*द्रौपदी चरित*
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गुरु भाई थे द्रोण के, द्रुपद गुरू भरद्वाज,
द्रोण गरीबी में पले, द्रुपद रहे युवराज.
फिर भी दोनों मित्र थे, जाने सकल समाज,
कहा द्रोण को द्रुपद ने, दूँगा आधा राज.
काल चक्र ने घूम कर, द्रुपद लगाई लात,
याद नहीं अपना वचन, भूले पिछली बात.
राज द्रुपद को जब मिला, शासक बने महान,
भूल राजमद में गए, छोड़ वचन की आन.
अंतर में कुछ थी व्यथा, रहा भाव प्रतिशोध,
समय साथ ना दे रहा, कुछ तो था अवरोध.
----- 5-
किया गरीबी ने बुरा, जीवन गति थी मंद, उठा द्रोण कैसे सकें, यौवन का आनंद.
यापन हित स्वीकार ली, सेवा शांतनु वंश,
राज काज में लग गए, रहा सिखाना अंश.
बचपन की बातें लगें, हुआ घोर अपमान,
भेजे पांडव युद्ध में, बंदी द्रुपद महान.
लौटा आधा राज दे, करें मित्रता पुष्ट,
लगते अपमानित द्रुपद, नहीं हुए संतुष्ट.
बदला लूँ अपमान का, क्या मैं करूँ उपाय,
तप में भारी शक्ति है, गुरु ने दिया बताय.
-----10-
कल्माषी में बस रहे, याज और उपयाज,
मना किया उपयाज ने, यज्ञ कराते याज.
यज्ञ ज्वाल से प्रकट थी, यज्ञसैनी था नाम.
राज कुमारी द्रुपद की, मिला द्रौपदी नाम.
भाई प्रकटा साथ में, द्रुपद हुए प्रसन्न,
देवों की समझी दुआ, रहे राज अभिन्न.
पाँच गुणों का वर मिले, शंकर का आह्वान,
पूर्व जन्म में तप किया, ले शिव से वरदान.
कृष्ण वर्ण की रुपसी, नहीं गुणों की थाह,
बड़ी हुई चिंता लगी, कैसे होगा ब्याह.
-----15-
रखा स्वयंवर तात ने, ऊपर टाँगी मीन,
वेधे नीचे देख कर, होगा वही प्रवीन.
दूर दूर से आ गए, बड़े बड़े महराज,
आशा सब के मन रही, हम होंगे सरताज.
परिचय दे कर सभी ने, अजमाया था भाग,
नहीं सफल वह हो सके, बना निराशा राग.
चुन पाएं स्वयंवर में, हस्तिनापुर कुमार, कौरव, पांडव लग गए, अजमाने हथियार.
दुर्वासा आए एक दिन, रहा क्रोध में मान,
सेवा से खुश हो गए, कुन्ती को वरदान.
-----20-
कोई देव बुला सकें, यह था मंत्र प्रभाव,
वर दे कर मिलती खुशी, आराधन का भाव.
करें आव्हान देव का, कुन्ती ले वरदान,
मंत्र परीक्षा के लिए, किया सूर्य आह्वान.
पुत्र प्राप्ति का वर मिला, वह हुई परेशान,
कैसे कहे समाज में, पुत्र मिला वरदान.
जन्मा कुंडल कवच ले, सहती माता पीर,
दासी को आदेश दे, छोड़ा गंगा तीर,
अधिरथ राधा को मिला, जो थे निःसंतान,
दोनों ने पालन किया, बढ़ा कर्ण का मान.
-----25-
बड़े हुए पढ़ने गए, गुरु परशुराम के पास,
अस्त्र शस्त्र में निपुण हो, जगा नया विश्वास.
रखा स्वयंवर द्रुपद ने, आए राजकुमार,
परिचय दे आगे बढ़ें, शर्त करें स्वीकार.
सूत पुत्र राधेय भी, रहा उम्मीदवार,
मना कर्ण को कर दिया, पुत्री ने दुत्कार.
अपमानित था कर्ण जब, दिया सहारा मीत,
दुर्योधन आगे बढ़ा, चला निभाने रीत.
अंग देश के राज का, उसे दिया उपहार,
माना उसका कर्ण ने, आजीवन आभार.
----30-
कुन्ती को कहते बुआ, श्रीकृष्ण भगवान,
अर्जुन उनके सुत रहे, हर पल रखते ध्यान.
अर्जुन को प्रभु ने दिया, उठने का आदेश,
शर्त स्वयंवर जीत लो, शर से मीन प्रवेश.
जीत स्वयंवर वह गए, कुंती माँ के पास,
लाए क्या हम जीत कर, खुशी और उल्लास.
