Tuesday, 8 October 2024

भरत चरित - 95


भरत चरित

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चर्चा त्रेता युग की, करता सकल समाज,
अच्छा सब कुछ हो रहा, भले हुए सब काज.

उस युग में कुछ खास था, कौशल होता नाम,
सभी जगह तारीफ थी, सुखी नागरिक आम.

कौशल के राजा रहे, दशरथ उनका नाम,
चक्रवर्ती सम्राट बने, दिया पड़ोसी मान.

एक बार की बात है, युद्ध हुआ घनघोर,
देव असुर थे लड़ रहे, असुर रहे झकझोर.

इंद्र शंभरासुर लड़े, देवासुर संग्राम,
देख पराजय सामने, याद करें श्रीराम.
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याद इंद्र दशरथ करें, दें समुचित सम्मान,
मदद हमारी कीजिए, सम्राट हैं महान.

पत्नी दशरथ संग थी, रहा कैकेई नाम,
संकट में उंगली लगा, दी समर को लगाम. 

खुश हो राजा ने कहा, तुम जीत की हकदार,
मांग आज वरदान लो, जिस पर है अधिकार.

टाल दिया कैकेई ने, रहे वह बरकरार,
उचित समय पर मांग लूं, रखिए आप उधार.

बूढ़े वह होने लगे, नहीं हुई औलाद,
यज्ञ कराया सुत जनें, रानी मिले प्रसाद. 
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रानी तीन अवध रहीं, जन्म लिए सुत चार,  
कौशल्या के राम थे, भरत कैकेय प्यार.

लखन और शत्रुघ्न थे, जुड़वां दोनों भ्रात, 
रानी सुमित्रा उनकी, होती प्यारी मात.

नाना होते अश्वपति, कैकय उनका धाम,
मामा कह युधाजित को, अग्रज होते राम.

बड़ा प्यार उन में बढ़ा, अनुशासन, आराम,
चारों भाई साथ में, भरत भक्ति का नाम.

खेला करें विपक्ष में, रखें भरत को राम, 
दिखें उन्हें अब सामने, जिता भरत का नाम.
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भाई पाए राम सम, आदर्श शक्ति, ज्ञान,
खुद से अधिक प्यार करें, रखें राम का मान.

कला, चित्र, साहित्य में, रखते रुचि विशेष,
अनुपम स्मृति उन्हें मिली, श्रद्धा केवल शेष.

पालन करते नीति का, रखें धर्म का ध्यान,
अनुजों को आशीष दें, करें राम का मान.

शिक्षा गुरू वशिष्ठ दें, दशरथ का अरमान,
धर्म, नीति, संस्कार की, सेवा भाव प्रधान.

असुरों के बढ़ने लगे, बाधा, अत्याचार,  
मांगे विश्वामित्र ने, दशरथ से साभार.
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भेजें दो सुत साथ में, करें दुष्ट संहार,
राम, लखन को शरण ले, कम हों अत्याचार.

मिला निमंत्रण जनक से, आएं मिथिला द्वार,
सुता स्वयंवर को लखें, मिल लें राजकुमार.

धनुष तोड़ कर राम ने, सीता की स्वीकार, 
गुरु जन के प्रस्ताव पर, दशरथ थे तैयार.

मिली उर्मिला लखन को, रिपुसूदन श्रुतिकीर्ति,
वरी भरत ने मांडवी, फैली जग में कीर्ति.

शादी का उत्सव मना, पूरे कौशल राज,
चारों वधुएं साथ हों, सुखी सारा समाज.
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राज महल में सुख रहा, जनता देती प्यार,
सौंपें दायित्व राम को, जो उनका अधिकार.

विधना लिखा विधान में, घटना होगी और,
बुद्धि मंथरा की फिरी, दोनों वर को गौर.

समझा कैकेई कहे, चुकता करो उधार,
सिंहासन पर भरत हो, राम दूर घरबार.

दशरथ सुन बेहोश थे, वह हो गए निढाल,
छोड़े प्राण दशरथ ने, बुरा अयोध्या हाल.

नहीं भरत थे राज्य में, चले गए ननिहाल,
खबर मिली वापस हुए, कैसे मचा बवाल.
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आया गुस्सा मात पर, क्यों की ऐसी बात,
चाल मंथरा ने चली, मारी उसको लात.

