Sunday, 31 July 2022

धार्मिक




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होती गड़बड़ देश में, दोषी मुल्ले लोग,
राजनीति ने साथ दे, बढ़ा दिया यह रोग.
काम अनैतिक हो कहीं, सब में इनका साथ,
जड़ में हर अपराध के, मिले इन्हीं का हाथ.
गलत काम में एकता, दिख रही भेड़ चाल,
शिक्षित भी विध्वंस में, अकल का इस्तेमाल. 
हो हल्ला हुड़दंग में, दिखती भारी भीड़,
बुलडोजर को देख कर, घुसते घर की नीड़.
लालच पा लूं वोट मैं, गलत काम आगाज, 
नाश व्यवस्था देश की, दे कर दोष समाज.
गलत काम आलोचना, रहती इनकी थीम,
मौन साधते कृत्य पर, मस्जिद की तालीम.
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जीवन सुंदर जी सकें, उत्तम रखें विचार,
तन मन से हम स्वस्थ हों, नहीं पड़ें बीमार.
मीठा बोलें प्यार से, दें सबको सम्मान,
बढ़ती आयु का भी रखें, अपना पूरा ध्यान.
नहीं तनाव हो मन में, नहीं दखल, पड़ताल,
मतलब अपने काम से, आलोचना सवाल.
सभी काम हो समय से, हेरा फेरी त्याग,
काम करें ईमान से, जगता रहे दिमाग.
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सभी जगह मौजूद है, सेवा को तैयार,
उसी रूप अनुभव करो, मान ईश अवतार. 
अपना उसको मानिए, काम सफल हो जाय,
पूजन चिंतन भक्ति से, अपना लेय बनाय.
साहस से आरंभ हो, कैसा, कोई काम, 
मन में रख विश्वास जब, लीजै राम का नाम.
तन मन से सच्चे बनें, करें नेक सब काम,
दूर रहें छल झूठ से, ना होवैं बदनाम.
मन में भ्रम ना पालिये, मिल जाए एकांत, 
तके नहीं कोई हमें, है ईश्वर विश्रांत.
घोर निराशा छा गई, विपदा चारों ओर,
याद करो तुम ईश को, मत होना कमजोर.
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बातें सभी प्रकार की, मिल जातीं इतिहास, 
गौरव का हम को हुआ, एक सुखद अहसास.
धर्म भाव जगते रहे, मानें सच्ची बात,
पूर्वज हमको दे गए, यह अनुपम सौगात.
उसका कुछ मंडन करें, कुछ का खंडन काम,
सही बात झुठला सकें, हर पल का यह काम.
अपने ढंग, रूप करें, अपनी बात बखान,
बढ़ा चढ़ा कर कुछ कहें, जिनसे बढ़ता ज्ञान.
सुन सुन कर विश्वास हो, होती संस्कृति महान,
नालायक कुछ यूं मिले, करें सदा अपमान.
तथ्य सब वैज्ञानिक हैं, नहीं कहीं कुछ ढोंग,
चिंतन गहन कर पा सके, कथन नहीं कुछ रॉंग.
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माल बटे जब मुफ्त का, इनकी दिखे कतार,
जन कल्याण भुला दिया, काफिर का संसार.
रक्त या अंग दान हो, इनका दिखे न नाम,
त्याग, भले की बात हो, कहे कुरान हराम.
मुल्ला, मौलाना सभी, पाते शह कांग्रेस,
मुस्लिम दल भी पा रहे, गड़बड़ के संदेश.
जबरन हर संभव करो, अराजकता प्रचार,
लूट, बलात्कार, हत्या, बन जाए हथियार.
शिक्षा हिंसा की मिले, सेक्स बने आधार,
नाना जिहाद छेड़ कर, अपराधी भरमार.
दें दुहाई कुरान की, नेकी बने हराम,
गलत काम करके कहें, अल्ला का पैगाम.
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लिया जनम दिसम्बर में, तिथि रही पच्चीस,
