Saturday, 31 July 2021

दोहा रामायण



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श्री दोहा रामायण 

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अंशुमान परिवार में, पैदा हुए दिलीप, 
दशरथ उनके वंश में, खासमखास महीप. 

कौशल्या रानी बड़ी, तरुण सुमित्रा नाम, 
कैकेई छोटी रही, बसी अवधपुर धाम. 

राज पाट तो बहुत था, हुई नहीं संतान, 
यज्ञ होम कर पूछते, ऋषिगण कहें निदान. 

अधिक आयु में उन्हें मिला, ऋषियों से वरदान, 
तीन रानियों के हुए, बेटे चार महान. 

पाख उजाला चैत का, नवमी तिथि अविराम, 
बजे नगाड़े अवध में, जन्म लिए श्री राम. 
----5-
जन्मे उनके साथ ही, भाई राजकुमार, 
दशरथ बहुत प्रसन्न थे, पूरा है परिवार. 

लखन, सौमित्र से बड़े, भरत और सुत राम, 
उन्हें देख हर्षित पिता, तकें नयन अविराम. 

स्वागत हो दरबार में, ब्राह्मण पाते दान, 
गुरुजन की आशीश से, छाई है मुस्कान.

लालन-पालन राजसी, रहे नीति संस्कार,
माता की ममता मिली, मोह लिया संसार. 

चारों भाई खेलते, रहते, खाते साथ, 
बात बड़ों की मानिए, कहते थे रघुनाथ. 
-----10-
राज घराने के गुरू, वशिष्ठ मुनि भगवान, 
शिक्षा का दायित्व था, ऋषिवर का अरमान. 

गुरु ने अपने ज्ञान से, दिया नीति भंडार, 
मर्यादा, संस्कार का, अनुभवमय संसार.

शिक्षा, दीक्षा हर तरह, पूरी करते लाल, 
नीति, वीरता, धर्म में, उनकी नहीं मिसाल. 

असुरों का जग में बढ़ा, अत्याचार, आतंक, 
विघ्न डालते यज्ञ में, करते नाश निशंक.

राज-क्षेत्र अयोध्या में, दानव करें बवाल, 
आए विश्वामित्र जब, मांगे केवल लाल. 
-----15-
विश्वामित्र माँग लिए, रक्षा को दो लाल, 
राम लखन को साथ रख, संकट को दें टाल. 

भारी मन से दे दिए, राम लखन दो लाल, 
मार दानवी ताड़का, ऋषिगण हुए निहाल. 

पढ़-लिख कर राघव हुए, शादी को तैयार, 
गुरु ने ढूँढी दुल्हनें, काफी किया विचार.

बरसों से पाहन पड़ी, मिले चरण जब राम,
मुक्ति अहिल्या को मिली, पहुँची उनके धाम. 

मिथिला से पा निमंत्रण, गए जनक दरबार, 
शिव पिनाक को तोड़ कर, राम करें उपकार. 
----20-
 मिथिला जा कर जनक का, सुना वशिष्ठ सुझाव, 
तोड़े जो शिव धनुष को, जगें प्रेम के भाव. 

सीता वरती राम को, डाल गले जयमाल, 
जनक राय हर्षित हुए, मिथिला थी खुशहाल.

कोशल से दशरथ चले, ले ढेरों उपहार, 
दूल्हे बन भाई चले, वधुएँ थीं तैयार. 

तन मन से सब मुदित हैं, भरा हुआ उल्लास, 
माँओं का गौरव बढ़ा, बनीं नई वह सास. 

राजा दशरथ ले चले, खुशियों का संसार,
एक साथ ही मिल गईं, जनक सुताएँ चार. 
-----25-
चारों बहनें साथ में, आईं दशरथ राज, 
पत्नी पा भाई सुखी, हर्षा सकल समाज. 

राजा ने निश्चय किया, बनें राम युवराज, 
सारी जनता खुश दिखे, होता मुदित समाज. 

राज तिलक प्रभु का करें, राजन सबके साथ, 
लिखा और था भाग्य में, नहीं बनेंगे नाथ.

होनी होती है प्रबल, करती अपना काम, 
वह तो हो कर ही रहे, भली करेंगे राम.

याद कराया मात को, दोनों वर का भान, 
रखे सुरक्षित आज तक, राजन के वरदान.
----30-
बुद्धि फेर कर मंथरा, कैकेई की दास, 
राज दिलाओ भरत को, और राम बनवास. 

