Thursday, 25 November 2021

कैकेयी चरित



-----
कैकेयी चरित 
-----

राज अश्वपति का रहा, देश कैकेय काम, 
राज कुमारी वहाँ की, कैकेयी था नाम.

सुंदरता के साथ में, बाला थी वह वीर, 
दया दृष्टि उसकी रही, सबकी हरती पीर. 

उसने सीखा युद्ध का, हर संभव ज्ञान,
दिए भले संस्कार ने, हर प्राणी का मान. 

युद्ध देव दानव करें, कभी किसी की जीत, 
उनके साथी साथ में, भली निबाहें प्रीत.

बाली को वरदान था, जो भी करता युद्घ,
आधा बल पा शत्रु का, जीत करे विशुद्ध. 
-----5
तीन लोक में विजय पा, एकछत्र था राज, 
सभी करें गुणगान अब, पहनाते सब ताज. 

रावण दाबा काँख में, घूमा तीनों लोक, 
डंका उसका बज गया, रहा न कोई शोक. 

राजा दशरथ भी लड़े, अश्वपति की ओर, 
संकट में राजा दिखे, उसने थामी डोर.

मदद पिता की वह करे, हो कोई संग्राम, 
रूप सुंदरी खास थी, नयन तके अभिराम. 

कैकेयी बन सारथी, धरा पुरुष का वेश, 
खींच लगाम बचा लिया, लाई अपने देश. 
-----10
सूर्य पुत्र बाली करे, जब दशरथ पर वार, 
गिरवी असली मुकुट रख, जान बचाई यार. 

समर दूसरे में किया, एक और आभार,
बची जान, दशरथ कहें, किया बड़ा उपकार.

दोनों अवसर के लिए, दशरथ दें वरदान, 
लाए घर रानी बना, छिड़कें उस पर जान. 

रखे सुरक्षित वर कहा, रखिए वचन उधार,
उचित समय में माँग लूँ, कृपा करें अपार. 

कौशल्या सुमित्रा थीं, पहले से मौजूद, 
मान बराबर का मिला, उसका बढ़ा वजूद. 
-----15
मैके में थी मंथरा, आई रानी साथ,
कैकेयी की सेविका, उसका बायाँ हाथ.

दशरथ की बढ़ती उमर, नहीं रही संतान, 
चर्चा कुलगुरु से करी, मिल जाए वरदान. 

यज्ञ कराया वशिष्ठ ने, दिया प्रसाद पवित्र, 
एक भाग छोटी दिया, अनुपम रहा चरित्र. 

फलीभूत जब हो गया, ऋषिवर का वरदान, 
जन्म दिया जिस पुत्र को, कहते भरत महान. 

कौशल्या सुत राम थे, लखन, सौमित्र यार, 
चारों बेटे साथ में, दशरथ सुखी अपार. 
-----20
एक साथ मिल खेलते, रानी करती प्यार, 
कुछ भी अंतर था नहीं, सब पर सब कुछ वार. 

कैकेयी दिल की सरल, उसका चरित उदार, 
अधिक राम को भरत से, करती थी वह प्यार.

शिक्षा पाने के लिए, भेजा वशिष्ठ धाम, 
नीति, धर्म, शिक्षा सहित, सीखा शस्त्र काम. 

अकसर जा कर देखती, शिक्षा का अभियान, 
नहीं खबर राजा पड़ी, हुआ नहीं कुछ भान. 

चिंता बच्चों की करे, रखती हरदम ख्याल, 
गुप्तचरों को भेज कर, लेती सबके हाल. 
-----25
अनुभव कष्टों का करा, दे सांसारिक ज्ञान, 
सुख सुविधा अपनी जगह, धरे प्रजा का ध्यान. 

राजा ऐसा चाहिए, लीन प्रजा, संसार, 
जनहित की रक्षा करे, दुष्टों का संहार. 

आयोजन हो यज्ञ का, ऐसा करें प्रयास,
विश्वामित्र जनहित में, आए ले कर आस.

विश्वामित्र माँग लिए, लखन और सुत राम, 
रक्षा दानव से करें, सफल यज्ञ परिणाम. 

रखा स्वयंवर जनक ने, सीता करें चुनाव, 
तोड़ धनुष शिव का सके, बना रमापति दाँव. 
-----30
चारों को दुलहन मिली, बनी रानियाँ सास, 
आईं जब ससुराल में, छाया था उल्लास. 

दशरथ ने निर्णय किया, राज तिलक हो राम, 
कैसे वापस मिल सके, कर पाएँ आराम. 

दशरथ को तो चाहिए, उनका असली ताज, 
तिलक राम का हो सके, कहलाएं महाराज.

करी शारदा मात ने, ऐसी कुछ तरकीब, 
कैकेयी के मन भरा, वर माँगो अजीब. 

सिखलाने वाली रही, उसकी दासी खास,
आँख मूँद रानी करे, उसका ही विश्वास. 
----35
कान भरे मंथरा ने, दिखलाई तसवीर, 
राज राम को यदि मिला, फूटेगी तकदीर. 

दासी बन कर तुम रहो, राज करेंगे राम, 
विधना को मंजूर नहीं, तुरत बिगाड़ो काम. 

कोप भवन रानी चली, लेने को वरदान, 
अस्त व्यस्त कर केश को, दशरथ थे अनजान. 

त्रिया चरित रानी दिखा, करने लगी विलाप, 
मुझे आज ही चाहिए, दोनों वर दो आप. 

असमंजस में पड़ गए, राजा थे हैरान, 
मना करें यदि आज वह, टूटी जाती आन.
----40
पता राम को जब चला, क्यों रूठी है मात, 
फौरन पालन कर चले, मान पिता की बात. 

राज तिलक तो रह गया, मचा राज में शोक, 
कैकेयी को दोष दें, काम दिया सब रोक.  

माता से आशीश ले, सीता चल दीं साथ, 
भ्रात लखन सेवा करें, बने दाहिना हाथ. 

घटना से आतुर हुए, दशरथ छोड़े प्रान, 
तीनों के वन गमन से, राज हुआ वीरान. 

लौट भरत ननिहाल से, जानी सारी बात, 
कारण खुद को समझ कर, कहें लजाते मात.
-----45
वापस लाने राम को, वन में जाते भ्रात, प्रजा साथ गुरु भी चले, करी उपेक्षा मात. 

कौशल्या आदेश दे, कहे उठा कर हाथ, 
ठीक नहीं अवहेलना, लो कैकेयी साथ.

कैकेयी को भय रहा, निकली क्यों ना जान,  
खुद को दोषी मानती, दशरथ छोड़े प्रान. 

सहमी सी रानी चली, मन में भय अनजान, 
दिल से उतरी भरत के, राम सकें पहचान. 

आशंका मन में उठी, कौन करेगा माफ, 
शुद्ध हृदय लख राम का, उसका मन भी साफ. 
-----50
वापस आए राम जब, पूरा कर बनवास, 
कैकेयी दर्शन रही, पहली उनकी आस. 

क्षमा मांग कर राम से, चाहा यह वरदान, 
पाऊँ अगले जनम में, तुम जैसी संतान. 

वचन राम ने यह दिया, होगी तुम ही मात, 
दूध तुम्हारा ना पियूँ, होंगे कुछ हालात.  

रघुकुल का कल्यान ही, अपना स्वारथ मान, 
सब के ताने सुन लिए, सहे सभी अपमान.

आए कान्हा रूप में, अनुपम दिव्य स्वरूप, 
कैकेयी थी देवकी, जसुदा माता रूप. 
-----55

Saturday, 31 July 2021

दोहा रामायण



+++++

श्री दोहा रामायण 

+++++

अंशुमान परिवार में, पैदा हुए दिलीप, 
दशरथ उनके वंश में, खासमखास महीप. 

कौशल्या रानी बड़ी, तरुण सुमित्रा नाम, 
कैकेई छोटी रही, बसी अवधपुर धाम. 

राज पाट तो बहुत था, हुई नहीं संतान, 
यज्ञ होम कर पूछते, ऋषिगण कहें निदान. 

अधिक आयु में उन्हें मिला, ऋषियों से वरदान, 
तीन रानियों के हुए, बेटे चार महान. 

पाख उजाला चैत का, नवमी तिथि अविराम, 
बजे नगाड़े अवध में, जन्म लिए श्री राम. 
----5-
जन्मे उनके साथ ही, भाई राजकुमार, 
दशरथ बहुत प्रसन्न थे, पूरा है परिवार. 

लखन, सौमित्र से बड़े, भरत और सुत राम, 
उन्हें देख हर्षित पिता, तकें नयन अविराम. 

स्वागत हो दरबार में, ब्राह्मण पाते दान, 
गुरुजन की आशीश से, छाई है मुस्कान.

लालन-पालन राजसी, रहे नीति संस्कार,
माता की ममता मिली, मोह लिया संसार. 

चारों भाई खेलते, रहते, खाते साथ, 
बात बड़ों की मानिए, कहते थे रघुनाथ. 
-----10-
राज घराने के गुरू, वशिष्ठ मुनि भगवान, 
शिक्षा का दायित्व था, ऋषिवर का अरमान. 

गुरु ने अपने ज्ञान से, दिया नीति भंडार, 
मर्यादा, संस्कार का, अनुभवमय संसार.

शिक्षा, दीक्षा हर तरह, पूरी करते लाल, 
नीति, वीरता, धर्म में, उनकी नहीं मिसाल. 

असुरों का जग में बढ़ा, अत्याचार, आतंक, 
विघ्न डालते यज्ञ में, करते नाश निशंक.

राज-क्षेत्र अयोध्या में, दानव करें बवाल, 
आए विश्वामित्र जब, मांगे केवल लाल. 
-----15-
विश्वामित्र माँग लिए, रक्षा को दो लाल, 
राम लखन को साथ रख, संकट को दें टाल. 

भारी मन से दे दिए, राम लखन दो लाल, 
मार दानवी ताड़का, ऋषिगण हुए निहाल. 

पढ़-लिख कर राघव हुए, शादी को तैयार, 
गुरु ने ढूँढी दुल्हनें, काफी किया विचार.

बरसों से पाहन पड़ी, मिले चरण जब राम,
मुक्ति अहिल्या को मिली, पहुँची उनके धाम. 

मिथिला से पा निमंत्रण, गए जनक दरबार, 
शिव पिनाक को तोड़ कर, राम करें उपकार. 
----20-
 मिथिला जा कर जनक का, सुना वशिष्ठ सुझाव, 
तोड़े जो शिव धनुष को, जगें प्रेम के भाव. 