आए महापुरुष कई, देने हमें अशीश.
महामना या अटल हों, रच पाए इतिहास,
बी.एच.यू. बना दिया, मालवीय विश्वास.
नेता विश्व पटल हुए, संसद में थी धाक,
बैठे विरोध पक्ष में, सत्ता पक्ष अवाक.
धर्मवीर बन भारती, हिंदी भक्ति विशेष,
कामेडी राजू सुनी, कहता नाम अशेष.
तुलसी दिवस पवित्रता, हिंदू पूज समाज,
घटनाएं काफी घटीं, दिन खास रहा आज.
इसी काल में हो गए, शहीद चार कुमार,
जोरावर, फतेह, अजित, और गुरु सुत जुझार.
याद आज को कीजिए, होता नहीं अकाल, 
बाहर के त्योहार को, कहते सब नाताल.
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छठ पूजा के बांकुरे, बने भक्ति के रुप,
निष्ठा, श्रद्धा अनकही, खिलता रंग अनूप.
खिलता रंग अनूप, नहाय खाय से पूजा,
खरना अगले दिवस, निराहार व्रत न दूजा,
देते दर्शन सूर्य, व्रती का लख अद्भुत हठ,
हो कल्याण जग का, ऊर्जा का संचार छठ.
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गणपति आओ,
मोदक खाओ,
गणपति आओ,
स्वास्थ्य दे जाओ,
गणपति आओ,
बुद्धि दे जाओ,
गणपति आओ,
समृद्धि दे जाओ,
गणपति आओ, 
अब तो आ जाओ.
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अनुभव हो जब आप को, कौन किया उपकार,
मन से उसका कीजिए, धन्यवाद आभार.
ऊपर मन भी यदि कहें, हार्दिक धन्यवाद,
अंतर्मन से निकलता,  सदा हर्ष आह्लाद.
बिना कहे यदि मिल सके, मानो ईश प्रसाद,
ऐसा हो उपकार यदि, सदा रहेगा याद.
आएं याद वह जन कभी, उपजें श्रद्धा भाव,
अहित न उनका खुद करो, कितने रहें अभाव.
मानो मन की बात को, कर दो तुम कल्यान,
याद करेगा दूसरा, सदा बढ़ेगा मान.
हो अनुभव उपकार का, रहे नहीं कुछ दर्प,
श्रद्धा भी बढ़ जायगी, कुचल अहं का सर्प.
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ऊपर वाले ने लिखी, हम सब की तकदीर,
जन्म समय से पूर्व ही, राजा तथा फकीर.
घटना सारी घट रही, विधना के अनुसार,
साक्षी हम तो कर्म के, रखें भला व्यवहार.
गीता में कान्हा कहें, कर तू अपना काम,
फल की इच्छा मत करो, भली करेंगे राम.
पौधे भी बढ़ पेड़ हों, मिले समय परिणाम,
उचित हाल में हों बड़े, लगें समय पर आम.
जो कुछ भी हम आज हैं, कृपा ईश महान,
बड़े लोग आशीष दें, हो सबका सम्मान.
अंत भले का हो भला, सभी करें तारीफ़,
बुरा करे, गाली मिले, बोले नहीं शरीफ़.
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अस्थाई इस जगत में, सब कुछ है बेकार,
सुख दुख निकले जा रहे, यह जीवन का सार.
ना ही सुख रहता सदा, ना ही दुख का जोर,
कुछ हर्षित सुख में दिखे, करते दुख में शोर.
अपने सुख में सब सुखी, दुख में सारे चोर, 
इन लोगो से दूर हों, ये दिल मांगे मोर.
काल कठिन भी निकलता, रहा समय का फेर, 
समय भला आए कभी, लगे न कोई बेर.
जीवन दिया भगवान ने, जियो खुशी के साथ,
ईश रखे जिस हाल में, सब पल उसके हाथ. 
नहीं दोष दें भाग्य को, नहीं बहाएं नीर, 
सभी समय कट जाएगा, मन माने ना पीर.