राज तिलक से पूर्व ही, करो कार्य संपन्न, 
सुनते ही राजा हुए, बेसुध और विपन्न.

रानी डूबी स्वार्थ में, माँगे जो वरदान, 
पूरे यदि राजा करें, छूटें उनके प्रान.

राज भरत के नाम हो, वन को जाएं राम,
मांगे वर देने पड़े, बिगड़ा उनका नाम.

आहत दशरथ हो गए, बेसुध उनकी जान,
भारी मन से वर दिए, रख कर कुल की आन.
-----35-
सुन कर आज्ञा मात से, राम हुए तैयार, 
पूरा उनका लक्ष्य हो, लिया मनुज अवतार. 

चल दीं सीता साथ में, भाई लछमन लाल, 
साधु वेश धारण किया, कोई नहीं मलाल. 

नाना ऋषियों से लिए, आवश्यक उपदेश, 
चरण पूज तीनों चले, बनवासी दरवेश.

वापस लाने के लिए, किया महीप अनुरोध, 
घुमा फिरा ले आइए, करना नहीं विरोध. 

रोती जनता छोड़ कर, चले राम भगवंत, 
भेजे उनके साथ में, शासन सचिव सुमंत.  
-----40 -
सचिव सारथी साथ ले, पहुँचे गंगा तीर, 
केवट राय मिले उन्हें, समझी उनकी पीर. 

राम, लखन, सीता सहित, पहुँचे गंगा तीर, 
पार कराएं नाव से, केवट भक्त अधीर.

पहले धोएं पैर को, बाद चढ़ें रघुवीर, 
कहते तारणहार से, बदलें अब तकदीर.

भक्ति भाव से भर गए, नैनन निकला नीर, 
अपनी जिद पर अड़ गए, हर लें सबकी पीर. 
 
भ्रात प्रेम उर में धरे, चले भरत, गुरु, मात,
रिपुसूदन भी साथ में, बोलें मीठी बात. 
----45-
नैनों में लज्जा भरे, दिल में रख कर ग्लानि, 
रहा बोध अपराध का, नहीं क्षमा में हानि.

वापस घर को लौट कर, देखें अपना राज, 
आज्ञा अब पूरी हुई, नहीं वापसी लाज.  

डिगे नहीं अनुरोध से, भरत बताएँ ज्ञान, 
शीष खड़ाऊँ धर चले, रखा राम का मान. 

दिखे मार्ग में ऋषि जहाँ, आशिश लेते राम, 
चरणों की कर वन्दना, कर्म करें निष्काम. 

राक्षस, दानव जो मिले, उनका कर संहार, 
लक्ष्य बड़ा था सामने, बढ़ते पालन हार. 
----50 -
मायावी दानव दिखे, मचा रहे आतंक, 
उनको दंडित कर चले, राजा लगते रंक.

पंचवटी में शान्ति से, करते थे विश्राम, 
भाई, सीता साथ में, समय काटते राम. 

सहज वासना नार की, वन में करे विहार, 
रावण भगिनी घूमती, टपकाती थी लार.

लंकापति भगिनी गई, पंचवटी के पास, 
प्रणय अपेक्षा राम से, रख शादी की आस. 

सूपनखा करती विनय, अपना लो तुम राम, 
ऐश करोगे साथ में, नहीं करो कुछ काम. 
----55-
मर्यादा में राम थे, किया लखन संकेत,
देखा खतरा सामने, दोनों हुए सचेत. 

उसके हठ को देख कर, लक्ष्मण काटी नाक, 
खर दूषण से युद्ध कर, उन्हें मिलाया खाक.

पहुँच गई रोती हुई, भाई रावण पास, 
बिलख सुनाई बात सब, बदले की रख आस. 

खर दूषण भी मर गए, कहती राम प्रताप, 
लंका में भी भय बना, रावण खोता आप.

रावण ने गुस्सा किया, लिया सोच अपमान, 
इसका बदला ले सकूँ, ऐसा मन में ठान. 
-----60-
जुगत बिठाने में लगा, आया मातुल ख्याल, 
दिया हुकुम मारीच को, कंचन मृग बन चाल. 

ज्ञानी पंडित से मिले, संत एक मारीच, 
मामा से अनुरोध में, रही भावना नीच.

सीता लखती हिरन को, मन में करे विचार, 
इसका हो आखेट यदि, बना सकूँ आधार. 

आग्रह करती राम से, इसका करें शिकार, 
राम त्रिया आगे झुके, भाई पहरेदार. 

