Sunday, 24 December 2023

कर्ण चरित - 154


कर्ण  चरित :- कुंती, सूर्य, राधा, अधिरथ, वृषाली, सुप्रिया (उर्वि), वृषसेन, 

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रही भक्त इक बालिका, कुन्ती उसका नाम, 
शूरसेन उसके पिता, कुंतिभोज घर धाम. 

मूल नाम उसका पृथा, यदुवंशी संतान,
कुंतिभोज पालक पिता, जपे नाम भगवान.

छोटी सी वह बालिका, करे अतिथि सत्कार, 
ऋषिगण का स्वागत करे, पाए उनका प्यार. 

दुर्वासा भी खुश हुए, दिया उसे वरदान, 
सिद्ध मंत्र की शक्ति से, करे देव आह्वान. 

उत्सुक हो उसने किया, सूर्य देव संज्ञान, 
पुत्रवती भव कह चले, दे अद्भुत वरदान.
-----05
एक कुंवारी बालिका, देगी जब संतान, 
हो संदेह चरित्र पर, भूल गई अरमान. 

क्या होगा, सोचा नहीं, ऐसा भी परिणाम,
लोक लाज से डर गई, सौंपा दासी काम. 

उचित समय पैदा हुआ, पुत्र एक महान, 
साथ रहा कुंडल कवच, ओजस्वी संतान. 

एक बकस में बंद कर, करती सरित प्रवाह, 
एक तरह से भूल जा, कभी न भरती आह. 

ममता माँ की कह रही, करो सोच परिणाम, 
नहीं परीक्षा लीजिए, गलत करा यह काम. 
-----10
राधा और अधिरथ को, मिला बकस उपहार, 
दंपति बिन संतान थे, देते पूरा प्यार. 

पाला अपने लाल सा, दिखता तेज अपार,
सूर्य पुत्र में आ गया, उनका सा व्यवहार. 

प्रखर बुद्धि उसकी रही, पाया थोड़ा ज्ञान, 
अधिरथ नाविक, सारथी, जाने शस्त्र महान. 

ताऊ ने उसको दिया, ज्ञान भरा संसार,
धर्म नीति की बात कर, सिखा दिया व्यवहार.

सूत और लुहार कहा, डाला भेद समाज,
रक्षक ही भक्षक बने, ढूॅंढें विष के काज. 
----15
भाई अनुज श्रोण रहा, राधा, अधिरथ पूत,
कर्ण तुल्य बल बुधि रही, कह कर समाज शूत.

कर्ण लड़े व्यवस्था से, शूत पुत्र अपमान,
अस्त्र विद्या प्रवीण बने, मिला नहीं सम्मान.

उसका संघर्ष करता, शासन को नाराज़ ,
भाई के मुख में दिया, पिघला स्वर्ण समाज.

शासन के आदेश से, करते दुष्कर काम,
नहीं चाह कोई रही, मिले उचित परिणाम.

शिक्षा हित भेजा उसे, अच्छी शिक्षा ध्येय,
राधा उसकी मात थी, नाम मिला राधेय. 
-----20
सखी वृषाली मीत थी, करती सच्चा प्यार,
तैयारी शादी रही, तभी समय की मार,
 
दुर्योधन स्वयंवर से हरे, कन्या कलिंग नरेश, दासी सुप्रिया मधुमती, चली संग परदेश.

विवश मधुमती हो गई, दुर्योधन पति मान,
किया मजबूर कर्ण को, सुप्रिया का आव्हान.

दोनों पत्नी बन गईं, कई हुईं संतान,
कहें वृषसेन खास थे, शेष आठ बलवान.

उसकी रुचि थी दान में, कभी नहीं इन्कार,
दानवीर उसको कहें, होती जय जय कार.
-------25
शासक हस्तिनापुर के, शांतनु उनका नाम,
काल चक्र हावी हुआ, करता अनर्थ काम.

गंगा से उनके हुए, सात पुत्र अवतार,
राजा कुछ पूछें नहीं, पहले किया करार.

बहा नदी में सब दिए, उन सब पर था श्राप,
अष्टम सुत देवव्रत थे, जिन्हें मिले थे बाप.

नहीं चाह फिर भी मिटी, सत्यवती से ब्याह,
कन्या थी मल्लाह की, राज पाट की चाह.