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शादी के जोड़े बने, विधना के अनुसार,
ब्रह्मा जी ने लिख दिया, किससे होगा दीदार.
नहीं जरूरी युगल का, पहले साक्षात्कार,
पहले जमें छतीस गुण, पूरे मिलें विचार.
पहले शादी को कहें, सात जन्म का साथ,
अग्नि सामने परिक्रमा, डाल हाथ में हाथ.
नहीं देव विवाह रचा, मान बड़ों की राय,
दिल में जो भी बस गया, केवल वही उपाय.
आज बड़े भी सोचते, क्यों हम करें क्लेश,
अपने बच्चे खुश रहें, उत्तम हो परिवेश.
करें प्रेम विवाह भले, नहीं कभी विच्छेद,
साथ बैठ सुलझाइए, रखें बिना कुछ भेद.
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महज़ भवन मंदिर नहीं, आस्था के आयाम,
अंतर का विश्वास है, घट घट बसते राम.
राम, कृष्ण, हनुमान हों, या शंकर भगवान,
शीश नवाते हम रहे, प्राणी सभी समान.
कोई मूर्ति दिखे नहीं, निराकार आह्वान,
मन में मानो ब्रह्म को, सभी जीव भगवान.
सदियों से हम मानते, मंदिर ऊर्जा स्रोत, 
दर्शन से हम में भरे, आशा, दायित्व बोध. 
आईं नाना आपदा, रहे सुरक्षित स्थान,
आततायी आघात से, नहीं कहीं नुकसान.
रक्षा करें संस्कृति की, बढ़े प्रेम सद्भाव,
मिल जुल कर सब रह सकें, बदल सके बर्ताव.
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भारत का वर्णन करें, बड़ा कठिन यह काम,
शब्दों की होती कमी, वाणी को विश्राम.
अनेकता में एकता, भारत का संयोग,
मूल मंत्र सबका यही, परमेश्वर है योग.
भाषा, भोजन अलग है, पूजा भाव समान,
राम, कृष्ण तो बड़े हैं, एक रहे हनुमान.
अलग भले जलवायु हो, रहे अलग पोशाक,
भीतर से मन एक हैं, कहें बात बेबाक.
भारत में छाए खुशी, सबका हो विकास,
लक्ष्य रहे परमार्थ का, ऐसा करें प्रयास.
शाँति और कल्याण हित, कर लें संभव शोध,
हानि किसी की हो नहीं, रहे सदा ही बोध.
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सदा एक सा सच रहे, छुपा नहीं कुछ राज,
बिना लाग लपेट कहें, लगे न कोई लाज.
गलती एक छिपाइए, झूठ बोल सौ बार,
नीची नजर हर पल हो, घटता मन का प्यार.
एक सत्य भारी रहे, सौ झूठ लगातार,
ग्लानि सदा मन में रहे, बोल झूठ बेकार.
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ईश्वर तो दिखता नहीं, फिर भी है विश्वास,
आती जाती पता नहीं, कहते उसको श्वास.
कोई रास्ता ना दिखे, हो जाए लाचार,
रहे अवलंब ईश का, बदल जाय व्यवहार.
केवल अनुभव कर सकें, ऐसा है भगवान,
मान सको तो मान लो, ना मानो अज्ञान.
सारे कामों में रहा, ईश कृपा का हाथ,
मर्जी बिना पत्ता हिले, कैसे संभव पार्थ.
धर्म किसी का कुछ रहे, विनती भी हो और,
उसके आगे सब झुकें, बढ़ा धर्म का दौर.
मानो ईसा या खुदा, या बुद्ध, महावीर.
नानक नाम जहाज है, मानस की तकदीर.
ना मानो पाहन लगें, मानो तो भगवान,
आस्था बढ़ती जब दिखे, डिग जाए ईमान.
फव्वारा वह कह रहे, हम कहें विश्वनाथ,
सच का पर्दाफाश हो, जज साहब के हाथ.
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Monday, 25 April 2022