देखे बिना वह बोल दी, अपने मन की बात,
पाँचो भाई बाँट लो, कुदरत की सौगात.
मिले पाँच पति द्रौपदी, सम हो सबसे प्यार,
रहे गुणों में प्रमुख वह, सब पर हो उपकार.
----35-
दुर्योधन पर छा गया, अहंकार अधिकाय,
रही लालसा राज की, कैसा करूँ उपाय.
छल कर मामा शकुनि ने, हत्या के षडयंत्र.
बचपन से ही मन उगे, कपट भरे कुछ मंत्र.
बली भीम से अधिक ही, माना उसने वैर,
फेंका विष दे नदी में, लाक्षा गृह की सैर.
सुलझे झगड़ा किस तरह, करे विचार समाज,
पड़े बीच में भीष्म जब, दे कर आधा राज.
खांडव पांडव को मिला, रहा कृष्ण आशीश,
सुंदर नगर बसा दिया, मिला साथ जगदीश.
----40-
जल थल के भ्रम का बना, उसमें महल विशेष,
आए कौरव देखने, नया बना जो देश.
दुर्योधन की व्यथा से, हँसी न पाई रोक,
कठिन द्रौपदी को लगा, कष्टों का आलोक.
अंधों के अंधे हुए, व्यंग्य बना मूलाक्ष,
कारण महाभारत था, धृतराष्ट्र पर कटाक्ष.
दुर्योधन की लालसा, छीन सके वह राज,
भेज निमंत्रण द्यूत का, बन बैठा युवराज.
पासे फेंके शकुनि ने, लगी राज की चाल,
हारे पांडव दाँव वह, दिखते थे बेहाल.
-----45-
चारों भाई, द्रौपदी, गए जुए में हार,
सभी बड़े मौजूद थे, पर नहीं रोकनहार.
कर्ण साथ में हो गया, अहंकार में चूर,
दुर्योधन की सोच पर, सभी बड़े मजबूर.
आग लगाई कर्ण ने, वेश्या कह कर बोल,
नग्न द्रौपदी को करो, गया सत्य भी डोल.
आज्ञा दी दुशासन को, खींचो इसकी चीर,
बीच सभा में कुलवधू, सबसे कहती पीर.
अट्ठाहास युवराज का, लज्जित रहा समाज,
घी डाले माहौल में, शकुनि, कर्ण आवाज.
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उसे बचाने को नहीं, आए कोई वीर,
मौन बैठ सब ताकते, नैन भरे थे नीर.
लगी निराशा हाथ में, पूरा था व्यभिचार,
आर्तनाद करुणामयी, प्रभु से करी पुकार.
करे विनय गोविंद से, लुटती मेरी लाज,
आ कर मुझे बचाइए, दुश्मन बना समाज.
दौड़े आए कृष्ण जी, किए बिना कुछ देर,
चीर बढ़ाने आ गए, सुन कर उसकी टेर.
धन्यवाद भगवान का, करता सकल समाज,
सिंहासन असहाय सा, मौन देखता आज.
----55-
शाप तात को दे रही, सुन उसकी आवाज,
गाँधारी थर्रा गई, मना करे वह आज.
राज पाट वापस किया, जीती बाजी हार,
खिन्न दिखे युवराज तब, बैठ गए मन मार.
ईर्ष्या, तृष्णा बढ़ गई, सोच रहे दिन रात,
पुनः बुलाओ द्यूत को, सुन मातुल की बात.
सुना निमंत्रण तात का, जागा श्रद्धा भाव,
धर्मराज आदेश पा, देखा आव न ताव.
पहले से निश्चित करी, शर्तें खेल इस बार,
वन में बारह वर्ष हों, पांडव जाएं हार.
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होगा इसके बाद भी, एक वर्ष छुप वास.
पकड़ लिए यदि बीच में, पुनः अज्ञात वास.
राज धर्म को मान कर, शर्तें कीं स्वीकार,
वही बात फिर हो गई, जैसे पहली बार.
राज पाट सब छोड़ कर, भुगतेंगे बनवास,
पाँचो भाई साथ में, रहे द्रौपदी पास.
सभी सभासद मौन थे, किंचित नहीं विरोध,
माता कुन्ती रुक गई, रहा विदुर अनुरोध.
तरह तरह की साधना, करते पांडव भ्रात,
अपनी रुचि की निपुणता, कर आपस में बात.
----65-
पति सेवा में लीन थी, था सब पर सम स्नेह.
पात्र एक वरदान में, उस ने पाया गेह.
खास बात उस पात्र की, खाएं कितने लोग.
भोजन कम ना हो कभी, लगे द्रौपदी भोग.
दुर्वासा भी आ गए, अपने शिष्यों साथ,
बाद स्नान भोजन करें, दिखलाओ कुछ हाथ.