जननी को बोला नहीं, एक बार भी मात,
भ्रात प्रेम भारी पड़ा, बिछुड़े उसके तात.

बहुत प्रेम था राम से, हरदम रखते ख्याल,
नहीं कष्ट भाई सहें, हो ना बांका बाल.

आएंगे पीछे भरत, ऐसा था विश्वास,
भाई पीड़ा ना सहे, चुभे नुकीली घास.

धरती से विनती करें, वन प्रवास दौरान,
कांटे भरत लगें नहीं, दें ऐसा वरदान.
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पता चला जब भरत को, सिया लखन के साथ,
बन बनवासी चल दिए, लिखा राज जिन माथ.

मौखिक सहमति दें पिता, कैकेई आदेश,
गंगा पार राम गए, दें सुमंत संदेश.

तुरत भरत चल पड़े, लाने वापस राम,
साथ रानियां भी चलीं, गुरु भी छोड़े ग्राम.

विनती केवट की करी, जाना पूरा हाल,
सुने राम के कष्ट जब, मन होता बेहाल.

चित्रकूट आए भरत, कर के गंगा पार, 
सभी मलिनता दूर थी, बह रही अश्रु धार.
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श्रद्धा, भक्ति, प्रेम भरे, मिले भरत से राम,
सिया और सौमित्र भी, भरें नैन अभिराम.

अनुनय विनय बहुत करी, वापस हों रघुनाथ,
वचन पिता पूरा हुआ, धरें शीश पर हाथ.

बहस एक लंबी हुई, निकला नहीं निदान,
मांग लिए पद त्राण तब, मान उन्हें भगवान.

शीश खड़ाऊं रख चले, बन सेवक सरताज,
आज्ञा मानी भ्रात की, करें पादुका राज.

एक दिवस भी ना किया, राजमहल से राज,
बाहर कुटिया में रहे, देखें सारा काज.
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नंदीग्राम भरत बसे, भूमि करें विश्राम,
राज काज पूरा करें, दिल में रख कर राम.

भले महल में मांडवी, रहती सासू पास, 
मन तो था पति में रमा, उसमें बसती सांस.

ध्यान सदा पति में लगे, करें भरत जब काम,
जलता दीपक देख कर, तकें नैन अभिराम.

शयन मांडवी कर सके, जब दीपक हो मंद, 
उसकी मंगल कामना, काटे पति के फंद.

राम भक्ति में रम रहा, चित्त भरत दिन रात,
ऊपर मन से कर रहे, धरम करम की बात.
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राजा माने भरत को, सभी राज्य के लोग, 
सारी प्रजा सुखी रही, नहीं कष्ट या रोग.

ध्यान रमा कर राम में, उनका होता राज,
माना आदर्श मन से, सुघड़ बना समाज.

दिल में हर पल बस रहे, जीवन में श्री राम,
श्रद्धा से मस्तक नवा, लखें राज के काम.

रक्षा को तत्पर रहे, प्रजा करे आराम,
बसी सुरक्षा भावना, बसे नैन में राम.

रावण ने संग्राम में, भेज दिए युवराज,
स्वामी नाना शक्ति का, लंका का सरताज.
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भीषण युद्ध लखन करें, दोनों वीर महान,
शक्ति मार, घायल करे, मेघनाद के बान, 

वीर घातिनी छोड़ दी, होते लखन अचेत,
मेघनाद निश्चिंत था, नाश सेना समेत.

प्राण बचाने आ गए, लंका वैद्य सुषेन,
दवा हिमालय से मिले, मिले लखन को चैन.

मार कूद कपि ने किया, कालनेमि का अंत,
पूरा पर्वत ले चले, मिले राह में संत.

भ्रमित भरत भाई हुए, लगता दानव वीर,
रक्षा हेतु छोड़ दिया, एक भयंकर तीर.
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राम राम कह कपि गिरे, हुआ बोध अपराध,
क्षमा याचना कर सुनी, उनसे पूरी बात.

खेद जताया भरत ने, कहा लखन को प्यार,
माता की आशीश ले, हनुमत का आभार.

विदा किया हनुमान को, दे अपना संदेश,
वापस आएं राम जी, खतम करें लंकेश.

एक दिवस देरी नहीं, मुझ से सही न जाय,
पूरे चौदह साल हों, भेंट का हो उपाय.