द्रौपदी चरित


*द्रौपदी चरित*

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गुरु भाई थे द्रोण के, द्रुपद गुरू भरद्वाज,
द्रोण गरीबी में पले, द्रुपद रहे युवराज.

फिर भी दोनों मित्र थे, जाने सकल समाज,
कहा द्रोण को द्रुपद ने, दूँगा आधा राज.

काल चक्र ने घूम कर, द्रुपद लगाई लात, 
याद नहीं अपना वचन, भूले पिछली बात.

राज द्रुपद को जब मिला, शासक बने महान,
भूल राजमद में गए, छोड़ वचन की आन.

अंतर में कुछ थी व्यथा, रहा भाव प्रतिशोध,
समय साथ ना दे रहा, कुछ तो था अवरोध.
----- 5-
किया गरीबी ने बुरा, जीवन गति थी मंद, उठा द्रोण कैसे सकें, यौवन का आनंद.

यापन हित स्वीकार ली, सेवा शांतनु वंश,
राज काज में लग गए, रहा सिखाना अंश.

बचपन की बातें लगें, हुआ घोर अपमान,
भेजे पांडव युद्ध में, बंदी द्रुपद महान.

लौटा आधा राज दे, करें मित्रता पुष्ट,
लगते अपमानित द्रुपद, नहीं हुए संतुष्ट.

बदला लूँ अपमान का, क्या मैं करूँ उपाय,
तप में भारी शक्ति है, गुरु ने दिया बताय.
-----10-
कल्माषी में बस रहे, याज और उपयाज,
मना किया उपयाज ने, यज्ञ कराते याज.

यज्ञ ज्वाल से प्रकट थी, यज्ञसैनी था नाम.
राज कुमारी द्रुपद की, मिला द्रौपदी नाम.

भाई प्रकटा साथ में, द्रुपद हुए प्रसन्न,
देवों की समझी दुआ, रहे राज अभिन्न.

पाँच गुणों का वर मिले, शंकर का आह्वान,
पूर्व जन्म में तप किया, ले शिव से वरदान.

कृष्ण वर्ण की रुपसी, नहीं गुणों की थाह,
बड़ी हुई चिंता लगी, कैसे होगा ब्याह.
-----15-
रखा स्वयंवर तात ने, ऊपर टाँगी मीन,
वेधे नीचे देख कर, होगा वही प्रवीन.

दूर दूर से आ गए, बड़े बड़े महराज,
आशा सब के मन रही, हम होंगे सरताज.

परिचय दे कर सभी ने, अजमाया था भाग,
नहीं सफल वह हो सके, बना निराशा राग.

चुन पाएं स्वयंवर में, हस्तिनापुर कुमार, कौरव, पांडव लग गए, अजमाने हथियार.

दुर्वासा आए एक दिन, रहा क्रोध में मान,  
सेवा से खुश हो गए, कुन्ती को वरदान.
-----20-
कोई देव बुला सकें, यह था मंत्र प्रभाव, 
वर दे कर मिलती खुशी, आराधन का भाव.

करें आव्हान देव का, कुन्ती ले वरदान,
मंत्र परीक्षा के लिए, किया सूर्य आह्वान.

पुत्र प्राप्ति का वर मिला, वह हुई परेशान,
कैसे कहे समाज में, पुत्र मिला वरदान.

जन्मा कुंडल कवच ले, सहती माता पीर,
दासी को आदेश दे, छोड़ा गंगा तीर,

अधिरथ राधा को मिला, जो थे निःसंतान, 
दोनों ने पालन किया, बढ़ा कर्ण का मान.
-----25-
बड़े हुए पढ़ने गए, गुरु परशुराम के पास,
अस्त्र शस्त्र में निपुण हो, जगा नया विश्वास.

रखा स्वयंवर द्रुपद ने, आए राजकुमार,
परिचय दे आगे बढ़ें, शर्त करें स्वीकार.

सूत पुत्र राधेय भी, रहा उम्मीदवार,
मना कर्ण को कर दिया, पुत्री ने दुत्कार.

अपमानित था कर्ण जब, दिया सहारा मीत,
दुर्योधन आगे बढ़ा, चला निभाने रीत.

अंग देश के राज का, उसे दिया उपहार,
माना उसका कर्ण ने, आजीवन आभार.
----30-
कुन्ती को कहते बुआ, श्रीकृष्ण भगवान,
अर्जुन उनके सुत रहे, हर पल रखते ध्यान. 

अर्जुन को प्रभु ने दिया, उठने का आदेश,
शर्त स्वयंवर जीत लो, शर से मीन प्रवेश.

जीत स्वयंवर वह गए, कुंती माँ के पास,
लाए क्या हम जीत कर, खुशी और उल्लास.
   
देखे बिना वह बोल दी, अपने मन की बात,
पाँचो भाई बाँट लो, कुदरत की सौगात.

मिले पाँच पति द्रौपदी, सम हो सबसे प्यार, 
रहे गुणों में प्रमुख वह, सब पर हो उपकार.
----35-
दुर्योधन पर छा गया, अहंकार अधिकाय,
रही लालसा राज की, कैसा करूँ उपाय.

छल कर मामा शकुनि ने, हत्या के षडयंत्र. 
बचपन से ही मन उगे, कपट भरे कुछ मंत्र. 

बली भीम से अधिक ही, माना उसने वैर,
फेंका विष दे नदी में, लाक्षा गृह की सैर. 

सुलझे झगड़ा किस तरह, करे विचार समाज,
पड़े बीच में भीष्म जब, दे कर आधा राज.