सीता वरती राम को, डाल गले जयमाल, 
जनक राय हर्षित हुए, मिथिला थी खुशहाल.

कोशल से दशरथ चले, ले ढेरों उपहार, 
दूल्हे बन भाई चले, वधुएँ थीं तैयार. 

तन मन से सब मुदित हैं, भरा हुआ उल्लास, 
माँओं का गौरव बढ़ा, बनीं नई वह सास. 

राजा दशरथ ले चले, खुशियों का संसार,
एक साथ ही मिल गईं, जनक सुताएँ चार. 
-----25-
चारों बहनें साथ में, आईं दशरथ राज, 
पत्नी पा भाई सुखी, हर्षा सकल समाज. 

राजा ने निश्चय किया, बनें राम युवराज, 
सारी जनता खुश दिखे, होता मुदित समाज. 

राज तिलक प्रभु का करें, राजन सबके साथ, 
लिखा और था भाग्य में, नहीं बनेंगे नाथ.

होनी होती है प्रबल, करती अपना काम, 
वह तो हो कर ही रहे, भली करेंगे राम.

याद कराया मात को, दोनों वर का भान, 
रखे सुरक्षित आज तक, राजन के वरदान.
----30-
बुद्धि फेर कर मंथरा, कैकेई की दास, 
राज दिलाओ भरत को, और राम बनवास. 

राज तिलक से पूर्व ही, करो कार्य संपन्न, 
सुनते ही राजा हुए, बेसुध और विपन्न.

रानी डूबी स्वार्थ में, माँगे जो वरदान, 
पूरे यदि राजा करें, छूटें उनके प्रान.

राज भरत के नाम हो, वन को जाएं राम,
मांगे वर देने पड़े, बिगड़ा उनका नाम.

आहत दशरथ हो गए, बेसुध उनकी जान,
भारी मन से वर दिए, रख कर कुल की आन.
-----35-
सुन कर आज्ञा मात से, राम हुए तैयार, 
पूरा उनका लक्ष्य हो, लिया मनुज अवतार. 

चल दीं सीता साथ में, भाई लछमन लाल, 
साधु वेश धारण किया, कोई नहीं मलाल. 

नाना ऋषियों से लिए, आवश्यक उपदेश, 
चरण पूज तीनों चले, बनवासी दरवेश.

वापस लाने के लिए, किया महीप अनुरोध, 
घुमा फिरा ले आइए, करना नहीं विरोध. 

रोती जनता छोड़ कर, चले राम भगवंत, 
भेजे उनके साथ में, शासन सचिव सुमंत.  
-----40 -
सचिव सारथी साथ ले, पहुँचे गंगा तीर, 
केवट राय मिले उन्हें, समझी उनकी पीर. 

राम, लखन, सीता सहित, पहुँचे गंगा तीर, 
पार कराएं नाव से, केवट भक्त अधीर.

पहले धोएं पैर को, बाद चढ़ें रघुवीर, 
कहते तारणहार से, बदलें अब तकदीर.

भक्ति भाव से भर गए, नैनन निकला नीर, 
अपनी जिद पर अड़ गए, हर लें सबकी पीर. 
 
भ्रात प्रेम उर में धरे, चले भरत, गुरु, मात,
रिपुसूदन भी साथ में, बोलें मीठी बात. 
----45-
नैनों में लज्जा भरे, दिल में रख कर ग्लानि, 
रहा बोध अपराध का, नहीं क्षमा में हानि.

वापस घर को लौट कर, देखें अपना राज, 
आज्ञा अब पूरी हुई, नहीं वापसी लाज.  

डिगे नहीं अनुरोध से, भरत बताएँ ज्ञान, 
शीष खड़ाऊँ धर चले, रखा राम का मान. 

दिखे मार्ग में ऋषि जहाँ, आशिश लेते राम, 
चरणों की कर वन्दना, कर्म करें निष्काम. 

राक्षस, दानव जो मिले, उनका कर संहार, 
लक्ष्य बड़ा था सामने, बढ़ते पालन हार. 
----50 -
मायावी दानव दिखे, मचा रहे आतंक, 
उनको दंडित कर चले, राजा लगते रंक.

पंचवटी में शान्ति से, करते थे विश्राम, 
भाई, सीता साथ में, समय काटते राम. 

सहज वासना नार की, वन में करे विहार, 
रावण भगिनी घूमती, टपकाती थी लार.

लंकापति भगिनी गई, पंचवटी के पास, 
प्रणय अपेक्षा राम से, रख शादी की आस. 

सूपनखा करती विनय, अपना लो तुम राम, 
ऐश करोगे साथ में, नहीं करो कुछ काम. 
----55-
मर्यादा में राम थे, किया लखन संकेत,
देखा खतरा सामने, दोनों हुए सचेत. 

उसके हठ को देख कर, लक्ष्मण काटी नाक, 
खर दूषण से युद्ध कर, उन्हें मिलाया खाक.

पहुँच गई रोती हुई, भाई रावण पास, 
बिलख सुनाई बात सब, बदले की रख आस. 

खर दूषण भी मर गए, कहती राम प्रताप, 
लंका में भी भय बना, रावण खोता आप.

रावण ने गुस्सा किया, लिया सोच अपमान, 
इसका बदला ले सकूँ, ऐसा मन में ठान. 
-----60-
जुगत बिठाने में लगा, आया मातुल ख्याल, 
दिया हुकुम मारीच को, कंचन मृग बन चाल. 

ज्ञानी पंडित से मिले, संत एक मारीच, 
मामा से अनुरोध में, रही भावना नीच.

सीता लखती हिरन को, मन में करे विचार, 
इसका हो आखेट यदि, बना सकूँ आधार. 

आग्रह करती राम से, इसका करें शिकार, 
राम त्रिया आगे झुके, भाई पहरेदार. 

पीछे देखा राम को, दौड़ लगाई दूर, 
क्रन्दन सुन मारीच का, लखन किए मजबूर. 
-----65-
विस्मय में सीता पड़ी, संकट में हैं राम,
तुरत मदद को जाइए, नहीं देर का काम.  
 
चले मदद को राम की, खींच सुरक्षा रेख,
छोड़ जानकी चल दिए, आया संकट देख. 

पार इसे ना माँ करें, रहें सुरक्षित आप, 
गलती से लाँघा अगर, होगा पश्चाताप. 
 
माया रच रावण चला, धरा साधु का वेश, 
मांगी भिक्षा मात से, कहता था दरवेश. 

छल बल से सीता हरी, ले कर उड़ा विमान, 
सीता को रोता सुना, जगा जटायु ज्ञान. 
----70-
रावण को ललकार दे, बजा समर का शंख, 
गीध कटाए युद्ध में, अपने दोनों पंख. 

ला कर सीता को रखा, अपने लंका राज, 
बैठी बाग अशोक में, पहरा सकल समाज. 

सूनी कुटिया देख कर, दुखी हुए दो भ्रात, 
सीता को थे खोजते, करें एक दिन रात. 

जाल स्वर्ण-मृग का रचा, सीता हरी लंकेश, 
घायल जटायु ने दिया, सिया हरण संदेश.

गिरि, वन, कंदर ढूँढते, प्राण प्रिया को राम, 
राह भटकते वे चले, आए शबरी धाम. 
----75-
शबरी देखे राह प्रभु, लगा टकटकी रोज, 
भाव रखा मन में सदा, चुनती रही सरोज. 

प्रेम भाव को मानती, दिल से करती याद, 
होगी पूरी कामना, बिना किसी अपवाद. 

शबरी ने वन में दिए, चख-चख मीठे बेर, 
भक्ति देख उसकी चखे, बिना किए कुछ देर. 

श्रद्धा देखी भक्ति में, चखते जूठे बेर, 
भ्रात लखन ने रख लिए, रहा काल का फेर. 

आगे चलने पर मिले, राम भक्त हनुमान, 
जामवंत सुग्रीव रखें, किष्किंधा में प्रान.

भक्त पवनसुत ने रखी, राम नाम की शान,  
सब में श्रद्धा भर रहे, सबका रखते मान. 

राम भक्त का नाम है, अमर शक्ति का रुप, 
रहे लीन प्रभु भक्ति में, साहस के प्रतिरूप. 

सेवक बन रघुनाथ के, जपते हैं हनुमान, 
भक्ति देख उनकी कहें, लोग स्वयं भगवान. 

मन में हरदम धारते, रखते दृढ़ विश्वास, 
नमन करो हनुमान को, होगी पूरी आस. 
----85-
साहस देते प्रभु उन्हें, जो पूजें हनुमान,
बिना किसी दुर्भाव के, रखें भक्त का मान.

करुण कथा सुग्रीव की, कह कर लगे गुहार, 
मुक्ति दिलाओ बालि से, उसका कर संहार. 

एक तीर से बेध कर, ताड़ गिराए सात.
छुप कर मारा बालि को, पत्नी की सौगात. 

दे कर राज सुग्रीव को, अंगद को युवराज, 
सेना रख कर साथ में, पूरा करते काज. 

सभी दिशा सेना चली, खोजें सीता मात, 
कैसे लंका जा सकें, चिंता की थी बात. 
-----90-
खुद का गौरव भूल कर, चिंता में हनुमान, 
जामवंत के कथन ने, याद दिलाई शान.  

कूद मार कर चल पड़े, ले कर प्रभु का नाम, 
प्रबल उत्साह मन भरा, होगा पूरा काम. 

सुरसा से आशीश ले, पहुँचे लंका द्वार, 
भेंट लंकिनी से हुई, बही रुधिर मुखधार. 

मसक रूप धर कर चले, मिलने लंका भूप,
मिले विभीषण भ्रात से, धर कर वामन रूप.

सीता देखी शोक में, बैठी छाँव अशोक, 
सहती रावण त्रास को, कृश तन आँसू रोक. 
-----95-
राम दूत बन आ गए, लंका में हनुमान, 
एक अंगूठी ले चले, मात सकें पहचान. 

ऊपर तरु पर बैठ कर, समझ रहे हालात, 
रावण सीता से कहे, सुन ले मेरी बात. 

रावण के प्रस्ताव को, सुनती तृण की ओट, 
पूरी तरह नकारती, कहे नज़र में खोट. 

मानी सीता जब नहीं, सेवक को आदेश, 
जैसे चाहो, लो मना, रख लो कोई भेष. 

रही उपासक राम की, सुता विभीषण तात, 
त्रिजटा ने साहस दिया, शीघ्र बनेगी बात. 
----100-
राम मुद्रिका सामने, सीता थी हैरान, 
आए सेवक रूप में, राम भक्त हनुमान.