करी प्रतिज्ञा पुत्र ने, नहीं करूॅंगा ब्याह ,
उनका नाम भीष्म पड़ा, ना ही संतति चाह.
-------30
सत्यवती से पा गए, शांतनु दो संतान,
चित्रांगद अनुज बने, विचित्रवीर्य महान.

अनुज हते गंधर्व ने, अग्रज पाया राज, 
भीष्म हरते वरण हित, कन्या काशी राज.

अंबा चाहे और को, उसको वापस भेज, 
उसको स्वीकारा नहीं, पति ने किया गुरेज.

आ कर बोली भीष्म से, बनूॅं तुम्हारा काल,
बनी शिखंडी बाद में, बाकी करें निहाल.

विचित्रवीर्य जल्द मरे, हुई नहीं संतान,
माता की इच्छा रही, वंशज हों वरदान.
-----35
किया अनुरोध व्यास से, संतति करें प्रदान,
एक बंद करती नयन, थे धृतराष्ट्र निदान.

दूजी भय से पांडु को, जन्म पर पड़ी पीत,
दासी भेजी तीसरी, विदुर निभाते नीत.

पांडु बड़े जब हो गए, चिंता करी विवाह,
हस्तिनापुर राज में, कुंती लाए ब्याह.

दूजी पत्नी पांडु की, माद्री उसका नाम,
दोनों रहतीं बहन सम, था पूरा आराम.

एक कमी थी पांडु में, कर न सकें सहवास,
देवों का आव्हान कर, दी संतति की आस.
----40
धर्मराज युधिष्ठिर दें, पवन देव दें भीम,
अर्जुन जन्मे इंद्र से, अपने सुत की टीम.

माद्री ने उस मंत्र से, अश्विन का आव्हान,
नकुल, सहदेव सुत जने, जुड़वां भ्रात महान.

माद्री के रूप पर, पांडु हो गए मुग्ध,
अति उन्माद विहार से, हुआ निधन, सब क्षुब्ध.

माद्री होती तब सती, पांडु के साथ,
कारण थी पति निधन की, माना पूरा हाथ.

कुंती ने पाले तभी, पाॅंचो सुत समान,
दिया प्यार बराबर का, अपनी सी संतान.
----45
गांधारी ब्याही गई, धृतराष्ट्र के साथ,
पट्टी बांधी चक्षु पर, थामा पति का हाथ.

भाई शकुनि को लगा, हुआ बड़ा अपमान,
नेत्रहीन पति मिल गया, बहना अंध समान.

युद्ध किया धृतराष्ट्र ने, छीना सारा राज,
कैद किया परिवार को, भोजन बिना अनाज.

तब प्रण शकुनि ने किया, नष्ट धृतराष्ट्र वंश,
बनी पिता की अस्थियां, उसके पांसे अंश.

चतुर बोलने में रहा, वाणी करे प्रपंच,
करे निरुत्तर तर्क से, बिना लाज या रंज.
-----50
रानी गाॅंधारी करें, महादेव आव्हान,
प्रसन्न तप से शिव हुए, दें शत सुत वरदान. 
 
काल चक्र ऐसा चला, दो वर्ष रहा गर्भ, 
शतक सुतों के जन्म में, रहा धृतराष्ट्र दर्भ.

कुंठित रानी नष्ट करे, रखा पेट में वीर, 
चली बहाने घटक को, गंगा जी के तीर, 

राज हस्तिनापुर रहा, उस पर था उपकार ,
व्यास बुलाए कर्ण ने, घट में मंत्रोच्चार.

मंत्र शक्ति के तेज से, उनमें फूंके प्रान,
ऋषिवर दें सौ पिंड में, सबको जीवन दान.
------55
दुर्योधन सबसे बड़ा, बना दुशासन दोम,
अनुज शेष आतंक करें, जिससे सिहरे रोम.

राज हस्तिनापुर रहा, भीष्म बन गए ढाल, 
राज गुरू थे द्रोण बने, हो ना बांका बाल.

दोनों ही के गुरु रहे, ब्रह्म ऋषि परशुराम,
मजबूरी थी द्रोण की, लें शिक्षण का काम.

बंधे द्रोण संकल्प से, गुरु थे कुरु परिवार, 
शिक्षा केवल दें उन्हें, जिनको है अधिकार. 

मना किया राधेय को, पर था नहीं निराश, 
कठिन तपस्या वह करे, मन में रख कर आस. 
------60
वन में उसको मिल गए, परशुराम गुरु रूप,  ब्राह्मण समझ मान लिया, देवों का प्रतिरूप.