टेर लगाती द्रौपदी, आओ कान्हा द्वार,
असमंजस को दूर कर, करिए बेड़ा पार.
कान्हा देखे पात्र को, लगा हुआ इक पात,
पेट सभी के भर गए, लें डकार उफनात.
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किसी तरह पूरे हुए, उनके बारह साल,
एक और है काटना, भूलें अपना हाल.
अपने अस्त्र सौंप दिए, शमी वृक्ष के नाम,
छद्म नाम से पहुँच गए, मत्स्य देश के धाम.
राजा के दरबार में, आए सेवा काज,
सेवक बन कर काटते, धोखा खाय समाज.
वल्लभ, कंक, बृहन्नला, ग्रंथिक व तंत्रिपाल,
सैरेन्ध्री बन सेविका, रानी केश संभाल.
रानी नाम सुदेषणा, कीचक उसका भ्रात,
मुग्ध द्रौपदी पर हुआ, कही भीम से बात.
----75-
कीचक को विराट दिए, सेनापति अधिकार,
भीष्म, द्रोण या भीम ही, सकते उसको मार.
नाट्यागार चुन लिया, उसने मिलन स्थान,
छुपे रूप में भीम ने, भेंट किया निर्वान.
समाचार कीचक मिला, खुलता पांडव भेद,
जुआ शर्त पूरी हुई, झलके कौरव स्वेद.
सत्य जानने के लिए, हरीं वहाँ की गाय,
पांडव आए सामने, दिया सत्य बतलाय.
मुकरा अपनी शर्त से, कौरव का युवराज,
बिना युद्ध दूँगा नहीं, सुई नोंक भर राज.
----80-
सुलह करें, समझा दें, चले गए घनश्याम,
मूर्ख नहीं माना, अड़ा, नेक राय बदनाम.
कोशिश की युवराज ने, हों कृष्ण गिरफ्तार,
दिखा दिया रूप अपना, महा विराट अपार.
विफल शाँति प्रयास हुए, युद्ध था अपरिहार्य,
एक ओर श्री कृष्ण हैं, सेना है पर्याय.
सेना से खुश कौरव हुए, पांडव भी संतुष्ट,
सेनापति भीष्म उसके, विदुर, द्रोण थे रुष्ट.
दुर्योधन पितामह पर, लगा रहा आरोप,
पक्षपात आप करते, छुरा पीठ में घोप.
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समर भयंकर चल रहा, आहत होते वीर,
शासन का अनुरोध था, हरो हमारी पीर.
अति आहत पितामह थे, निष्ठा लग गई दाँव,
करी गर्जना जोर से, क्रोध जमाता पाँव.
कल पांडव को मार दूँ, किया भीष्म प्रण आज,
नमन द्रौपदी ने किया, रख कर सबकी लाज.
पहले ही आशीश दे, पूछा परिचय साथ,
नाम द्रौपदी जान कर, भाँप कृष्ण का हाथ.
विधि भी अपनी दी बता, कैसे उनका अंत,
नारी से ना युद्ध हो, अम्बा उनका हंत.
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खतम समर तो ना हुई, भाग गया युवराज,
जा कर छुपा तलाब में, कैसे बचती लाज.
ललकारा जब भीम ने, तोड़ा जंघा राज.
मानें युद्ध खतम हुआ, चिंतित हुआ समाज.
अश्वत्थामा द्रोण सुत, दुर्योधन का मीत,
पांडव शीश काट सकूँ, कृष्ण निभाई प्रीत.
शीश काट भ्रम में रहा, कौन सुत या बाप,
पांचो सुत मारे गए, फिर भी पश्चाताप.
भेज भीम को कृष्ण ने, बंदी लिया बनाय,
उचित सजा उसको मिले, कहो द्रौपदी माय.
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माता भी थी द्रौपदी, समझ मात का शोक,
जीवन दान उसे दिया, उसकी मणि को रोक.
राय विदुर की मान ली, पूजा, अर्चन, शाँति,
बड़े भाव तर्पण किया, आहत को विश्रांति.
गांधारी को माफ कर, भूल दोष धृतराष्ट्र,
लंबे युग तक राज से, समृद्ध बनाया राष्ट्र.
राज सुरक्षित जान कर, शेष नहीं जब आश,
अपने वंशज छोड़ कर, तप करने कैलाश.
धीरे धीरे सब गए, नश्वर छोड़ शरीर,
गली युधिष्ठिर तर्जनी, एक झूठ की पीर.
----100-
नारी जब मजाक करे, बदल गया इतिहास,
लड़ा महाभारत गया, भेद गया परिहास.
अमर नाम द्रौपदी का, लिखा गया अभिराम,
देव सुता थी चिर सती, कृष्णा पा कर नाम.
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