1⃣ 4⃣ - 0⃣ 9⃣ - 2⃣ 5⃣
आज, आप की सेवा में स्वरचित *दुर्वासा चरित* के सभी 6⃣ 5⃣ दोहे एक साथ प्रस्तुत हैं : -
*ब्रह्मा जी के सुत रहे, मिला दुर्वासा नाम,
शिव जी के अवतार भी, रहा क्रोध ऋषि काम.
अनुसूया माता रहीं, अत्रि पिता संसार,
ज्ञान जगत का ले लिया, साथ में अहंकार.
दत्तात्रेय, चंद्र रहे, दुर्वासा के भ्रात,
मिला नहीं प्रमाण कहीं, कहे अंत की बात.
और्व ऋषि भ्रमण करें, पुत्री कदली साथ,
दुर्वासा से बात कर, देते उसका हाथ.
क्रोधी दोनों ही रहे, पर सौ गुनाह माफ,
पत्नी सोती रह गई, पूजा मुहूर्त साफ.
-----5
दुर्वासा ने श्राप से, किया क्रोध का अंत,
कदली बदली राख में, नहीं काम वह संत.
देवों से आशीश पा, कदली हुई महान,
पूजा उसकी सब करें, बिना बीज वरदान.
अंत लखन में भूमिका, ऋषि वर योगदान,
काल चक्र कारण बना, लखन स्वर्ग आव्हान.
सीता बाद गमन करें, लखन अधिक प्रिय भ्रात,
अनुमति नहीं कोई सुने, गुप्त राम की बात.
पहरा देते लखन थे, दुर्वासा का आदेश,
ध्यान अयोध्या हित धरा, अंदर किया प्रवेश,
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दंड कहें अपराध का, रहा नियति का खेल,
लखन जा बैकुंठ बसें, रच देवों का मेल.
दिया श्राप महादेव को, तजें जटा का रूप,
चाहें अंबा से मिलन, बनें जगत के भूप.
दुर्वासा ने भेंट में, इंद्र दिया इक हार,
डाल ऐरावत गले, कर दिया तिरस्कार.
क्रोधित दुर्वासा हुए, दिया इंद्र को श्राप,
नहीं संपदा साथ हो, साथ रहेंगे पाप.
शक्ति हीन देवता बने, असुर राज हथियाय,
विष्णु से की प्रार्थना, हमको लेउ बचाय.
------15
सागर मंथन में मिला, अमरत का परसाद,
केवल देवों को दिया, करते असुर फसाद.
देव लोक की अप्सरा, विचर रही आकाश,
पुंजिकस्थला नाम रहा, निकली ऋषि के पास,
ऋषि तप में बाधा पड़ी, दुर्वासा का क्रोध,
बन जाए वह वानरी, तभी अपराध बोध.
उस ने तप शिव का किया, पाया यह वरदान,
दिया जन्म शिवांश को, रहा नाम हनुमान.
कृष्ण रुक्मिणी घूमते, अपनी शादी बाद,
दुर्वासा आश्रम में, ले लें आशीर्वाद.
----20
दिया निमंत्रण महल में, आ कर दें आशीश,
शर्त रखी रथ हो अलग, अश्व द्वारकाधीश.
लगी प्यास जब राह में, श्याम निकाली धार,
पांव लगाया भूमि में, ऐसा जल तैयार.
श्राप दिया तब क्रोध में, मिलें न बारह साल,
राजा, रानी अलग हों, कुदरत करे कमाल.
खेद रुक्मिणी को हुआ, बारह वर्ष वियोग,
सागर को छोड़ा नहीं, खारे जल का रोग.
पांव लगाने से हुआ, दुर्वासा से वैर,
कारण होगा अंत का, वही श्याम का पैर.
-----25
एक बार द्वारका में, ऋषि आए बरसात,
अतिथि नहीं उन को कहे, स्वागत से घबरात.
घूम रहे तो मिल गए, महल द्वारकाधीश,
अलग झोंपड़ी बोल दी, तब देंगे आशीश.
आग लगा कर आ गए, अतिथि का अधिकार,
खीर पकाए रुक्मिणी, तब स्वागत स्वीकार.
थोड़ा खा कर फेंक दी, ऊपर श्याम शरीर,
पूरे बदन इसे मलो, ऋषिवर कहते पीर.
तलवे छोड़ कान्हा मले, पैर पर ना प्रसाद,
बोले दुर्वासा तभी, रहा कवच अपवाद.
----30
इस कारण तब भील ने, किया श्याम का अंत,
लिया तीर उस पैर में, तजे प्रान भगवंत.
अंबरीष के अतिथि बन, राजन तप में लीन,
एकादशी का व्रत रखा, द्वादशी पारण बीन.
दुर्वासा आए वहां, भोजन का आव्हान,
पारण पहले अतिथि से, रहा काल विधान.