मिल कर सीता मात से, दिया उन्हें संतोष, 
एक भरोसा राम का, रक्षक को नहिं दोष. 

बना बहाना भूख का, ले लूँ लंका भेद, 
अनुमति सीता से मिली, करूँ किले में छेद. 

उजड़ा चमन अशोक का, आया अक्ष कुमार,
समर भयंकर जीत कर, उसे लगाया पार. 

रावण के आदेश से, आया बड़ा कुमार, 
मेघनाद लख सामने, लड़ते पवन कुमार. 
----105-
मायावी दानव दिखा, क्रोध करें हनुमान, 
छल बल के उपयोग से, निकला नहीं निदान. 

इंद्रजीत ने ध्यान कर, साध लिया ब्रह्मास्त्र,  
रखा मान हनुमान ने, मर्यादा में शास्त्र. 

क्रोधित रावण पूछता, क्यों करता उत्पात, 
आया लंका किस लिए, बतला पूरी बात. 

आने का कारण बता, मत दे तू उपदेश, 
आग लगाओ पूंछ में, ऐसा था आदेश. 

पूंछ बढ़ी हनुमान की, ज्यों ही लगती आग, 
जलती लंका देख कर, गए निसाचर भाग. 
----110-
कोटे परकोटे चढ़ा, मारी एक छलांग, 
नर नारी भयभीत से, ढूँढ रहे वामांग. 

पूँछ बुझा कर जलधि में, आए सीता पास, 
आएंगे प्रभु शीघ्र ही, ऐसा दे विश्वास. 

वापस आ कर राम से, कही कथा विस्तार, 
कैसे अब आगे बढ़ें, इस पर किया विचार. 

सागर से विनती करें, कोई कहें उपाय, 
नाम सुझाया नील का, पाहन दें तैराय. 

सेतु बनाया जलधि पर, कपि का बढ़ता मान, 
रावण ने पूजा करी, उनको दे वरदान.
----115-
सीता ला कर साथ में, पूजा की संपन्न, 
धर्म निभा यजमान का, दोनों लोग प्रसन्न. 

एक विभीषण ही रहे, चले धर्म की राह, 
रहे भक्ति मन में सदा, अंतर्मन की चाह. 

रावण को देते रहे, अपनी नेक सलाह,  
नहीं भली उसको लगी, रावण बेपरवाह. 

कहने पर माना नहीं, अपने हित की बात, 
देश निकाला दे दिया, मारी भाई लात. 

राम शरण में आ गया, छोड़ा भाई द्वार,
पत्नी बच्चे थे वहीं, छोड़ चले परिवार. 
----120-
शरणागत से भेंट कर, दिए राम अधिकार, 
राज तिलक भी कर दिया, निश्छल करते प्यार. 

संभव हो तो टाल दो, महा समर अभियान,  
सबके हित की बात सुन, दूर रखें अभिमान. 

अंगद को सौंपा गया, दुष्कर कार्य महान,
बुद्धिमान युवराज हैं, रख ले रावण मान. 

शांति दूत अंगद चले, देने ज्ञान प्रकाश, 
वापस सीता को करो, देखो टला विनाश.

दूत रूप में चल पड़े, निकले कोई राह, 
समझ सका रावण अगर, होगा नहीं तबाह. 
----125-
साधारण वानर समझ, चूक गया लंकेश, 
नहीं बैठने को कहा, पसरी पूँछ विशेष. 

खुद को बाली सुत कहा, जिसने बाँधा काँख,
घूम रहा छह माह तक, स्वाद जीत का चाख. 

माना जब रावण नहीं, रखा जमा कर पैर, 
कोई इसे हिला सके, नहीं रहे कुछ बैर, 

उसकी सभा में हुए, पूरे सभी प्रयास,
रावण से उसने कहा, मैं हूँ प्रभु का दास. 

पैर पकड़ना शौक हो, पड़ो पाँव श्रीराम, 
निश्चय ही पाओ क्षमा, जाओ उनके धाम. 
----130-
निश्चय देख रावण का, लगा लिया अनुमान, 
अंगद ने बतला दिया, रावण तू नादान. 

रावण से आज्ञा मिली, आया वीर महान,
मेघनाद से लड़ रहे, लखन लाल बलवान. 

दोनों रत थे समर में, हुआ दिवस अवसान, 
मेघनाद ने शक्ति का, किया तुरत संधान.

तप की शक्ति अमोघ थी, ब्रह्मा का वरदान, 
लखन लाल अचेत हुए, बाकी थी बस जान.

फौरन सुषेण ला सकें, कहें विभीषण राय, 
चले पवनसुत तुरत ही, जैसा कहा उपाय.
----135-
राज वैद्य संकोच से, आए हनुमत साथ, 
प्रान लखन के बच सकें, दवा मिले जब  नाथ. 

संजीवनी उन्हें मिले, होवे नहीं प्रभात,
पहुँच हिमालय ला सके, उसको रातोंरात.

कालनेमि को भेज कर, की बाधा उत्पन्न, 
उसे मार हनुमान ने, यात्रा की संपन्न.  

जगमग देखी रोशनी, भ्रम में थे हनुमान, 
पूरा पर्वत उठा कर, चल पड़े वेगवान.

देख भरत आकाश में, कोई मायाजाल, 
मार गिराया तीर से, राम भक्त बेहाल. 
----140-
हाल भरत ने जब सुना, भाई हुए अधीर, 
तुरत वेग से फिर उड़े, पहुँचे हनुमत वीर. 

दवा पिलाई वैद्य ने, पा जीवन, आह्लाद,
अनुपम शक्ति उन्हें मिली, वध किया मेघनाद. 

महा समर में चल बसे, कुंभकर्ण, मेघनाद, 
बिछड़ पुत्र, भाई गए, मन में भरा विषाद.

अहिरावण हर कर चला, शयन करें रघुनाथ, 
रहा इरादा बलि चढ़ें, दोनों भाई साथ.

सेना में हलचल हुई, गायब दोनों लाल, 
ज्ञान विभीषण का कहे, राम गए पाताल.
----145-
तुरत पवनसुत उड़ चले, संकट मोचन नाम, 
अहिरावण को मार कर, काँधे लाए राम. 

आखिर लड़ने आ गया, हो भीषण संहार, 
भेद विभीषण ने दिया, करें नाभि प्रहार.

अंत समय तक वह लड़ा, छल बल के प्रहार, 
लड़ बैठा अभिमान में, विकट करे हुंकार. 

रावण मारा राम ने, सीता पाती मुक्ति,
भाव जगा विश्वास से, सबकी बढ़ती भक्ति. 

धरती पर रावण पड़ा, छोड़ रहा संसार,
लक्ष्मण भेजे राम जी, सीखो जीवन सार.
----150-
रावण वध कर राम ने, किया जगत कल्यान, 
राज विभीषण को दिया, सीता को सम्मान. 

राम जन्म के पूर्व ही, रावण को था भान, 
वही करेंगे अंत में, दानव कुल कल्यान. 

कठिन साधना से मिला, उसको अनुपम ज्ञान, 
शिव शंकर की भक्ति से, बना बड़ा विद्वान. 

दिखती लीला हर जगह, क्रीड़ा रावण राम, 
जीवन दर्शन दिख सके, हुआ बड़ा संग्राम.

दानव मानव लड़ रहे, नीति काल का युद्ध, 
कैसे वह जीवित रहे, हो कर राम विरुद्ध.
----155-
पूरा कर बनवास को, वापस लौटे धाम, 
साथ लखन सीता सहित, पुष्पक चढ़ कर राम. 

नगर निवासी खुश हुए, आया सुख का काल, 
माताएं भी थीं मुदित, लौटे उनके लाल. 

सब मिल कर पूजन करें, बस जाए प्रासाद, 
गर्व करें सौभाग्य पर, रहे नहीं अवसाद.

अपनी संस्कृति, सभ्यता, हम बैठे थे भूल, 
गहरी थीं उसकी जड़ें, जीवन दर्शन मूल.  

आपस में सहयोग हो, बढ़े प्रेम व्यवहार,  
निर्विरोध पूरा बने, मंदिर एक अपार. 
----160-
नगर अयोध्या में बने, देवालय श्रीराम, 
धरती पावन हो गई, दिव्य बनेगा धाम. 

राम लला को पूजने, आए पंत प्रधान, 
शुभ मुहूर्त को छाँट कर, मंदिर का निर्मान.
----162-
+++++








Monday, 5 April 2021

महत्वपूर्ण ऐतिहसिक दिवस (निश्चित)




मार्च 
-----




-------
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस - 8
-------







--------
रही हमारी सभ्यता, भारत में संस्कार,
आदर महिला को मिले, बहन, सुता या नार.
मन की कोमल भावना, प्रेम, समर्पण भाव,
तुलना कोई है नहीं, छू लो उसके पांव.
श्रद्धा, निष्ठा सब मिले, जो कर लो सत्कार,
वचन प्रेम के दो सुने, हो जाता शृंगार.
महिला अब आगे दिखें, घर, बाहर, परिवार,
निभा सभी दायित्व को, जमा लिया अधिकार.
नारी आज समाज में, करती वह हर काम,
अभी तलक करते पुरुष, जीवन में संग्राम.
इसी लिए सम्मान में, करते हैं आभार,
आदर हर नर कर सके, आठ मार्च साकार.
--------
नमन करूं मैं बारम्बार 
नारी है जीवन आधार,
मात, बहन, बेटी का प्यार,
पत्नी साथ बहें रसधार,
नमन करूं मैं बारम्बार.
कोई दिवस ऐसा नहीं, 
जिसमें न हो तुम्हारा दुलार,
ना ही कोई रात रही,
तुम बिन हो कोई अवतार,
नमन करूं मैं बारम्बार.
कुछ लोगों के बदले विचार,
हुए हीन भाव के शिकार,
समझ उसे वस्तु भोग की,
करते रहे बलात्कार,
ऐसे लोगों को है धिक्कार.
नमन करूं मैं बारम्बार.
रही जरूरत हो सुधार,
हर नारी का हो सत्कार,
हम इसीलिए कर रहे,
आठ मार्च का इंतजार.
--------
कुदरत ने संसार में, रचना करी महान,
नर नारी के नाम से, पुलकित हुआ जहान.
नारी नर से श्रेष्ठ थी, नहीं कहीं संदेह,
लोहा माने सकल जग, करे निछावर नेह.
घर की चक्की चल रही, जब तक हो सहयोग,
बिना मेल के बिगड़ गई, केवल था दुर्योग.
आठ मार्च को मिल गया, महिला को सम्मान,
फैशन के इस दौर में, बिकता सब सामान.
अपनी कला दिखा सकें, अवसर है अनुकूल,
गायन, नाटक याद सब, पाक कला को भूल.
आगे हैं हर क्षेत्र में, शिक्षा या विज्ञान,
साँसद, नेता भी बनें, वोटर का गुणगान.
-------
फरवरी 
------