पीछे देखा राम को, दौड़ लगाई दूर, 
क्रन्दन सुन मारीच का, लखन किए मजबूर. 
-----65-
विस्मय में सीता पड़ी, संकट में हैं राम,
तुरत मदद को जाइए, नहीं देर का काम.  
 
चले मदद को राम की, खींच सुरक्षा रेख,
छोड़ जानकी चल दिए, आया संकट देख. 

पार इसे ना माँ करें, रहें सुरक्षित आप, 
गलती से लाँघा अगर, होगा पश्चाताप. 
 
माया रच रावण चला, धरा साधु का वेश, 
मांगी भिक्षा मात से, कहता था दरवेश. 

छल बल से सीता हरी, ले कर उड़ा विमान, 
सीता को रोता सुना, जगा जटायु ज्ञान. 
----70-
रावण को ललकार दे, बजा समर का शंख, 
गीध कटाए युद्ध में, अपने दोनों पंख. 

ला कर सीता को रखा, अपने लंका राज, 
बैठी बाग अशोक में, पहरा सकल समाज. 

सूनी कुटिया देख कर, दुखी हुए दो भ्रात, 
सीता को थे खोजते, करें एक दिन रात. 

जाल स्वर्ण-मृग का रचा, सीता हरी लंकेश, 
घायल जटायु ने दिया, सिया हरण संदेश.

गिरि, वन, कंदर ढूँढते, प्राण प्रिया को राम, 
राह भटकते वे चले, आए शबरी धाम. 
----75-
शबरी देखे राह प्रभु, लगा टकटकी रोज, 
भाव रखा मन में सदा, चुनती रही सरोज. 

प्रेम भाव को मानती, दिल से करती याद, 
होगी पूरी कामना, बिना किसी अपवाद. 

शबरी ने वन में दिए, चख-चख मीठे बेर, 
भक्ति देख उसकी चखे, बिना किए कुछ देर. 

श्रद्धा देखी भक्ति में, चखते जूठे बेर, 
भ्रात लखन ने रख लिए, रहा काल का फेर. 

आगे चलने पर मिले, राम भक्त हनुमान, 
जामवंत सुग्रीव रखें, किष्किंधा में प्रान.

भक्त पवनसुत ने रखी, राम नाम की शान,  
सब में श्रद्धा भर रहे, सबका रखते मान. 

राम भक्त का नाम है, अमर शक्ति का रुप, 
रहे लीन प्रभु भक्ति में, साहस के प्रतिरूप. 

सेवक बन रघुनाथ के, जपते हैं हनुमान, 
भक्ति देख उनकी कहें, लोग स्वयं भगवान. 

मन में हरदम धारते, रखते दृढ़ विश्वास, 
नमन करो हनुमान को, होगी पूरी आस. 
----85-
साहस देते प्रभु उन्हें, जो पूजें हनुमान,
बिना किसी दुर्भाव के, रखें भक्त का मान.

करुण कथा सुग्रीव की, कह कर लगे गुहार, 
मुक्ति दिलाओ बालि से, उसका कर संहार. 

एक तीर से बेध कर, ताड़ गिराए सात.
छुप कर मारा बालि को, पत्नी की सौगात. 

दे कर राज सुग्रीव को, अंगद को युवराज, 
सेना रख कर साथ में, पूरा करते काज. 

सभी दिशा सेना चली, खोजें सीता मात, 
कैसे लंका जा सकें, चिंता की थी बात. 
-----90-
खुद का गौरव भूल कर, चिंता में हनुमान, 
जामवंत के कथन ने, याद दिलाई शान.  

कूद मार कर चल पड़े, ले कर प्रभु का नाम, 
प्रबल उत्साह मन भरा, होगा पूरा काम. 

सुरसा से आशीश ले, पहुँचे लंका द्वार, 
भेंट लंकिनी से हुई, बही रुधिर मुखधार. 

मसक रूप धर कर चले, मिलने लंका भूप,
मिले विभीषण भ्रात से, धर कर वामन रूप.

सीता देखी शोक में, बैठी छाँव अशोक, 
सहती रावण त्रास को, कृश तन आँसू रोक. 
-----95-
राम दूत बन आ गए, लंका में हनुमान, 
एक अंगूठी ले चले, मात सकें पहचान. 

ऊपर तरु पर बैठ कर, समझ रहे हालात, 
रावण सीता से कहे, सुन ले मेरी बात. 

रावण के प्रस्ताव को, सुनती तृण की ओट, 
पूरी तरह नकारती, कहे नज़र में खोट. 