प्रकट जटा कृत्या करी, हो नाश अंबरीष,
राजन भक्ति विपति हरे, छोड़ सुदर्शन ईश.
कृत्या का संहार कर, चक्र चला ऋषि ओर,
करें देव सब प्रार्थना, दुर्वासा को छोड़.
-----35
हू-हू इक गंधर्व था, पूर्व जन्म का हाल,
करता ठिठोली मुनि से, श्राप करे बेहाल.
दुर्वासा तप कर रहे, हू-हू आया राह,
अनजाने टकरा गया, उसे बनाते ग्राह.
हो जाएगा मगर वह, रहता सागर तीर,
हरि दर्शन का वर दिया, हर कर उसकी पीर.
इंद्रद्युम्न जब तप करे, सत्कार गया भूल,
जड़मति होकर गज बने, ग्रसे ग्राह का मूल.
मुक्ति दे, उद्धार किया, इंद्रद्युम्न कल्यान,
नाम मिला जय विजय का, ईश्वर का वरदान.
----40
माता होती मेनका, रही कण्व के पास,
पिता विश्वामित्र रहे, नहीं मिलन की आस.
यौवन में उसको हुआ, प्यार राज दुष्यंत,
गर्भवती वह हो गई, चिंतन गहन अनंत.
दुर्वासा जा घूमते, आश्रम कण्व पधार,
चिंतित रही शकुन्तला, ना करा नमस्कार.
दुर्वासा ने क्रोध में, दिया बालिका श्राप,
भूलेगा राजा तुझे, याद रखो यह पाप.
करें कण्व जब प्रार्थना, बने ऋषि दयावान,
आए याद उसे जहां, देखे प्रेम निशान.
-----45
सरवर में मुद्रिका गिरी, गई बुझाने प्यास,
मछुआरे ने ला दिखा, दुष्यंत रखी आस.
गलत पाठ सुन वेद का, करे शारदा हास,
नदी छोड़ मानव बने, कटु वचनों का त्रास.
इसी तरह की बात कुछ, होती गंगा साथ,
बहन पार्वती ने कहा, फेंको जल नर माथ.
इस विधि से वह कर सके, शिव जी को प्रसन्न,
किया टोटका बहन ने, दुर्वासा अवसन्न.
शापित तब गंगा हुई, बनी नीर की धार,
नदी रूप बहती रहे, पाए सब का प्यार.
----50
देते नहीं शाप सदा, अक्सर दें वरदान,
दुर्वासा के चित्त का, नहीं किसी को भान.
प्रसन्न यदि किसी पर हों, कर दें कृपा अपार,
अद्भुत वर समृद्ध करें, भरें खुशी भंडार.
एक बार पधारे, कुंत भोज के द्वार,
कुंती ने सेवा करी, दी आशीश अपार.
ऋषिवर ने कुंती दिया, खास एक वरदान,
मंत्र जाप से हो सके, किसी देव का ध्यान.
कुंती थी तब बालिका, कुंवारी नादान,
अनजाने में कर लिया, परीक्षण का निशान.
-----55
विनय जिज्ञासा में करी, सूर्य देव आव्हान.
उसे सूर्य ने दे दिया, पुत्र प्राप्ति वरदान.
रहे कुवारी बालिका, जन कितनी संतान,
दुर्वासा ने साथ में, उसे दिया वरदान.
दुर्वासा प्रसन्न हुए, हो द्रौपदी अक्षीर,
करें मदद मुसीबत में, हरी चीर की पीर.
पांडव थे बनवास में, लाए शिष्य हजार,
दुर्योधन की चाल थी, दुर्वासा दें खार.
तप से पाई द्रौपदी, भोजन का भंडार,
अक्षय पात्र के रूप में, मिला उसे उपहार.
-----60
आ कर बोले स्नान करूं, भोजन की हो रीत,
जीम द्रौपदी तब चुकी, अक्षय पात्र भी रीत.
याद द्रौपदी कृष्ण करे, चखा लगा इक पात,
पेट भरा सब शिष्य का, टाल दिया अपघात.
लीन रहा भगवान में, दुर्वासा का रूप,
चाहे जहां भ्रमण करें, सब देवों के भूप.
बनता कारण क्रोध का, सब जग में पहचान,
फिर भी उन के तेज से, रहा कौन अनजान.
दुर्वासा के निधन का, मिलता नहीं प्रमान,
नाम अमर फिर भी हुआ, करते सब सम्मान.
-----65*
इस शृंखला को पूरे मनोयोग से पढ़ने व सराहने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार. जो मित्र किसी कारणवश इसे पूरा न पढ़ सके हों, उनकी सुविधा के लिए इस शृंखला के सभी *65* दोहे एक साथ पोस्ट किए जा रहे हैं.
सादर.
🌹💐🙏
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