---------
Wet Lands Day - 02
----------



----------
वेट लैंड के नाम से, जाने यह संसार,
संरचना प्राकृतिक है, कुदरत का उपहार.
इनका संरक्षण करें, लेवें लाभ अनेक,
जीव जन्तु संतुलन से, सारा जग हो एक.
गीला थल दलदल बने, उसमें कभी न जाय,
उसमें फँसता ही चले, मुश्किल से बच पाय.
भूमि सुरक्षित यह रहे, कमी आपदा आय, 
विश्व ताप ना बढ़ सके, ऐसे करें उपाय.
पेड़ उगें, जीवन चले, बाढ़ नहीं आ पाय,
जल का स्तर भी ना बढ़े, पशु पक्षी पल जाय.
ऊँचे भवन यहाँ बने, सुरक्षा दरकिनार, 
लालच की सीमा नहीं, जान माल पर वार.
--------
जनवरी
------

-------
जनवरी 26- गणतंत्र दिवस 
-------


------
अनुपम यह दिन आ गया, सबके दिल उल्लास,
एक सुनहरे भविष्य की, जगती सब में आस,
जगती सब में आस, करे प्रगति राष्ट्र अपना, 
कला, विज्ञान, शोध का, सच हो शीघ्र सपना,
सन छब्बीस याद रहे, हों सबके प्रयास सुगम,
सभी घरों में मने, हर्ष भरा पर्व‌ अनुपम.
-------

जनवरी 25 - मतदाता दिवस  

---------



------

आज किया सरकार ने, मतदाता का ध्यान, 

वोट बैंक भी चाहते, उनका कर सम्मान. 

मतदाता को चाहिए, करे वोट अधिकार,  

बिना स्वार्थ मतदान से, सुखमय हो संसार. 

हक का मौका जब मिले, चुन कर नेता लाय, 

अच्छा नेता वह नहीं, जो सब को भरमाय. 

------

जन्मदिन - 23 जनवरी- नेताजी सुभाषचंद्र बोस
------



------
नमन बोस को हम करें, मने जन्मदिन आज, 
श्रद्धा नत मस्तक रहा, माने सकल समाज. 
नेताजी के जनम को, हुए सवा सौ साल, 
संघर्षों से जूझते, पूरे जीवन काल.
तेज पढ़ाई में रहे, किया सदा ही टाॅप, 
बंगाली प्रतिभा कहे, नेताजी हैं आप. 
आज़ादी हित ली बना, फौज अलग ही एक, 
मतवाले सैनिक रखे, खोते नहीं विवेक. 
बाहर से भी मदद ली, साहस के प्रतिमान, 
नारा चलो दिल्ली का, करो खून का दान. 
रही प्रबल जब भावना, आजादी संग्राम, 
हर दिन हो संघर्ष का, बिना किसी विश्राम.
------


-------

जनवरी -10 - विश्व हिंदी दिवस 

--------




------

दिवा स्वपन था अटल का, गूँजी थी आवाज, 

विश्व दिवस हिंदी मने, खोले मन के राज.

मान विदेशों में मिला, देखो जमती धाक, 

हिंदी के उपयोग से, ऊँची होती नाक. 

जन मन की भाषा बने, करिए व्यक्त विचार, 

सही ढंग से कह सको, अंतस के उद्गार. 

जमे समझ में, ठीक से, करते रहो प्रयास,

भाषा चाहे जो रहे, मूल भाव आभास. 

अच्छे से करिए प्रकट, मन की पूरी बात, 

श्रोता के मन को छुए, कटती तामस रात. 

हिंदी में भी कह सकें, अपने मन के भाव, 

गर्व सभी बोली करें, कोई नहीं दुराव.

-------

जग में हिंदी को मिला, उसका सम्यक स्थान, 

अपने भारत देश में, कुछ करते अपमान. 

हिंदी में भाषण दिया, बढ़ा अटल का मान, 

मना विश्व हिंदी दिवस, भारत का सम्मान. 

हिंदी में सोचें, लिखें, और करें सब बात, 

सरल ढंग से व्यक्त हों, टल जाएं अपघात.

------

दिसम्बर 
------




------
रक्षा दिवस - 16 - बांग्ला देश स्थापना दिवस 
------
सेना में रक्षा करें, अपने वीर जवान, 
माटी की सौगंध ले, देते अपनी जान.
घर को वापस आ गए, भूले उनकी आन, 
वहीं सदा जो सो गए, पा शहीद का मान. 
अक्सर होता है यही, बहते आँसू चार, 
बाद निधन के हो गया, सूना घर संसार.
बड़ी वीरता से लड़े, ध्वज में लिपटी शान, 
हुई जीत भी अंत में, रखा देश का मान.
सैनिक ही मरते सदा, कहता देश शहीद,
राजनीति के खेल में, उनकी हो बकरीद. 
समर भयंकर है सदा, करगिल हो या लेह. 
होती चिंता हर तरफ़, तजते सैनिक देह.
------
परिनिर्वाण दिवस - 6 - डाॅ. भीमराव आंबेडकर
-----


-------
भीमराव पधार गए, आज दिवस गोधाम, 
नाम अमर अपना किया, याद करो सब काम.
शीर्ष बाबरी का गिरा, हुई तीन सौ मौत, 
आतंकी हिंदू गिने, माना उनको सौत. 
शासन की गोली चली, करने काम तमाम, 
छह बारह को बोलिए, मिल कर जय श्रीराम.
-------
नवम्बर 
-----
बाल दिवस - 14
---------



------
बाल दिवस के नाम पर, करें याद बलिदान,
आज़ादी हित कर दिए, चारों सुत कुरबान.
गुरु गोविंद महान का, मानें हम उपकार, 
रहे अजित, जुझार, फतह, जोरावर सुत चार.
देर तनिक भी ना हुई, दे दी अपनी जान,
रक्षा अपने धर्म की, मातृ भूमि सम्मान.
ले कर उनसे प्रेरणा, जागा है अभिमान,
आगे से होगा नहीं, भारत का अपमान.
श्रद्धांजलि सच्ची यही, हो ना अत्याचार,
साहस से कर सामना, देवें कर्ज़ उतार.
इच्छा आजादी रही, सपने हों साकार,
और नहीं हम पर करे, कोई अत्याचार.
------
अक्तूबर 
-------
सरदार पटेल जयंती - 31
-------
रहे एकता भारत की, उनका अद्भुत ख्वाब,
सच्चाई पर ही चले, वह सरदार जनाब.
निर्णय हित में देश के, कर पाए सरदार,
मिले नहीं नेहरू से, उनके कभी विचार.
उनकी नीति सही लगीं, माने सारा देश,
भारत हो अखंड सदा, उनका था संदेश.
--------
सितम्बर 
-------

विश्व हृदय दिवस - 21 सितम्बर 

-------


------

दिल को काबू में रखें, इसका कर उपचार, 

वरना इसके खेल से, होगा अत्याचार. 

समय समय पर कीजिए, रक्त चाप की जाँच, 

नहीं कभी ऐसा घटे, आए उस पर आँच. 

सेवन कम चीनी, नमक, घी, मक्खन उपयोग

सावधान आघात से, जीवन भर का रोग. 

अच्छी सेहत के लिए, कसरत, श्रम, व्यायाम, 

बढ़ी आयु में कीजिए, आवश्यक आराम. 

लें अंग्रेजी ही दवा, ऐसा नहीं हुजूर, 

देसी का भी फायदा, देगी लाभ जरूर.

होम्योपैथी है भली, नहीं असर कुछ और, 

क्वाथ, लेप भी कर सकें, करिए थोड़ा गौर.

------

सितम्बर 15 - अभियंता दिवस 

-------


------

सृजन सृष्टि समान करें, ब्रह्मा का वरदान, 

अभियंता उनको कहें, बढ़ता मानस मान. 

मोक्षगुंडम लगा दिए, प्रतिभा, अनुभव ज्ञान, 

भारत रत्न उन्हें मिला, किया देश कल्यान. 

जन्म दिवस समर्पित है, अभियंता के नाम, 

बारंबार नमन करें, यही बड़ा ईनाम. 

------

सितंबर 14 - राजभाषा दिवस

+++++++



-------

कहने को सरकार ने, भाषा हिंदी नाम,

दे आश्वासन कह दिया, होगा सारा काम.

केवल कागज पर दिखा, यह सरकारी काम,

पता चला व्यवहार में, हिंदी को विश्राम. 

बोल रहे सबसे अधिक, हिंदी अपने देश,

राजनीति ला कह रहे, यह मेरा संदेश.

हो हिन्दी अब लोकप्रिय, बने हमारी शान,

हिंदी में सब काम हो, बढ़े देश का मान.

हिंदी में हस्ताक्षर हों, नहीं कठिन यह काम,

निर्णय न्यायालय लिखें, हिंदी में हो काम.

बढ़े मनोबल आप का, करें हर्ष से काम, 

उत्साहित हों देख कर, हिंदी में परिणाम.-

------

दिल से हिंदी चाहिए, चिंतन को विश्राम,

जो सोचें, वही करें, नहीं दिखावा काम.

कठिन शब्द से बच सकें, कर के सरल प्रभाव,

बिन आडंबर के कहें, अपने मन केंंँऔ भाव.

जन मानस की बात हो, बिन बोले कह जाय,

भाषा बाधा ना बने, शब्दों को उलझाय.

एक दिवस हल्ला करें, बाकी दिन आराम,

शासक वृंद मौज करें, लें हिंदी का नाम. 

शोर मचा कर नाम दें, हिंदी को सम्मान,

केवल बढ़े प्रचार ही, मिले मुफ़्त में दान.

उस दिन हिंदी का दिखे, गुंजन चारों ओर,

नाटक, सम्मेलन किए, भूले अगली भोर.

---------

भाषा अपने देश की, आती है नित याद, 

स्वतः स्फूर्त विचार कहें, निज भाषा संवाद. 

हिंदी भाषा शुद्ध हो, कहें सभी विद्वान, 

मन में आया, बोल दें, फिसली नहीं जुबान. 

एक दिवस ही साल में, हिंदी का गुणगान, 

बाकी सारे समय हो, अंग्रेज़ी पय पान. 