मानी सीता जब नहीं, सेवक को आदेश, 
जैसे चाहो, लो मना, रख लो कोई भेष. 

रही उपासक राम की, सुता विभीषण तात, 
त्रिजटा ने साहस दिया, शीघ्र बनेगी बात. 
----100-
राम मुद्रिका सामने, सीता थी हैरान, 
आए सेवक रूप में, राम भक्त हनुमान.

मिल कर सीता मात से, दिया उन्हें संतोष, 
एक भरोसा राम का, रक्षक को नहिं दोष. 

बना बहाना भूख का, ले लूँ लंका भेद, 
अनुमति सीता से मिली, करूँ किले में छेद. 

उजड़ा चमन अशोक का, आया अक्ष कुमार,
समर भयंकर जीत कर, उसे लगाया पार. 

रावण के आदेश से, आया बड़ा कुमार, 
मेघनाद लख सामने, लड़ते पवन कुमार. 
----105-
मायावी दानव दिखा, क्रोध करें हनुमान, 
छल बल के उपयोग से, निकला नहीं निदान. 

इंद्रजीत ने ध्यान कर, साध लिया ब्रह्मास्त्र,  
रखा मान हनुमान ने, मर्यादा में शास्त्र. 

क्रोधित रावण पूछता, क्यों करता उत्पात, 
आया लंका किस लिए, बतला पूरी बात. 

आने का कारण बता, मत दे तू उपदेश, 
आग लगाओ पूंछ में, ऐसा था आदेश. 

पूंछ बढ़ी हनुमान की, ज्यों ही लगती आग, 
जलती लंका देख कर, गए निसाचर भाग. 
----110-
कोटे परकोटे चढ़ा, मारी एक छलांग, 
नर नारी भयभीत से, ढूँढ रहे वामांग. 

पूँछ बुझा कर जलधि में, आए सीता पास, 
आएंगे प्रभु शीघ्र ही, ऐसा दे विश्वास. 

वापस आ कर राम से, कही कथा विस्तार, 
कैसे अब आगे बढ़ें, इस पर किया विचार. 

सागर से विनती करें, कोई कहें उपाय, 
नाम सुझाया नील का, पाहन दें तैराय. 

सेतु बनाया जलधि पर, कपि का बढ़ता मान, 
रावण ने पूजा करी, उनको दे वरदान.
----115-
सीता ला कर साथ में, पूजा की संपन्न, 
धर्म निभा यजमान का, दोनों लोग प्रसन्न. 

एक विभीषण ही रहे, चले धर्म की राह, 
रहे भक्ति मन में सदा, अंतर्मन की चाह. 

रावण को देते रहे, अपनी नेक सलाह,  
नहीं भली उसको लगी, रावण बेपरवाह. 

कहने पर माना नहीं, अपने हित की बात, 
देश निकाला दे दिया, मारी भाई लात. 

राम शरण में आ गया, छोड़ा भाई द्वार,
पत्नी बच्चे थे वहीं, छोड़ चले परिवार. 
----120-
शरणागत से भेंट कर, दिए राम अधिकार, 
राज तिलक भी कर दिया, निश्छल करते प्यार. 

संभव हो तो टाल दो, महा समर अभियान,  
सबके हित की बात सुन, दूर रखें अभिमान. 

अंगद को सौंपा गया, दुष्कर कार्य महान,
बुद्धिमान युवराज हैं, रख ले रावण मान. 

शांति दूत अंगद चले, देने ज्ञान प्रकाश, 
वापस सीता को करो, देखो टला विनाश.

दूत रूप में चल पड़े, निकले कोई राह, 
समझ सका रावण अगर, होगा नहीं तबाह. 
----125-
साधारण वानर समझ, चूक गया लंकेश, 
नहीं बैठने को कहा, पसरी पूँछ विशेष. 

खुद को बाली सुत कहा, जिसने बाँधा काँख,
घूम रहा छह माह तक, स्वाद जीत का चाख. 

माना जब रावण नहीं, रखा जमा कर पैर, 
कोई इसे हिला सके, नहीं रहे कुछ बैर, 

उसकी सभा में हुए, पूरे सभी प्रयास,
रावण से उसने कहा, मैं हूँ प्रभु का दास. 

पैर पकड़ना शौक हो, पड़ो पाँव श्रीराम, 
निश्चय ही पाओ क्षमा, जाओ उनके धाम. 
----130-
निश्चय देख रावण का, लगा लिया अनुमान, 
अंगद ने बतला दिया, रावण तू नादान. 

