-----
कैकेयी चरित
-----
राज अश्वपति का रहा, देश कैकेय काम,
राज कुमारी वहाँ की, कैकेयी था नाम.
सुंदरता के साथ में, बाला थी वह वीर,
दया दृष्टि उसकी रही, सबकी हरती पीर.
उसने सीखा युद्ध का, हर संभव ज्ञान,
दिए भले संस्कार ने, हर प्राणी का मान.
युद्ध देव दानव करें, कभी किसी की जीत,
उनके साथी साथ में, भली निबाहें प्रीत.
बाली को वरदान था, जो भी करता युद्घ,
आधा बल पा शत्रु का, जीत करे विशुद्ध.
-----5
तीन लोक में विजय पा, एकछत्र था राज,
सभी करें गुणगान अब, पहनाते सब ताज.
रावण दाबा काँख में, घूमा तीनों लोक,
डंका उसका बज गया, रहा न कोई शोक.
राजा दशरथ भी लड़े, अश्वपति की ओर,
संकट में राजा दिखे, उसने थामी डोर.
मदद पिता की वह करे, हो कोई संग्राम,
रूप सुंदरी खास थी, नयन तके अभिराम.
कैकेयी बन सारथी, धरा पुरुष का वेश,
खींच लगाम बचा लिया, लाई अपने देश.
-----10
सूर्य पुत्र बाली करे, जब दशरथ पर वार,
गिरवी असली मुकुट रख, जान बचाई यार.
समर दूसरे में किया, एक और आभार,
बची जान, दशरथ कहें, किया बड़ा उपकार.
दोनों अवसर के लिए, दशरथ दें वरदान,
लाए घर रानी बना, छिड़कें उस पर जान.
रखे सुरक्षित वर कहा, रखिए वचन उधार,
उचित समय में माँग लूँ, कृपा करें अपार.
कौशल्या सुमित्रा थीं, पहले से मौजूद,
मान बराबर का मिला, उसका बढ़ा वजूद.
-----15
मैके में थी मंथरा, आई रानी साथ,
कैकेयी की सेविका, उसका बायाँ हाथ.
दशरथ की बढ़ती उमर, नहीं रही संतान,
चर्चा कुलगुरु से करी, मिल जाए वरदान.
यज्ञ कराया वशिष्ठ ने, दिया प्रसाद पवित्र,
एक भाग छोटी दिया, अनुपम रहा चरित्र.
फलीभूत जब हो गया, ऋषिवर का वरदान,
जन्म दिया जिस पुत्र को, कहते भरत महान.
कौशल्या सुत राम थे, लखन, सौमित्र यार,
चारों बेटे साथ में, दशरथ सुखी अपार.
-----20
एक साथ मिल खेलते, रानी करती प्यार,
कुछ भी अंतर था नहीं, सब पर सब कुछ वार.
कैकेयी दिल की सरल, उसका चरित उदार,
अधिक राम को भरत से, करती थी वह प्यार.
शिक्षा पाने के लिए, भेजा वशिष्ठ धाम,
नीति, धर्म, शिक्षा सहित, सीखा शस्त्र काम.
अकसर जा कर देखती, शिक्षा का अभियान,
नहीं खबर राजा पड़ी, हुआ नहीं कुछ भान.
चिंता बच्चों की करे, रखती हरदम ख्याल,
गुप्तचरों को भेज कर, लेती सबके हाल.
-----25
अनुभव कष्टों का करा, दे सांसारिक ज्ञान,
सुख सुविधा अपनी जगह, धरे प्रजा का ध्यान.
राजा ऐसा चाहिए, लीन प्रजा, संसार,
जनहित की रक्षा करे, दुष्टों का संहार.
आयोजन हो यज्ञ का, ऐसा करें प्रयास,
विश्वामित्र जनहित में, आए ले कर आस.
विश्वामित्र माँग लिए, लखन और सुत राम,
रक्षा दानव से करें, सफल यज्ञ परिणाम.
रखा स्वयंवर जनक ने, सीता करें चुनाव,
तोड़ धनुष शिव का सके, बना रमापति दाँव.
-----30
चारों को दुलहन मिली, बनी रानियाँ सास,
आईं जब ससुराल में, छाया था उल्लास.
दशरथ ने निर्णय किया, राज तिलक हो राम,
कैसे वापस मिल सके, कर पाएँ आराम.
दशरथ को तो चाहिए, उनका असली ताज,
तिलक राम का हो सके, कहलाएं महाराज.
करी शारदा मात ने, ऐसी कुछ तरकीब,
कैकेयी के मन भरा, वर माँगो अजीब.
सिखलाने वाली रही, उसकी दासी खास,
आँख मूँद रानी करे, उसका ही विश्वास.
----35
कान भरे मंथरा ने, दिखलाई तसवीर,
राज राम को यदि मिला, फूटेगी तकदीर.
दासी बन कर तुम रहो, राज करेंगे राम,
विधना को मंजूर नहीं, तुरत बिगाड़ो काम.
कोप भवन रानी चली, लेने को वरदान,
अस्त व्यस्त कर केश को, दशरथ थे अनजान.
त्रिया चरित रानी दिखा, करने लगी विलाप,
मुझे आज ही चाहिए, दोनों वर दो आप.
असमंजस में पड़ गए, राजा थे हैरान,
मना करें यदि आज वह, टूटी जाती आन.
----40
पता राम को जब चला, क्यों रूठी है मात,
फौरन पालन कर चले, मान पिता की बात.
राज तिलक तो रह गया, मचा राज में शोक,
कैकेयी को दोष दें, काम दिया सब रोक.
माता से आशीश ले, सीता चल दीं साथ,
भ्रात लखन सेवा करें, बने दाहिना हाथ.
घटना से आतुर हुए, दशरथ छोड़े प्रान,
तीनों के वन गमन से, राज हुआ वीरान.
लौट भरत ननिहाल से, जानी सारी बात,
कारण खुद को समझ कर, कहें लजाते मात.
-----45
वापस लाने राम को, वन में जाते भ्रात, प्रजा साथ गुरु भी चले, करी उपेक्षा मात.
कौशल्या आदेश दे, कहे उठा कर हाथ,
ठीक नहीं अवहेलना, लो कैकेयी साथ.
कैकेयी को भय रहा, निकली क्यों ना जान,
खुद को दोषी मानती, दशरथ छोड़े प्रान.
सहमी सी रानी चली, मन में भय अनजान,
दिल से उतरी भरत के, राम सकें पहचान.
आशंका मन में उठी, कौन करेगा माफ,
शुद्ध हृदय लख राम का, उसका मन भी साफ.
-----50
वापस आए राम जब, पूरा कर बनवास,
कैकेयी दर्शन रही, पहली उनकी आस.
क्षमा मांग कर राम से, चाहा यह वरदान,
पाऊँ अगले जनम में, तुम जैसी संतान.
वचन राम ने यह दिया, होगी तुम ही मात,
दूध तुम्हारा ना पियूँ, होंगे कुछ हालात.
रघुकुल का कल्यान ही, अपना स्वारथ मान,
सब के ताने सुन लिए, सहे सभी अपमान.
आए कान्हा रूप में, अनुपम दिव्य स्वरूप,
कैकेयी थी देवकी, जसुदा माता रूप.
-----55