अंग्रेज़ी दीमक लगी, मन होता कमजोर, 

लगते भाव उधार के, भीतर है कुछ और. 

सीख दूसरों को भली, कहते जिम्मेदार, 

बढ़-चढ़ कर भाषण करो, काफी लच्छेदार.

बोलो वह, जो दिल कहे, मत पीटो तुम ढोल,  

दे कर भाषण एक दिन, हो जाओगे गोल.

----------

अपनी भाषा छोड़ कर, गैरों को सम्मान, 

अपना जन मानस रहा, अंग्रेजी वरदान. 

नाम राजभाषा हुआ, अंग्रेजी में काम, 

भारत की भाषा सकल, ढूँढें उसका नाम. 

गौरव अपनी सोच का, कर देता अभिभूत, 

चिंतन मातृ भाषा में, सार्थक करें सपूत. 

एक दिवस नाटक रचें, कर सरकारी काम, 

बाकी सारे साल भर, हिंदी को विश्राम. 

दक्षिण तो बदनाम है, दिखता नहीं विरोध,  

अपने लगते हैं सभी, जब हो जाए बोध.

करता हूँ अनुरोध यह, हो सब भाषा मान, 

माध्यम बनी विचार की, अभिव्यक्ति प्रतिमान. 

-----

हिंदी भाषी कर रहे, अंग्रेजी में बात,
झूठी शान दिखा, करें, हिंदी पर आघात.

हिंदी का प्रचार करो, लो लाखों अनुदान,
भाषा का प्रचार नहीं, बस, सरकारी शान.

मूल लक्ष्य को भूल कर, कुछ भी करें बखान,
लिख कर झूठे आंकड़े, पा लेते सम्मान.

अब तो बाहर भी मिला, हिंदी को सम्मान,
पर, भारत में घट रहे, हिंदी के कदरदान.

जब से गूगल आ गया, बहुत हुआ आराम,
हिंदी में संभव हुआ, सब तकनीकी काम.

राजभाषा में कर सको, अपना पूरा काम,
ऊपर से सहयोग पा, कस कर रखो लगाम.
--------

धीमी गति से हो रहा, राजभाषा प्रयोग,
हिंदी में लेखन नहीं, यह कैसा दुर्योग.

अंग्रेजी में काम कर, फाइल आगे जाय,
हिंदी में लिख टिप्पणी, हीन भावना आय.

लाखों का खर्चा करें, होता नहीं प्रसार,
राजभाषा को मान दें, सच्चा हो श्रंगार.

हिंदी पखवाड़ा मना, पिछले बासठ साल,
ऐसी आँधी चले अब, सबको लगे मिसाल.

नाटक और न कीजिए, पखवाड़ा मन जाय,
मूल भाव मन में रहे, हिंदी को अपनाय.

हिंदी अधिकारी बनूँ, पाऊँ सकल पगार,
महज़ सितम्बर माह में, करूँ हिंदी प्रचार.

हर जन फाइल में लिखे, हिंदी का रख मान,
सार्थक राजभाषा हो, मिल जाए पहचान.

नराकास रखती व्यस्त, ले कर सबके हाल,
हिंदी-सेल बता रही, नया मसाला डाल.

हिन्दी के प्रसार में, उदार भाषा नीत,
भाषा अपने क्षेेत्र में, होती प्रथम प्रतीत.

भाषा के उपयोग में, अँग्रेज़ी का स्थान,
गरिमा, शुचिता में नहीं, हिंदी का सम्मान.
----------

मोहपाश में बँध गए, प्यारी लागे, पराई बानी,
अपनी भाषा बोलन में, लागत लाज लजानी.
---------

दिवस एक ही में खुश है, हिंदी पाकर के सम्मान,
शेष दिनों में होता है, अंग्रेजी का गुण गान,
अंग्रेजी का गुण गान, रटा रटा कर करते प्रतिभा कुंठित,
ज्ञान हिंदी का होने पर भी, कभी न होते गर्वित,
राजभाषा के प्रयोग से, बढ़ाओ अपना साहस,
हर रोज़ गर्व से मना सकें, हम हिंदी दिवस.
------

सितम्बर 5 - शिक्षक दिवस
---------






--------

जीवन भर हम सीखते, कैसे बनें हम आर्य,
इसको संभव कर सकें, मात, पिता आचार्य.
शेष जगत के लोग भी, देते हमको ज्ञान,
बल, चातुर्य, विवेक का, रखें सदा ही ध्यान.
अनुभव जो देता हमें, मानें गुरू समान,
आज देश में मिल रहा, यारों को भी मान.
विद्या से मिलती हमें, समझ, बूझ संदेश.
उसे बढ़ाने के लिए, गुरुजन दें उपदेश.
गुरू सिखाते हैं सदा, न्याय, शक्ति और धर्म,
आगे जीवन-पथ चलें, करके अच्छे कर्म.
करें याद, हम ले सकें, गुरुजन से आशीश,
देव कृपा सब पर रहे, भली करें जगदीश.

-------

गौरवमय अतीत रहा, कहता है इतिहास,

तैंतिस प्रतिशत मात्र में, हो जाते हम पास.

जो कुछ भी हम आज हैं, शिक्षक का था हाथ,

उन से शिक्षा ले बढ़े, पा कर उनका साथ.

शिक्षा नहीं किताब की, देते नैतिक ज्ञान,

बात भली जिस से मिले, उसको गुरु लो मान.

मुरगा बन हम ने रखा, अपने गुरु का मान,

लाज नहीं हमको लगी, जब होता है भान.

उत्सुकता में हम करें, नित नव भिन्न प्रयोग,

सीख उसी से मिली हमें, भागे मन के रोग.

खेल-खेल में सिखा कर, किया हमें मजबूत,

वह सब तो अब भूलते, कोई नहीं सुबूत. 

------

याद करें इतिहास को, लेते अनुपम सीख, 

अहंकार के दमन से, मिलती श्रम की भीख. 

नमन करो गुरुदेव को, मन में भक्ति लाय,

सच्चे मन से याद हो, हरि दर्शन हो जाय.  

गुरूकुल में बच्चे पढ़ें, मिले अद्वितीय ज्ञान,

गर्व करें संस्कार पर, भारत का अभिमान.

शिक्षक से शिक्षा नहीं, तुम पाओ संस्कार, 

गूढ़ बात बतला सके, करे शिष्य को प्यार. 

सब कुछ संभव ज्ञान से, अर्जन मान सम्मान, 

मिलता अधिक समाज में, जो होता विद्वान. 

राधा कृष्णन जन्म पर, करते आदर मान, 

शिक्षक दिवस पुकार कर, करते हम सम्मान.

--------

क्या-क्या सीखा आप से, नहीं हमें है ज्ञान, 
अब हमारा नंबर है, कर लें कुछ सम्मान.

मात-पिता के बाद है, गुरु का गुरु स्थान, 
पहले चरणों में नमन, करें बाद में ध्यान.

सीख गुरू की मान लें, आते उच्च विचार, 
जीवन में अपना सकें, कर उनका आभार.

शिक्षक दिवस मना रहे, देखो हम हर साल, 
हल रखते हर बात का, कुछ भी करें सवाल.

पाँच सितम्बर आ गया, कर लो उनको याद, 
भारत के इतिहास में, शिक्षक की फरियाद.

राधाकृष्णन याद हैं, मंद मुदित मुस्कान, 

शिक्षा उनकी प्रेरणा, स्वयंं गुणों की खान.

++++++

माता पहली शिक्षिका, दूजा पिता का स्थान,
गुरु की कृपा बिन न मिटे, मति का भ्रम, अज्ञान,
मति का भ्रम अज्ञान, छटें संशय के बादल,
बदले नज़रिया, खुले ज्ञान चक्षु, हों खुशी से पागल,
बढ़ी जानकारी, सद्भाव, संबंध सभी से जुड़ जाता,
घर परिवार की प्रथम शिक्षिका, सबसे आगे माता.
----------

शिक्षक समाधान कर रहे , अपने अनुभव के साथ ,
प्रशस्त मार्ग कर रहे , अपने ज्ञान के साथ ,
अपने ज्ञान के साथ , छात्रों पर प्यार लुटाते ,
नव तकनीक के साथ में , अपना क्षेत्र बढ़ाते , 
खुद सीखते , हमें सिखाते, संस्कृति के ये रक्षक ,
गर्व, सम्मान बढ़ाते हमारा, सुखी हमारे प्रिय शिक्षक .

अगस्त
-----

अगस्त 21 - वरिष्ठ नागरिक दिवस 

------




++++++

उमर बढ़ी, हम भी बढ़े, बूढ़ा हुआ शरीर, 

बढ़ी समय के साथ ही, अपने तन की पीर.

अनुभव पाया आयु से, पाया जीवन सार, 

प्रेम, भाव भी पा सके, भावों के उद्गार. 

भारत में भी मिल रहा, बूढ़ों को सम्मान, 

करें भले ना नौकरी, अलग बनी पहचान. 

पहले जन सुविधा मिले, लगती अलग कतार, 

टीका भी पहले लगा, आदर का व्यवहार. 

चालू वय वंदन रहे, सोच रही सरकार, 

युवा वर्ग भी सोचता, वे पाए उपहार. 

बूढ़ों की सेवा करें, रख लें छोटे ध्यान,

आदर उनको हर जगह, मिल जाए सम्मान. 

+++++

उम्र अधिक हो साठ से, पाओ खास स्थान, 

देती है सरकार भी, उन्हें विशेष सम्मान.

बढ़ी आयु में तन रखें, अपने मन अनुकूल, 

बचें सभी अपघात से, दुस्साहस को भूल.

अनुभव का उपयोग कर, रखें विचार महान, 

सीख दूसरे ले सकें, इस पर करें गुमान. 

+++++

बड़े जनों का ध्यान भी, रखती है सरकार, 

लाभ अधिक मिलते कहीं, बिना किसी तकरार. 

वायुयान की यात्रा, हों रियायती दाम, 

आरक्षण भी रेल का, देता है आराम. 

अपनी पूँजी पर मिले, थोड़ा ज़्यादा ब्याज, 

जल्दी से निपटाइए, रहे अधूरे काज. 

------

तनिक बड़े जब हो गए, साठ साल के पार,
सेवा से छुट्टी मिली, हो पेंशन आधार.

अधिक आयु के जन करें, अपने अनुभव गान,
याद ज़माने की करें, रख कर मृदु मुस्कान.

नाती पोते व्यस्त हैं, सुनें न उनकी बात,
जीवन शैली अलग है, कौन कहे जज्बात.