अति श्रम, संयम, लगन से, सीखा तीर कमान, 
नहीं वीर उस सा हुआ, साहस का प्रतिमान.

परशुराम वैरी रहे, जो भी क्षत्रिय होय, 
घोर वैर में मार कर, बार इक्कीस धोय. 

शिक्षा वह देते नहीं, यदि क्षत्रिय मिल जाय, 
घोर विरोधी वह रहे, कभी क्षत्रिय टकराय. 

एक दिवस की बात थी, गुरु करते आराम, बिच्छू काटे कर्ण को, रक्त बहे अविराम. 
-----65
जान तुरत ही वह गए, नहिं वामन का काम, 
पता नहीं था कर्ण को, अपना असली नाम. 

क्षत्रिय जाना क्रोध में, दिया कर्ण को श्राप, 
बेगुनाह पाए सजा, माता का था पाप. 

भूलेगा विद्या सभी, तू ने किया फरेब, 
वही मृत्यु कारण बने, तेरा झूठा ऐब.

रहे सुरक्षित कर्ण से, अर्जुन बचे उपाय, 
देवराज माया रची, ऋषि आश्रम में गाय.

बछड़ा मारा कर्ण ने, मदद अप्सरा जान, 
ऋषि ने उसे शाप दिया, वह मरे उसी स्थान,
-----70
ज्ञानी और वीर बड़ा, मिला नहीं सम्मान, 
सूतपुत्र उसको कहे, नाजायज संतान. 

राज कुमारी द्रुपद की, पांचाली का मेल, 
लक्ष्य वेधना मीन का, नीचे खौले तेल,

सुना स्वयंवर द्रौपदी, आए राज कुमार,
नयन मीन का वेध दे, जो कर पाए मार. 

लक्ष्य वेध ना कर सके, अनेक राज कुमार, 
मना द्रौपदी ने किया, सूतपुत्र का अधिकार.

किया अपमान कर्ण का, मन को गहरी मार,
सखी कहा उस को सदा, मान कृष्ण आभार.
-----75
कौरव भी आए वहाॅं, दुर्योधन युवराज,
बिन अधिकार उसे दिया, अंग देश का राज.

अपमानित से कर्ण को, मिला अचानक हाथ,
आभारी उसका बना, सदा निभाया साथ.

दोस्ती कहते हैं किसे, कर्ण और युवराज,
जीवन भर की मित्रता, जाने सकल समाज.

इंद्र प्रस्थ में बन गया, पांडव का साम्राज्य,
शिल्पी ने अद्भुत रचा, भवनों का समाज.  

पानी सूखा दिख रहा, सूखा दिखता नीर,
अंधे के अंधे कहा, बनी द्रौपदी पीर.
-----80
एक बार अर्जुन कहें, मैं करता अति दान,
समझाया फिर कृष्ण ने, इसमें कर्ण महान.

कृष्ण रखे तब स्वर्ण का, पर्वत एक विशाल,
पहले अर्जुन दान दें, याचक गण विकराल.

देख शकल देता रहा, सभी समय दिन रात,
तीन दिवस तक बाॅंटता, नहीं भीड़ छट पात.

मानी हार अर्जुन ने, कर्ण पुकारे श्याम,
पर्वत छू उसने कहा, कर लो अपना काम.  

निर्मोही हो गया वह, नहीं लोभ का नाम,
संयम रखा स्वभाव में, बढ़ा दोस्त आयाम.
-----85
ईर्ष्या नहीं पांडव से, रखता आदर भाव, 
उन्हें सतर्क कर्ण करे, मिले द्यूत प्रस्ताव.

दुर्योधन ने तब किया, चीर हरण आव्हान,
कड़ा विरोध कर्ण करे, रख नारी सम्मान.

दुर्योधन तो मीत था, पर गलत का विरोध,
सही राय देता सदा, करें झूठ अवरोध.

चले चाल मातुल सदा, रख कर नीयत खोट,
रखवा अस्त्र महारथी, पांचाली पर चोट.

दुर्योधन ने कह दिया, दास कर्ण इक बार,
गंभीरता से कर्ण ले, चुका रहा उपकार.
-----90
सेवक माना मीत का, भले हेतु तैयार,  
जोड़ लिया नाता नया, नहीं रहा वह यार.

दोबारा फिर द्यूत हो, शकुनि चली यह चाल,
फिर से वह संपत्ति ले, धृतराष्ट्र का लाल.