रावण से आज्ञा मिली, आया वीर महान,
मेघनाद से लड़ रहे, लखन लाल बलवान. 

दोनों रत थे समर में, हुआ दिवस अवसान, 
मेघनाद ने शक्ति का, किया तुरत संधान.

तप की शक्ति अमोघ थी, ब्रह्मा का वरदान, 
लखन लाल अचेत हुए, बाकी थी बस जान.

फौरन सुषेण ला सकें, कहें विभीषण राय, 
चले पवनसुत तुरत ही, जैसा कहा उपाय.
----135-
राज वैद्य संकोच से, आए हनुमत साथ, 
प्रान लखन के बच सकें, दवा मिले जब  नाथ. 

संजीवनी उन्हें मिले, होवे नहीं प्रभात,
पहुँच हिमालय ला सके, उसको रातोंरात.

कालनेमि को भेज कर, की बाधा उत्पन्न, 
उसे मार हनुमान ने, यात्रा की संपन्न.  

जगमग देखी रोशनी, भ्रम में थे हनुमान, 
पूरा पर्वत उठा कर, चल पड़े वेगवान.

देख भरत आकाश में, कोई मायाजाल, 
मार गिराया तीर से, राम भक्त बेहाल. 
----140-
हाल भरत ने जब सुना, भाई हुए अधीर, 
तुरत वेग से फिर उड़े, पहुँचे हनुमत वीर. 

दवा पिलाई वैद्य ने, पा जीवन, आह्लाद,
अनुपम शक्ति उन्हें मिली, वध किया मेघनाद. 

महा समर में चल बसे, कुंभकर्ण, मेघनाद, 
बिछड़ पुत्र, भाई गए, मन में भरा विषाद.

अहिरावण हर कर चला, शयन करें रघुनाथ, 
रहा इरादा बलि चढ़ें, दोनों भाई साथ.

सेना में हलचल हुई, गायब दोनों लाल, 
ज्ञान विभीषण का कहे, राम गए पाताल.
----145-
तुरत पवनसुत उड़ चले, संकट मोचन नाम, 
अहिरावण को मार कर, काँधे लाए राम. 

आखिर लड़ने आ गया, हो भीषण संहार, 
भेद विभीषण ने दिया, करें नाभि प्रहार.

अंत समय तक वह लड़ा, छल बल के प्रहार, 
लड़ बैठा अभिमान में, विकट करे हुंकार. 

रावण मारा राम ने, सीता पाती मुक्ति,
भाव जगा विश्वास से, सबकी बढ़ती भक्ति. 

धरती पर रावण पड़ा, छोड़ रहा संसार,
लक्ष्मण भेजे राम जी, सीखो जीवन सार.
----150-
रावण वध कर राम ने, किया जगत कल्यान, 
राज विभीषण को दिया, सीता को सम्मान. 

राम जन्म के पूर्व ही, रावण को था भान, 
वही करेंगे अंत में, दानव कुल कल्यान. 

कठिन साधना से मिला, उसको अनुपम ज्ञान, 
शिव शंकर की भक्ति से, बना बड़ा विद्वान. 

दिखती लीला हर जगह, क्रीड़ा रावण राम, 
जीवन दर्शन दिख सके, हुआ बड़ा संग्राम.

दानव मानव लड़ रहे, नीति काल का युद्ध, 
कैसे वह जीवित रहे, हो कर राम विरुद्ध.
----155-
पूरा कर बनवास को, वापस लौटे धाम, 
साथ लखन सीता सहित, पुष्पक चढ़ कर राम. 

नगर निवासी खुश हुए, आया सुख का काल, 
माताएं भी थीं मुदित, लौटे उनके लाल. 

सब मिल कर पूजन करें, बस जाए प्रासाद, 
गर्व करें सौभाग्य पर, रहे नहीं अवसाद.

अपनी संस्कृति, सभ्यता, हम बैठे थे भूल, 
गहरी थीं उसकी जड़ें, जीवन दर्शन मूल.  

आपस में सहयोग हो, बढ़े प्रेम व्यवहार,  
निर्विरोध पूरा बने, मंदिर एक अपार. 
----160-
नगर अयोध्या में बने, देवालय श्रीराम, 
धरती पावन हो गई, दिव्य बनेगा धाम. 

राम लला को पूजने, आए पंत प्रधान, 
शुभ मुहूर्त को छाँट कर, मंदिर का निर्मान.
----162-
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