वरिष्ठ पाते रियायतें, जो देती सरकार,
रेल किराया कम लगे, उसके वह हकदार.

जमा आपकी बचत पर, मिले अधिक कुछ ब्याज,
श्वेत-केश को मान दे, साथी और समाज.

लगें बुढ़ापे में अधिक, तन-मन के कुछ रोग,
रखिए स्वस्थ शरीर को, कर रोजाना योग.

-----------
अगस्त 15 - स्वतंत्रता दिवस
--------





---------

घटना दुर्घटना बनी, अभी छिहत्तर साल,

देश विभाजन हो गया, नेता करें कमाल.

आज़ादी के नाम पर, माता पाती घाव,

एक तिरंगा खोल कर, खेले कितने दांव.

कहने को आज़ाद हैं, नहीं मूल अधिकार,

कोर्ट, पुलिस के फेर में, हो जीवन बेकार.

नहीं देश का ध्वज रहे, नहीं कहीं कानून, 

विद्रोही तत्पर खड़े, चढ़ने लगा जुनून.

जज भी नेता पालते, दोषी हैं आज़ाद,

तारीखें लगती रहीं, चमचे करें फसाद.

कहने को तो नियम हैं, पर पालन लाचार,

धन वालों की चल रही, है निर्धन बेजार.

--------

अंग्रेजों ने दी हमें, कहने को आज़ाद,

आदत तो बदली नहीं, जो करती बरबाद.

जाति, धर्म के फेर ने, खूब कराया भेद,

कुचल भाव संस्कार को, भूले चारों वेद. 

कहने को आजाद हैं, विचार रहे गुलाम.

रिश्वत, अशिक्षा करती, भारत को बदनाम.

वोटों की खातिर मिला, दलबदलू का नाम,

आश्वासन दें मुफ़्त का, राजनीति बदनाम.

चोरी, हत्या लूट के, खेल दाँव पर दाँव,

कौन सज़ा दे बाद में, पूरे हुए चुनाव.

सच्ची आजादी कहें, सबका हो सम्मान,

रहें सुरक्षित भेद बिन, पा अधिकार समान. 

-------

माता के बंधन खुले, भारत था आज़ाद, 

पंद्रह अगस्त को मिली, बड़ी प्रतीक्षा बाद. 

बापू, चाचा ने लड़ा, एक विकट संग्राम, 

भूल गए हम बीच में, लाल, पाल के नाम. 

अमर हुए इतिहास में, बोस और आज़ाद,   

भीम, गोखले, तिलक भी, सदा रहेंगे याद. 

सपने देख शहीद हुए, भारत माँ के लाल, 

उनको बिसराएं नहीं, जल कर बने मशाल. 

अपने नेता चुन सकें, जनता का विश्वास,

संसाधन अपने रहें, समुचित करें विकास.

भारत माँ को नमन करें, बन कर वीर सपूत. 

सोचो स्वर्णिम काल की, करो याद मत भूत.

------

आजादी से खुश सभी, बने नए संबंध,
संविधान अपना रहे, खत्म हुए प्रतिबंध.

झूठ-मूठ में रूठते, करते गलत प्रचार,
वोटों की गणना प्रबल, कुरसी का आधार.

ग्रहण जाति का लग गया, रोज करें अपमान,
स्वयं देश को लूट कर, डालें नित व्यवधान.

सीमा पर रक्षा करें, सैनिक वीर जवान,
खेतों में पैदा करें, अन्न देव भगवान.

आती सुख-सुविधा नई, हो तकनीक विकास,
सब को सब कुछ मिल सके, होगा यही प्रयास.

सबको खुशहाली मिले, सबका हो अधिकार,
राग द्वेष को दूर कर, बढ़ता जाए प्यार.
-------

हम संतानें भारत माँ की, हमने आज़ादी देखी है.
अनुभव की हैं, साँसें, न कोई मुश्किल झेली है.
विकसित हुए विज्ञान के आयाम, हर क्षेत्र में नाम कमाया है,
गौरवमय अतीत की समृद्धि को नव सोपान दिखाया है.
प्रयास किया जाति, धर्म, भाषा मुक्त समाज बनाने का,
स्वर्णिम इतिहास रचा कर, यश, मान कमाने का,
शिक्षाकलम से, एक सच्चाई लिखी है,
हम संतानें भारत माँ की, हमने आज़ादी देखी है.
करे प्रयास दूर गरीबी हो, श्रम कण चमकें,
सुरक्षित सीमाएँ हों, केसर की घाटी महके.
श्रमिक रोजगार संभालें, मिले हाथ को काम,
तन मन स्वस्थ रहे सदा, सर्दी हो या घाम,
समय से वर्षा भरपूर हो, नहीं बाढ़ की चिंता,
अद्भुत न्याय प्रक्रिया से, रहें सम्मान से जिंदा.
हर व्यक्ति की जीवन शैली, आदर्श नागरिक सरीखी है
हम संतानें भारत माँ की, हमने आज़ादी देखी है.
पर, कब घुन लग गया, माँ की सेहत प्यारी में,
सत्तर वर्षों की परवरिश, सिमट गई मक्कारी में,
ग़द्दार सब कुछ चाट गए, खाकर माल मलाई,
जनता लुटती विवश सी, हुई नहीं कोई सुनवाई.
भाषा, जाति धर्म के बंधन में, स्रोत हो गए रीते,
संसाधनों का शोषण कर, अपनी खातिर जीते,
अंतरात्मा तक सो गई, तब जाकर वह चीखी है,
हम संतानें भारत माँ की, हमने आज़ादी देखी है.
आओ, आज करें आह्वान, सुंदर स्वच्छ भारत का,
जाति, धर्म, प्राँत, भाषा से मुक्त बनाने का,
सच्चाई, ईमानदारी, सहयोग की रोटी खाने का,
हो गर्व हमें अपनी संस्कृति, धरोहर, सम्मान का,
सुधरें संबंधी पड़ोसी से, अन्तर्मन में हो सद्भाव,
रिश्वतखोरी, स्वार्थ मिटे, जिए हर इंसान बाइज़्जत,
कर समाप्त घृणित राजनीति, प्यार मुहब्बत परखी है.
हम संतानें भारत माँ की, हमने आज़ादी देखी है.
-----------

सात दशक पूर्व रचा गया, एक नया इतिहास,
फिरंगियों की दासता गई, जागा नव विश्वास,
जागा नव विश्वास, विकास के सुखद आयाम,
कृषि, विज्ञान, तकनीक में, खूब कमाया नाम,
उपलब्धियों की चर्चा भली, करें प्रयास दिन रात,
गरिमामय स्वर्णिम अतीत की, याद करें  जन्मों तक सात.

---------

अगस्त 14 - ओ.एन.जी.सी. दिवस

--------


----------

पिछले अड़सठ साल में, रचें नव कीर्तिमान,

इसका यह इतिहास है, गौरवमय अभिमान.

चमका ओ.एन.जी.सी., कहता है दास्तान,

तेल, गैस की खोज में, अनोखा योगदान.

खोजा जल, थल हर जगह, छोड़ा कोई स्थान,

कई सपूतों ने दिया, जीवन का बलिदान.

किया सुरक्षित स्वयं को, स्वदेश का प्रतिमान, 

अर्थ व्यवस्था ठीक हो, बढ़ता गौरव मान.

क्रूड ऑयल शोधन कर, खुद की बन पहचान, 

अपना नव तकनीक को, बना नए कीर्तिमान.

रखा रिटायर बाद भी, सब अपनों का ध्यान, 

बीमा, पेंशन है नहीं, पर मेडिकल प्रमान.-

--------

तेल कंपनी बन गई, पहले सड़सठ साल,
चुने सिपाही लग गए, बिछा कूप का जाल.
ओ.यन.जी.सी. कर रही, हर विधा में कमाल,
तेल गैस की खोज से, हम सब मालामाल.
शेष नहीं जल-थल में, भारत का भू-भाग,
वेधन, उत्पादन करें, चमके सबके भाग्य.
इतर देश के पा सकें, हम ऊर्जा भंडार,
साहस श्रम अपना रहे, बढ़ा सकें व्यापार.
नहीं और दोहन करें, तेल गैस के स्रोत,
खोजें और विकल्प भी, शक्ति से ओतप्रोत.
एक कंपनी रूप में, बढ़ा लें शुद्ध लाभ,
तिमिर भूत का काट कर, चमकें ज्यों अमिताभ.

------

सन छप्पन से आज तक, बना एक इतिहास, 

कितने वीरों ने किए, मिल कर सभी प्रयास. 

महारत्न संज्ञा मिली, बढ़ा हमारा मान, 

तेल, गैस की खोज में, भारत बना महान. 

जंगल-जंगल सूँघते, भू-विज्ञानी संत, 

महक तेल की पा सकें, सहें कष्ट अनंत. 

नगर, बाग, तालाब में, करते हैं विस्फोट. 

सेस्मिक लहरें भेदतीं, अंदर पाएँ खोट. 

धरती पर वेधन करें, मिले जहाँ पर तेल, 

सागर भी छोड़ा नहीं, लहरें करती खेल. 

तेल, गैस निकले मगर, रहे सुरक्षा खास, 

बचे रहें अपघात से, ऐसा है विश्वास. 

