उर्मिला साथ में, तज देती यह लोक,
नाम अमर उसका हुआ, नहीं किसी को शोक.
माता, पत्नी साथ में, छोड़ अयोध्या धाम,
बैठे राम विमान में, सभी करें विश्राम.
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