राय, डांट फिर कर्ण दे, दो नकार प्रस्ताव, 
धर्म राज माने नहीं, दिया नहीं कुछ भाव.

किया शकुनि ने द्यूत का, ऐसा विचित्र हाल,
हारे तो बनवास हो, पूरे बारह साल.

एक वर्ष तक वह करें, बाद अज्ञात वास,
पहचाने गए तो फिर, बारह साल प्रवास.
------95
बंधे युधिष्ठिर धर्म से, नहीं कर्ण की राय,
भीष्म, द्रोण भी चुप रहे, शकुनि करे असहाय.

तप से शिव को लो मना, देते कृष्ण सलाह,
अर्जुन जा हिमालय को, कठिन परीक्षा राह.

अर्जुन भेजे कृष्ण ने, शिव को करो प्रसन्न,
तप से लो पशुपति को, नहीं मन अवसन्न.

भील रूप शंकर धरा, दिया शिकार हराय,
शंकर पशुपति अस्त्र दें, अर्जुन शीश नवाय.

दुर्वासा को खुश किया, दें पांडव अभिशाप, 
शिष्य दस सहस साथ हों, भूखे रखना पाप.
-----100
याद द्रौपदी ने किया, सखा कृष्ण को मान,
पात चखा जब श्याम ने, मिटी भूख हो स्नान.

मिटी क्षुधा जब श्याम की, भरे सभी के पेट,
क्षमा मांग कर चल दिए, ऋषि आनंद समेट.

कर्ण मानता कृष्ण की, हितैषी सी सलाह,
शकुनि करे अपमान कह, चलो झूठ की राह.

भेष बदल कर वन रहे, काटे बारह वर्ष,
वास अज्ञात मत्स्य में, शर्त को मान हर्ष. 

दूत भेज युवराज ने, खोजें पांडव निवास,
सभी राज्य ढुंढवा लिए, छोड़ा नहीं प्रयास.
----105
कर्ण, शकुनि विराट चले, दुर्योधन के साथ,
कीचक का आतिथ्य ले, रख दासों पर घात. 

हाव - भाव से कर्ण ने, की पांडव पहचान,
थी आतुरता युद्ध की, बना रहा अनजान.

वचन दिया था कर्ण ने, जाना कुंती मात,
हो अज्ञात वास सफल, पांडव उनके भ्रात.

बिना युद्ध कुछ ना मिले, कहता था युवराज,
पूरी सब शर्तें हुईं, पर मुकर गया राज.

कृष्ण करें प्रयास टले, महा समर अभियान,
दुर्योधन राजी नहीं, छोड़ सका अभिमान.
-----110
कृष्ण ने प्रस्ताव रखा, उन्हें दो पांच गाॅंव,
दिखा रूप विराट दिया, फिर भी अंगद पाॅंव.

समर सिवा चारा नहीं, विधि का मान विधान,
कौरव नायक भीष्म हों, किया द्रोण सम्मान.

सहयोगी अपने बुला, चुना कुरुक्षेत्र स्थान,
वीर अनेकों आ गए, रखने कौरव मान.

प्रात काल हर दिन करे, देव अर्चना, स्नान,
जो जी चाहे मांग ले, याचक अपना दान.

इंद्र देव ने जब किया, अपने सुत का ध्यान,
भेष बदल याचक बने, पाने कर्ण से दान.
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ज्ञात सूर्य को जब हुआ, इन्द्र छल का भान,
कहा सूर्य ने कर्ण से, मत करना तुम दान.

कुंडल मांगे कर्ण से, चाहे अर्जुन जान,
सुबह नदी में कर्ण का, जब पूरा हो स्नान.

नहीं मोह उसको रहा, करे नि:स्वार्थ दान,
कवच और कुंडल दिए, जीवन के वरदान.

काट छुरी से दे दिए, किया न तनिक विचार,
रक्त बहा, फिर भी किया, प्रणाम बारंबार.

इंद्र देव आशीश में, भेंट करें दिव्यास्त्र,
एक बार बस साध लो, ऐसा अमोघ अस्त्र.
-----120
उसे सुरक्षित रख लिया, मारूॅं अर्जुन वीर,
भीषण समर के बीच में, हाल हुआ गंभीर.

देखा जब वृषसेन ने, पिता का कवच दान, 
लाया फौरन शिविर में, छूटा नाड़ी ज्ञान.