खांडव पांडव को मिला, रहा कृष्ण आशीश,
सुंदर नगर बसा दिया, मिला साथ जगदीश.
----40-
जल थल के भ्रम का बना, उसमें महल विशेष,
आए कौरव देखने, नया बना जो देश.

दुर्योधन की व्यथा से, हँसी न पाई रोक,
कठिन द्रौपदी को लगा, कष्टों का आलोक.

अंधों के अंधे हुए, व्यंग्य बना मूलाक्ष,
कारण महाभारत था, धृतराष्ट्र पर कटाक्ष.

दुर्योधन की लालसा, छीन सके वह राज,
भेज निमंत्रण द्यूत का, बन बैठा युवराज.

पासे फेंके शकुनि ने, लगी राज की चाल,
हारे पांडव दाँव वह, दिखते थे बेहाल.
-----45-
चारों भाई, द्रौपदी, गए जुए में हार,
सभी बड़े मौजूद थे, पर नहीं रोकनहार.

कर्ण साथ में हो गया, अहंकार में चूर,
दुर्योधन की सोच पर, सभी बड़े मजबूर.

आग लगाई कर्ण ने, वेश्या कह कर बोल,
नग्न द्रौपदी को करो, गया सत्य भी डोल.

आज्ञा दी दुशासन को, खींचो इसकी चीर,
बीच सभा में कुलवधू, सबसे कहती पीर.

अट्ठाहास युवराज का, लज्जित रहा समाज,
घी डाले माहौल में, शकुनि, कर्ण आवाज.
----50-
उसे बचाने को नहीं, आए कोई वीर,
मौन बैठ सब ताकते, नैन भरे थे नीर.

लगी निराशा हाथ में, पूरा था व्यभिचार, 
आर्तनाद करुणामयी, प्रभु से करी पुकार.

करे विनय गोविंद से, लुटती मेरी लाज,
आ कर मुझे बचाइए, दुश्मन बना समाज.

दौड़े आए कृष्ण जी, किए बिना कुछ देर,
चीर बढ़ाने आ गए, सुन कर उसकी टेर. 

धन्यवाद भगवान का, करता सकल समाज,
सिंहासन असहाय सा, मौन देखता आज.
----55-
शाप तात को दे रही, सुन उसकी आवाज,
गाँधारी थर्रा गई, मना करे वह आज.

राज पाट वापस किया, जीती बाजी हार,
खिन्न दिखे युवराज तब, बैठ गए मन मार.

ईर्ष्या, तृष्णा बढ़ गई, सोच रहे दिन रात,
पुनः बुलाओ द्यूत को, सुन मातुल की बात.

सुना निमंत्रण तात का, जागा श्रद्धा भाव,
धर्मराज आदेश पा, देखा आव न ताव. 

पहले से निश्चित करी, शर्तें खेल इस बार,
वन में बारह वर्ष हों, पांडव जाएं हार. 
----60-
होगा इसके बाद भी, एक वर्ष छुप वास.
पकड़ लिए यदि बीच में, पुनः अज्ञात वास.

राज धर्म को मान कर, शर्तें कीं स्वीकार,
वही बात फिर हो गई, जैसे पहली बार.

राज पाट सब छोड़ कर, भुगतेंगे बनवास,
पाँचो भाई साथ में, रहे द्रौपदी पास.

सभी सभासद मौन थे, किंचित नहीं विरोध,
माता कुन्ती रुक गई, रहा विदुर अनुरोध.

तरह तरह की साधना, करते पांडव भ्रात,
अपनी रुचि की निपुणता, कर आपस में बात.
----65-
पति सेवा में लीन थी, था सब पर सम स्नेह.
पात्र एक वरदान में, उस ने पाया गेह.

खास बात उस पात्र की, खाएं कितने लोग. 
भोजन कम ना हो कभी, लगे द्रौपदी भोग. 

दुर्वासा भी आ गए, अपने शिष्यों साथ,
बाद स्नान भोजन करें, दिखलाओ कुछ हाथ.

टेर लगाती द्रौपदी, आओ कान्हा द्वार,
असमंजस को दूर कर, करिए बेड़ा पार.

कान्हा देखे पात्र को, लगा हुआ इक पात,
पेट सभी के भर गए, लें डकार उफनात.
----70-
किसी तरह पूरे हुए, उनके बारह साल,
एक और है काटना, भूलें अपना हाल.