गुरु वशिष्ठ के साथ में, करते रोज विचार,
व्याकुल हुए अंतिम दिन, करी चिता तैयार.
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समझा कर दें सांत्वना, कहें आचरण राम,
करो प्रतीक्षा अंत तक, अभी दूर है शाम.

वेष बदल हनुमान ने, धारण वामन रूप,
दे दी यह शुभ सूचना, आते कोशल भूप.

सुन कर अति प्रसन्न हुए, अनुज शुभ समाचार,
नगर पिटाई डुगडुगी, आए भ्रात हमार.

धूमधाम से भेंट कर, सौंपा कौशल राज,
राज तिलक के बाद में, होता मुदित समाज.

आज्ञापालक रूप में, भरत बन गए दास,
राम बसाए हृदय में, रहते उनके पास.
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विदा अतिथि सब ले चुके, रहे शेष हनुमान,
उन को विदा कौन कहे, जागा सबका ज्ञान.

सीता, लखन, भरत कहें, हम को जीवन दान,
मदद हमारी की सदा, जब संकट में प्रान.

सीता त्यागी राम ने, धोबी देता दोष,
जनता का विश्वास लें, नहीं किसी पर रोष.

सीता रही गर्भवती, दिया लखन आदेश,
छोड़ो बाहर राज के, रहे प्रकृति परिवेश. 

वन में सीता को मिले, ज्ञानी ऋषि वाल्मीकि,
लाए साथ आश्रम में, रख सनातनी लीक.
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आश्रम वासी को कहा, धरें अतिथि का ध्यान,
जनक सुता ने तब जनी, अपनी कुल संतान.

ऋषि वाल्मीकि शिक्षा दें, हर प्रकार का ज्ञान,
कहते रीति समाज की, संबंधों का मान.

सीता आश्रम में जने, सुंदर दो दो लाल,
लव कुश उनको ऋषि कहें, युग में करें धमाल.

नैसर्गिक बातावरण में, ऋषि से पाते ज्ञान,
लोक रीति को सीखते, पारंगत विद्वान.

राम सभा के जन कहें, एकरस से उदास,
ऐसा कुछ अब कीजिए, भर जाए उल्लास.
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दें राजसूय यज्ञ का, दरबारी प्रस्ताव,
जन धन का विनाश नहीं, देते भरत सुझाव. 

यज्ञ अश्वमेध हो यदि, बढ़े आपका मान, 
आएं राजा फेर में, बनें आपकी शान.

गुरु ने करी उपासना, अश्वमेध आव्हान,
अविजित अश्व वापस हो, राजा का सम्मान.

राजा छोड़े अश्व को, साथ किए कुछ वीर,
बाधा हर कर मार्ग की, दूर करें सब पीर.

शेष जगह से विजित हो, रुकता सीमा पार,
पढ़ी चुनौती अश्व पर, सेना दी ललकार.
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लव कुश ने बंधक बना, भरत और हनुमान,
रिपुसूदन व लखन भी, हो गए परेशान.

अश्व छुड़ाने आ गए, स्वयं राम यजमान,
प्रश्नों के उत्तर नहीं, हता राम अभिमान. 

गुरु ने जब विवाद सुना, सुना युद्ध संदेश,
पहचाना श्री राम को, तजो अश्व आदेश.

छोड़ा सारे लोग को, लव कुश हृदय उदार,
राज सभा गाने चले, राम कथा विस्तार.

चारों भाई के हुए, दो दो पुत्र महान,
चित्रकेतु अंगद रहे, लखन के सुत मान.
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पुष्कल, मणिभद्र नाम से, बनी भरत पहचान,
शत्रुघाती, सुबाहु को, शत्रुघ्न सुत सम्मान.

दीर्घ काल शासन किया, पूरा कर उद्देश्य,
राज सौंप संतान को, चलते अपने देश.

कहा पुराणों में गया, लखन शेष के रूप,
रिपुसूदन थे शंख के, भरत सुदर्शन भूप.

सजा लखन को राम दें, किया काल ने खेल,
भरत, राम, शत्रुघ्न गए, हुआ बैकुंठ मेल.

सभी पात्र इतिहास के, थे कोई पहचान,
लेवें उन से प्रेरणा, मानव की संतान.
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