-------

चौदह अगस्त को बनी, बड़ी कंपनी एक, 
चुने हुए कुछ जन लगे, भू-विज्ञानी अनेक. 
जंगल-जंगल घूम कर, ढूँढा था दिन-रात, 
वर्षों की मेहनत से, मिल पाई सौगात. 
धरती सागर छन गया, कहाँ छुपा है तेल,
रहे खोजते गैस भी, कब हो जाए मेल. 
एक किए सब रात दिन, शीत, घाम, बरसात, 
जल, थल में छोड़ा नहीं, जब तक चली बिसात. 
जगह-जगह थे खोजते, करे बिना आराम,
वेधन शोधन भी करें, तेल गैस का काम.
महारत्न निकाय हुआ, बनी एक पहचान, 
ओ.एन.जी.सी. दिल में, बसी हमारी जान. 
------
अगस्त 13 - अन्तर्राष्ट्रीय वामांग दिवस
-------




  
------
लिखते बाऐं हाथ से, होते प्रतिभावान, 
उनको कुदरत से मिला, अनुपम यह वरदान. 
बुद्धि विलक्षण पा गए, नहीं किसी से हीन, 
काम करें सब वाम से, खोजें ढंग नवीन. 
रही लिखावट सुघड़ सी, पढ़ने में आनंद, 
सरल हृदय, निश्छल लगें, मुस्की मधुरिम  मंद. 
दायाँ आता बाद में, पहले आता वाम,
कदमताल अभ्यास में, रही प्रथा अविराम. 
वाम हस्त आगे रहे, छूटे तीर कमान, 
पकड़ दुनाली हाथ में, करो शस्त्र संधान. 
बल्ला बाँए हाथ में, रन की हो बरसात, 
आउट उसको कर सकें, है किसकी औकात. 
------
अगस्त 4 - जड़ी-बूटी दिवस 
------





-------
जीवन में है स्वास्थ्य का, करें नहीं माखौल. 
नहीं खेल इस से करें, रखो स्वस्थ माहौल.
स्वस्थ बदन से कर सकें, जग के सारे काज, 
खेल कूद संभव बने, लगे न कोई लाज. 
सजता शाकाहार से, तन, मन और विचार, 
बिना मिलावट, कुदरती, भोजन है आधार.
दवा रूप में लाभ दें, पत्ती, जड़, फल फूल,
सभी व्याधि को हर सकें, मिले सदा को शूल. 
दवा मिले सब रोग की, कारण से उपचार, 
कूट, छान या पीस कर, ऊर्जा का संचार. 
मना आज हमने लिया, बूटी दिवस अनूप, 
तन की व्याधि दूर करे, निखरे सुंदर रूप.   
------
जुलाई
------




------
जुलाई - 1 चिकित्सक दिवस 
------





-------
करो चिकित्सक से नहीं, भूले से भी वैर,
मुश्किल में जब जान हो, वही मनाता खैर.
डॉक्टर अपने विषय का, रखते पूरा ज्ञान,
कैसा भी रोगी रहे, पूरा करें निदान.
दिल, हड्डी या आँख हो, बड़ा कमाते नाम,
रहे कान का मामला, दाँतों को आराम. 
रक्त चाप की गड़बड़ी, साँसों की तकलीफ,
पूरे टेस्ट करे जहाँ, मिल जाती तारीफ.
देखे जब इंसान को, बातें बेसिरपैर,
डॉक्टर कहे दिमाग का, कर लो पैदल सैर. 
रहें आप दुरुस्त सदा, खाएं सेब हर रोज,
डॉक्टर भी आए नहीं, खूब मनाओ मौज.
------
एक जुलाई को करें, चिकित्सकों का मान, 
शंका सारी दूर हों, कहें बिना व्यवधान. 
उनकी प्रतिष्ठा खुद बने, सही रोग उपचार, 
बड़े ध्यान से सुन सकें, रोगी को दें प्यार. 
रखते कोविड काल में, खास सभी का ध्यान, 
ठीक हुए रोगी जहाँ, बढ़ता डॉक्टर मान.
खतरे में खुद को रखें, फिर भी रोगी ख्याल, 
बिना कहे सब जान ले, उसका पूरा हाल. 
दूर दूर से फोन पर, लेते लोग सलाह, 
नहीं छुपा उपचार है, कोविड की परवाह. 
सेवा उनका धर्म है, रोगी देव समान, 
अलग महारत पा करें, वह अभ्यास सुजान.
------
जून
-----


जून 21 - विश्व योग दिवस 
------


-------
मनते जून इकीस को, दिवस योग, संगीत,
करें उच्चार ओम का, चले साथ में गीत.
स्वस्थ हमारा तन बने, मन भी रहे प्रसन्न,
योगाभ्यास रोज करें, मन नहीं हो खिन्न.
करो निरंतर साधना, गायन, वादन नृत्य,
योग क्रिया के फायदे, करते अद्भुत कृत्य.
माँस पेशियाँ भी बने, सुंदर और सुडौल,
योग धर्म से जुड़ गए, मीठे अपने बोल.
हो कसरत के साथ में, थोड़ा सा व्यायाम,
श्वसन तंत्र मजबूत हो, थोड़ा सा आराम.
गायन पूरे चाव से, करिए रोज जरूर,
खुल जाते हैं फेफड़े, आता तनिक सुरूर.
-------
ज्ञान पतंजलि से हुआ, जग में योग प्रचार, 
उनको हम सम्मान दें, कर उनका आभार. 
मने जून इक्कीस को, योग दिवस हर साल, 
करिए गर्व अतीत पर, भारत था खुशहाल. 
योग दिवस पर दीजिए, अपने तन पर ध्यान,
नियमित जब अभ्यास हो, कुदरत का वरदान. 
साथ करें अभ्यास के, थोड़ा प्राणायाम, 
श्वास नियंत्रण हो सके, मन पाए आराम. 
जीने का आनंद है, चलें हाथ अरू पाँव, 
सोच भली लगती रहे, जीवन शीतल छाँव. 
खुली जगह में कीजिए, हाथ पैर विस्तार, 
गहरी सांसें लीजिए, रखें शांत व्यवहार.
------
जून - 15 विश्व वायु दिवस 
------  




------
पंद्रह जून मना रहा, वायु दिवस संसार,
जीवन अपना वायु से, वही श्वास का सार. 
स्वच्छ वायु सबको मिले, जीवन का आधार,
नहीं प्रदूषण तनिक भी, होता हर्ष अपार.
मतलब इसका समझते, दुनिया भर के देश,
इसी लिए सब कह रहे, दे कर यह संदेश.
पी.यू.सी. नियमित करें, वाहन की हो जाँच, 
नहीं धुआँ उगलें कहीं, नहीं स्वास्थ्य पर आँच. 
अपनी हरित वसुंधरा, बने जगत की शान,
स्वस्थ लोग फूलें फलें, उनका हो सम्मान.
सार्थक आज दिवस रहे, जागृति का अभियान,
मने प्रदूषण रहित यह, कार्बन का योगदान.
-----
जून -12 विश्व बाल श्रम दिवस
-----




-------
बचपन निकला भूख में, रोटी रही जुगाड़,
कैसे पेट भर सकें, समाज करे बिगाड़.
अपने मतलब के लिए, लें बच्चों से काम, 
शोषण तन, मन का करें, कमती देते दाम.
उमर खेलने की रही, करना पड़ता काम,
मजदूरी से ही पले, घर के लोग तमाम.
सभी बराबर पा सकें, भोजन, जल आधार, 
सारे बच्चे ले सकें, शिक्षा का अधिकार.
सामाजिक अंतर मिटे, शासन करे प्रयास,
सब सम अवसर पा सकें, लगती स्वर्णिम आस, 
लगे हुए इस काम में, एन. जी. ओ. तमाम,
लक्ष्य भला उनका लगे, मिले सफलता नाम. 
-----
जून 5 - विश्व पर्यावरण दिवस 
-----


-------
जीवन दे ईश्वर किया, हम सब पर उपकार,
जल, थल, भोजन, वायु का, करते हम आभार.
दायित्व हमारा बनता, रख लें भली प्रकार,
नष्ट उसे ना हम करें, सोचें कुछ उपचार.
पाॅलीथिन का कम करें, रसोई में प्रयोग,
स्वास्थ्य हमारा हो भला, रहें दूर सब रोग.
साफ पर्यावरण रखें, करें प्रदूषण दूर,
तब हम भी चंगे रहें, नहीं बनें मजबूर.
नदी हमारी साफ हों, कचरा रखिए दूर,
जंगल रहें हरे भरे, बढ़ें जंतु भरपूर.
बने संतुलन प्रकृति का, पशु, मानव या जीव,
भाई चारा भी बढ़े, नहीं कटें निर्जीव.
-------
पेड़ काट हमने करी, एक बड़ी सी भूल,
केवल पेड़ कटे नहीं, हिली धरा की चूल.
तेज धूप से हो रहे, पशु पक्षी हैरान,
पेड़ काट कर धरा को, करते हैं वीरान.
पर्यावरण बिगड़ गया, होते उलटे काम,
क्षिति, जल, पावक, गगन के, भूल गए अब नाम.
सरिता भी विपरीत है, जल का नहीं बहाव,
घातक उसके दिख रहे, जलवायु पर प्रभाव.
नहीं समय से आ रही, भारत में बरसात,
पहले या जल्दी दिखा, गड़बड़ है सौगात.
बात प्रदूषण की करें, धुआं दिखे चहु ओर,
दूभर लेना साँस है, बीमारी का जोर.
------
जैव युद्घ संभावना, हो जाती मजबूत, 
नहीं कमी कोई रही, किया बंद ताबूत. 
कोरोना में चाहिए, आक्सीजन के जार, 
अपने हित में कर रहे, जीवन का व्यापार.
संकट गहन झेल गए, अच्छे दिन की आस, 
असरदार वैक्सीन पा, जमा लिया विश्वास. 
मानव डूबा स्वार्थ में, कुदरत है बेहाल, 
जंगल से लकड़ी कटी, सूख गए सब ताल. 
जंगल काट विनाश कर, बनी इमारत भव्य, 
रहने की सुविधा नहीं, सोचा जीवन दिव्य. 
जल, थल को दूषित किया, खूब अड़ाई टाँग, 
काम बिगाड़ा प्रकृति का, अब कहते सब राँग. 
-----
मई 
-----




------
विश्व एवरेस्ट दिवस 
------
एवरेस्ट पर चढ़ गए, वीर शेरपा नाम, 
मई माह उनतीस को, पूरा होता काम. 
साथ हिलेरी भी चढ़े, जीत लिया एवरेस्ट,
अमर हुआ इतिहास में, दोनों बनते बेस्ट. 
बाद कई अभियान के, चढ़ी बछेंद्री पाल,
पहली महिला देश की, बाद अनेक मिसाल.
------
विश्व संग्रहालय दिवस - 18
-------



-------
संग्रह आदत है भली, रखो माल संभाल, 
इसको बस इतना करो, बुरा नहीं हो हाल. 
धर्म, कर्म की आदतें, अपने कुछ संस्कार, 
करिए अथक प्रयास जब, पड़ती इन पर मार. 
बने धरोहर देश की, उस पर हो अभिमान, 
कोशिश हर संभव करें, अपना बढ़ता ज्ञान.
------
विश्व दूरसंचार दिवस -17
-----