राज वैद्य ने कह दिया, बंद साॅंस संचार, 
अब इसका कुछ है नहीं, दुनिया में उपचार,

घायल देखा कर्ण को, आहत होती मात,
नकुल और सहदेव को, लाई अपने साथ.

दुर्योधन था सामने, करता पृथा विरोध,
आज्ञा पाई भीष्म की, दूर हुआ गतिरोध.
-----125
नकुल, सहदेव ने दिया, कर्ण को श्वास दान,
चमत्कार बस हो गया, हों पूरे अरमान.

भेद भीष्म को ज्ञात था, कर्ण पृथा का लाल,
किया निवेदन भीष्म से, धरें कर्ण का ख्याल.

कुंती उसको कह गई, वह है उसका लाल,
पांडव उसके अनुज हैं, उनका रखें ख्याल.

कौरव सेनापति कहें, कर्ण युद्ध से दूर,
उन के रहते ना लड़े, उसे किया मजबूर.

सूतपुत्र के नेतृत्व को, द्रोण नहीं तैयार,
भीष्म, द्रोण के बाद में, सेनापति का भार.
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कोई पांडव यदि मरा, बनूॅं तिहारा लाल,
रहें पाॅंच सुत आपके, बदल सकूं मैं पाल.

दिया वचन तब कर्ण ने, बस अर्जुन दो छोड़,
किसी और का वध नहीं, ले कर घातक मोड़.

केवल द्वेष अर्जुन से, नहीं शेष से वैर,
स्नेह सभी को दे दिया, माॅंगी सबकी खैर.

कर्ण देख कर सामने, सके भीम को मार,
अपना वचन याद रखा, किया नहीं प्रहार.

दुर्योधन शंका करे, क्या है उसकी नीति,
कहता कर्ण वचन निभे, यह है उसकी रीति. 
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छोड़ नकुल सहदेव को, कर सकता संहार,
जीवित छोड़ उन्हें दिया, अनुज मान उपकार. 

भीम पुत्र घटोत्कच करे, भीषण जन संहार,
सेनापति थे चाहते, करो अचूक प्रहार .

मना किया युवराज ने, दिव्यास्त्र का वार.
पहले उसकी मित्रता, अमोघ अस्त्र प्रहार.

मरा घटोत्कच दानवी, उस दिन रुका विनाश,
बाल बाल अर्जुन बचा, बिछीं लाश ही लाश.

खर्च दिव्यास्त्र भी हुआ, होता कर्ण उदास,
अर्जुन जीवित बच गया, असफल रहा प्रयास.
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अश्वसेन से नाग को, पूर्व जन्म का वैर,
अर्जुन ने हत्या करी, कोई दोष बगैर.

घातक विषधर घुस गया, बना कर्ण का तीर,  
केवल अर्जुन लक्ष्य था, बदले की थी पीर.

तुरत कृष्ण ने भाॅंप कर, दाब दिया रथ चक्र,
वेधा ताज अर्जुन का, नील स्वर्ण दे वक्र.

भूमि दबी थी जिस जगह, रथ फॅंसा अंगराज, 
पहिया निकल सका नहीं, बिना किसी भी साज.

कर्ण विनय करता रहा, अभी हुआ लाचार,
ठीक नहीं बिन अस्त्र के, युद्ध नीति व्यवहार.
----145
उकसाया तब कृष्ण ने, इस पर करो प्रहार,
उचित रीति है युद्ध में, यही नीति का सार.

ध्यान दिलाया पार्थ को, अभिमन्यु दिया मार,
चक्र व्यूह में घेर कर, योद्धा सात प्रहार.

पृष्ठ भूमि में कृष्ण ने, सुना कर्ण को ज्ञान,
पूरी उमर अब उसकी, दिया मित्र सम्मान.

घायल हालत कर्ण की, करी सभी से बात,
उपयोगी संदेश दे, विदा मांगते तात.

युद्ध भूमि में कुछ घटा, कुंती को आभास,
उसका सुत आहत हुआ, छूटी उसकी आस.
-----150
माता ने बतला दिया, छुपी हुई जो बात,
अंश उदर का वह रहा, सबसे अग्रज भ्रात.

शोक सभी करने लगे, मन में था अफ़सोस,
हत्यारे वह हो गए, माना अपना दोष.

सही समय पर भीष्म को, हो जाता यदि भान,
महासमर होता नहीं, बचती अनेकों जान.

होनी होती है प्रबल, घटता सब विधि साथ,
इसमें पूरा कृष्ण का, हर घटना में हाथ.
-----154