अपने अस्त्र सौंप दिए, शमी वृक्ष के नाम,
छद्म नाम से पहुँच गए, मत्स्य देश के धाम.

राजा के दरबार में, आए सेवा काज,
सेवक बन कर काटते, धोखा खाय समाज.

वल्लभ, कंक, बृहन्नला, ग्रंथिक व तंत्रिपाल,
सैरेन्ध्री बन सेविका, रानी केश संभाल.

रानी नाम सुदेषणा, कीचक उसका भ्रात,
मुग्ध द्रौपदी पर हुआ, कही भीम से बात.
----75-
कीचक को विराट दिए, सेनापति अधिकार,
भीष्म, द्रोण या भीम ही, सकते उसको मार.

नाट्यागार चुन लिया, उसने मिलन स्थान,
छुपे रूप में भीम ने, भेंट किया निर्वान.

समाचार कीचक मिला, खुलता पांडव भेद,
जुआ शर्त पूरी हुई, झलके कौरव स्वेद.

सत्य जानने के लिए, हरीं वहाँ की गाय, 
पांडव आए सामने, दिया सत्य बतलाय.

मुकरा अपनी शर्त से, कौरव का युवराज,
बिना युद्ध दूँगा नहीं, सुई नोंक भर राज.
----80-
सुलह करें, समझा दें, चले गए घनश्याम,
मूर्ख नहीं माना, अड़ा, नेक राय बदनाम.

कोशिश की युवराज ने, हों कृष्ण गिरफ्तार,
दिखा दिया रूप अपना, महा विराट अपार.

विफल शाँति प्रयास हुए, युद्ध था अपरिहार्य,
एक ओर श्री कृष्ण हैं, सेना है पर्याय.

सेना से खुश कौरव हुए, पांडव भी संतुष्ट,
सेनापति भीष्म उसके, विदुर, द्रोण थे रुष्ट. 

दुर्योधन पितामह पर, लगा रहा आरोप,
पक्षपात आप करते, छुरा पीठ में घोप.
----85-
समर भयंकर चल रहा, आहत होते वीर,
शासन का अनुरोध था, हरो हमारी पीर.

अति आहत पितामह थे, निष्ठा लग गई दाँव,
करी गर्जना जोर से, क्रोध जमाता पाँव.

कल पांडव को मार दूँ, किया भीष्म प्रण आज,
नमन द्रौपदी ने किया, रख कर सबकी लाज.

पहले ही आशीश दे, पूछा परिचय साथ,
नाम द्रौपदी जान कर, भाँप कृष्ण का हाथ.

विधि भी अपनी दी बता, कैसे उनका अंत,
नारी से ना युद्ध हो, अम्बा उनका हंत.
----90-
खतम समर तो ना हुई, भाग गया युवराज,
जा कर छुपा तलाब में, कैसे बचती लाज.

ललकारा जब भीम ने, तोड़ा जंघा राज.
मानें युद्ध खतम हुआ, चिंतित हुआ समाज.

अश्वत्थामा द्रोण सुत, दुर्योधन का मीत,
पांडव शीश काट सकूँ, कृष्ण निभाई प्रीत.

शीश काट भ्रम में रहा, कौन सुत या बाप,
पांचो सुत मारे गए, फिर भी पश्चाताप.

भेज भीम को कृष्ण ने, बंदी लिया बनाय,
उचित सजा उसको मिले, कहो द्रौपदी माय.
---95-
माता भी थी द्रौपदी, समझ मात का शोक,
जीवन दान उसे दिया, उसकी मणि को रोक.

राय विदुर की मान ली, पूजा, अर्चन, शाँति,
बड़े भाव तर्पण किया, आहत को विश्रांति.

गांधारी को माफ कर, भूल दोष धृतराष्ट्र,
लंबे युग तक राज से, समृद्ध बनाया राष्ट्र.

राज सुरक्षित जान कर, शेष नहीं जब आश,
अपने वंशज छोड़ कर, तप करने कैलाश.

धीरे धीरे सब गए, नश्वर छोड़ शरीर,
गली युधिष्ठिर तर्जनी, एक झूठ की पीर.
----100-
नारी जब मजाक करे, बदल गया इतिहास,
लड़ा महाभारत गया, भेद गया परिहास.

अमर नाम द्रौपदी का, लिखा गया अभिराम, 
देव सुता थी चिर सती, कृष्णा पा कर नाम.

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