------
बातों बातों में मिले, दुनिया भर के हाल,
टैलीपैथी भूत में, अब नेट का कमाल.
एक जगह से कीजिए, सब मित्रों से बात,
कहें ऑडियो कॉल पर, रोज़ सुबह सुप्रभात.
नहीं वीडियो कम कहीं, शकल देख मुस्कात,
दिल से दिल की बात हो, अति सुकून आ जात.
रही प्रगति विज्ञान की, उसका कर आभार,
मिले सूचना जगत की, धन्य दूर संचार.
-------
मन की बातें कर सकें, मिलते अपने यार,  
जी हलका कर लें सुना, जैसे उठे विचार.  
बात करो मुँह देख कर, व्यक्त करो उद्गार, 
लिखा पढ़ी का मामला, मान चलो आभार. 
दृश्य, श्रव्य ऊर्जा चली, बस थोड़ी ही दूर,
चढ़ा उसे कैरियर पर, भेज सकें अति दूर. 
संभव है तकनीक से, करिए व्यक्त विचार, 
लहर अधिक आवृत्ति से, हो ऊर्जा संचार. 
सब कुछ संभव आज है, कृपा दूरसंचार, 
चित्र देख कर बात हो, तकनीकी उपकार.
कोरोना के काल में, होना नहीं उदास, 
कैसे दर्शन कर सकें, बनी वीडियो आस.
-----
विश्व परिवार दिवस - 15
--------




-------
करनी कथनी एक सी, बने आपकी बात,
लोगों का विश्वास पा, मिल जाती सौमात.
जहाँ एक सी बात हो, मिलें विचार समान,
इक दूजे की बात का, सभी करें सम्मान.
हाल चाल पूछें सभी, रहे न कुछ दुर्भाव,
सच्ची बात कहें सुनें, मन में नहीं दुराव.
मेल जोल से रह सकें, वही सफल परिवार,
आदर बड़ों को मिले, छोटे पाएं प्यार. 
------
ग्रुप स्थापना दिवस - 4 मई
-------




-------
चार मई को हो रहे, इस ग्रुप के दस साल,
नाना रुचि के जन जुड़े,  करने मालामाल.
नए लोग जुड़ते गए, बढ़ता ग्रुप आकार,
कुछ वरिष्ठ ऊपर चले, तज माया संसार.
नई नई गतिविधि रची, प्रतिभाजन में व्यस्त,
गलत पोस्ट कुछ डालते, रहते खुद में मस्त.
कई बार बाधा हुई, होते खड़े सवाल,
राजनीति भी घुस गई, काली होती दाल.
कोशिश अपनी यह रही, सबका रख लें ध्यान,
नहीं रुष्ट कोई रहे, मिले उचित सम्मान.
करते हैं हम कामना, ग्रुप होवे खुशहाल,
मिले सहयोग सभी का, कोई नहीं मलाल.
--------
विश्व मजदूर दिवस / गुजरात / महाराष्ट्र स्थापना दिवस - 1
------




--------
एक मई को बन गया, एक अलग से राज्य,
महाराष्ट्र कहते उसे, भारत भूमि का भाग.
मुख्यालय था मुंबई, मिला नागपुर भार,
राजधानी बदल गई, गरमी सरदी बार.
अर्थ व्यवस्था खास थी, फिल्मों का आधार,
राज रहा काँग्रेस का, फैला भ्रष्टाचार.
लोगों के सहयोग से, खूब बढ़ा व्यापार,
सभी जगह से आ रहे, स्वाद भरे आहार.
------
एक मई को मिल गए, दुनिया के मजदूर, 
अपनी छुट्टी मांगते, मालिक थे मजबूर. 
बीच काम के मिल सके, साप्ताहिक अवकाश, 
समुचित वेतन भी मिले, खुल कर लेवें श्वास.
बने इसी दिन अलग से, महाराष्ट्र, गुजरात, 
अपनी सरकारें बनी, करते अपनी बात.
-----
अप्रैल 
------
विश्व मलेरिया दिवस - 25
------



------
दंश मार मच्छरों ने, करे खूब बीमार, 
चली गईं जानें कई, कितने हुए शिकार. 
मच्छर काटे, ज्वर चढ़े, होता तेज बुखार, 
बेचैनी हो बदन में, दिल को नहीं करार. 
उन्मूलन मलेरिया का, सोचें कौन विकल्प, 
अब संभव हो सका, सब का हो संकल्प.
------
विश्व पशु चिकित्सा दिवस - अप्रैल का अंतिम शनिवार 
-------


------
गौ माता है, पशु नहीं, उसको दें सम्मान, 
घर में गौ माता रहे, वह घर स्वर्ग समान.
पशु धन अनुपम संपदा, धरिए इसका ध्यान, 
बड़े प्यार से पालिए, घोड़ा, बकरी, श्वान. 
मुरगी, मधु-मक्खी करे, घर धन से संपन्न, 
थोड़े श्रम से आय हो, रहते लोग प्रसन्न. 
दुष्कर हाथी पालना, खर्चीला है काम, 
इज्ज़त बढ़े समाज में, मालिक का हो नाम. 
करे काम सारे समय, धोबी है नाराज,  
नाम गधा उसको दिया, बोला सभी समाज. 
स्वामिभक्ति सबसे अधिक, चौकीदार काम,
गलत समय भौंके अगर, झंडे मिलें इनाम. 
------
विश्व पृथ्वी दिवस - 22 अप्रैल 
------




------
धरती माता ने दिया, हम सबको वरदान, 
संरक्षण उसका करें, रखें सदा हम ध्यान. 
धरा हमें देती रही, भोजन, वस्त्र, मकान,
अनुचित शोषण हो नहीं, अपने हित का ध्यान. 
बचा सकें मिल कर सभी, जल थल के उपहार,  
खर्च, उपभोग जो किया, वापस की दरकार.
------
अम्बेडकर जयंती - अप्रैल - 14
------
बाबा साहब नाम से, झुक जाता है शीश, 
नमन उन्हें हम सब करें, विद्या के वागीश. 
पढ़ लिख बैरिस्टर बने, मिला मान सम्मान, 
सेवा भारत मात की, आज़ादी अरमान. 
उन्नति के अवसर खुलें, बढ़े खूब व्यापार, 
सभी नागरिक पा सकें, शिक्षा के अधिकार. 
-------
विश्व होम्योपैथी दिवस - 10 अप्रैल 
------



-------
नगर बरेली को मिला, बड़ा नाम जयदीप, 
रोगी सेवा में लगे, सबके रहें समीप. 
नाम बोल कर दवा का, रोग भगाएं दूर, 
बचे दाम भी दवा के, करे फोन मशहूर. 
रखते कागज जेब में, रोगी लेते नाम. 
चले बिना खाए दवा, दे कर पूरा दाम.  
ऐसे कुछ बीमार हैं, करते हाल बखान, 
चर्चा उनके मर्ज की, सबसे हो श्रीमान. 
आते हैं कुछ मीत भी, करवाने उपचार, 
दूर फीस की बात है, चाय पिएं दो बार.
चर्चा कर लेते मजे, देते अपनी राय, 
कहें दवा हर रोग की, जैसे यही उपाय. 
------
रोगी के मन में रहा, एक अटल विश्वास, 
होंगे निश्चित ठीक ही, ले कर आते पास.
कहें बड़ी आशा रखे, रोगी अपना हाल, 
ठीक जल्द करिए हमें, बोल रहे वाचाल.
कृपा रही जगदीश की, करते मात्र विचार, 
सोच दवा के नाम से, हो जाता उपचार. 
------
हैनीमन डाक्टर बने, जर्मन में विद्वान,
याद उन्हें हम सब करें, उनका नाम महान. 
मूल असर सिद्धांत का, पद्धति का आधार, 
आधारित ऐफैक्ट पर, विलयन का व्यवहार. 
बूँद बूँद को मिला कर, हर दम बढ़ता भाव, 
घोल मदर टिंचर का, सबसे अधिक प्रभाव.
एक लाख या तीस हो, मूल दवा है एक
पोटैंसी बस भिन्न है, होते असर अनेक.
होम्योपैथी की विधा, करे तुरत उपचार, 
रोगी के लक्षण मिला, होता गहन विचार. 
हाल कहो अपना सभी, लगा सकें अनुमान, 
सुन लें पूरी बात जब, मुश्किल हो आसान. 
------
होम्योपैथी की विधा, करे तुरत उपचार, 
रोगी के लक्षण मिला, होता गहन विचार. 
तीस, एक सौ, लाख में, मूल दवा है एक, 
पोटैंसी बस भिन्न है, उनके असर अनेक.
हाल कहो अपना सभी, लगा सकें अनुमान, 
सुन लें पूरी बात जब, मुश्किल हो आसान. 
-------
विश्व स्वास्थ्य दिवस - अप्रैल -7
-------



--------
कुदरत ने हमको दिए, कुछ अनुपम उपहार, 
मिले मज़ा पूरा हमें, रहे स्वस्थ संसार. 
खान, पान, व्यायाम से, बनता स्वस्थ शरीर, 
इन्हें बदल कर बदलिए, खुद अपनी तकदीर. 
आयुर्वेद हमसे कहे, रखिए स्वस्थ विचार, 
बिना कष्ट जीवन चले, हो उत्तम आहार.
-------
राष्ट्रीय समुद्रीय दिवस - अप्रैल 5
-------



--------
मानव जीवन है कठिन, रही जीविका खींच,
सागर में नौका रहे, जब हो जल के बीच.
वायु, ताप जलधार का, करिए सदा विचार,
सागर लहरें, शशि-कला, कब आएगा ज्वार.
जीवित जल वासी रहें, पड़ें नहीं बीमार, 
ध्यान प्रदूषण का रखें, नियमों के अनुसार. 
अपना ध्वज जब भी दिखे, हो सुखमय आभास, 
कूट संकेत जानिए, हो सुरक्षित प्रवास.
रखे जान हथेली पर, है केवट परिवार, 
मिले अधिक वेतन तनिक, खतरा बारंबार. 
दीर्घ काल तक अलग हों, बिछुड़े रहते यार, 
जल-यात्री को नमन है, वापस स्वस्थ विचार.
-------
भूवैज्ञानिक दिवस - 3 अप्रैल 
-------


------
चले खोजने खनिज को, बड़े बड़े विद्वान, 
उनकी सेवा को मिला, घर बाहर में मान. 
खनिज खोजना कठिन है, खतरे में रख जान, 
भूवैज्ञानिक लगे हैं, सूँघ रहे चट्टान.
बड़ी खुशी सबको मिले, जो पाएं संकेत, 
जान डालते खतरे में, रहते सदा सचेत.
----------
मूर्ख दिवस - 1 अप्रैल
---------------



-------
प्रथम दिवस अप्रैल करे, अपनों का उपहास, 
आहत करता भावना, डिग जाता विश्वास. 
पश्चिम के अनुकरण ने, किया हमें दिग्भ्रान्त,
भूले अपनी सभ्यता, मन को करे अशान्त.
रही विदेशों की प्रथा, समझी हमने शान, 
करी नकल हर बात में, भूले अपना मान.
------