Tuesday, 6 February 2018

पारिवारिक रिश्ते






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बुआ 

बुआ गज़ब की प्रीत है, नायाब एक अवतार,
बहन पिता की चल पड़ी, बसाने नया संसार,
बसाने नया संसार, ममता की अद्भुत मूरत,
भाई के बच्चों में देखी, अपनों की सूरत,
भला चाहती हर पल, देती आजीवन दुआ,
सदा स्वस्थ, सुखी रहे, मेरी प्यारी बुआ.
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माँ

माँ ममता लुटा रही , पिता बाँटते नेह ,
दिल से दिल मिल रहे , कंचन बरसे मेह , 
कंचन बरसे मेह , समझें भावना प्यारी ,
मान सम्मान मिले , सब पाएँ आशिष न्यारी ,
ख़ुशनुमा माहौल बने , बँध जाए समाँ , 
सबको को मिल जाए , ऐसी प्यारी माँ .
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माँ ममता की मूरत है , अपनेपन का आभास , 
सदा सर्वदा शुभ चाहती , जब तक रहती साँस ,
जब तक रहती साँस , कोई कष्ट न बच्चों को होए ,
कोई न बोले बात , जो बच्चों के हित में न होए ,
उर सहनशील माँ का , करे हर शैतानी क्षमा , 
वन्दन करते आज सभी हम , मेरी प्यारी माँ .
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पत्नी

इश्क ख़ुदा से हो , या बीवी से ,
ख़ुश करने के लिए सिज़दा ज़रूरी है .
बहन , बेटी , माँ या भगवान ,
सभी खोजते अपनेपन और मान .
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सासू माँ

तुम मेरी सास हो , 
हाँ , तुम मेरी सास हो , 
दिल के आस पास हो ,
जीवन की श्वास हो ,
मेरी स्वर्णिम आस हो , 
तुम मेरी सास हो ,
माँ का प्यार हो ,
बेटी का दुलार हो ,
दामाद का अनुराग हो , 
तुम मेरी सास हो ,
भले दिखने से उदास हो ,
हरकतों से नाराज़ हो ,
डाँट की आवाज़ हो ,
तुम मेरी सास हो ,
रूठने को तैयार हो ,
दिखावटी तिरस्कार हो ,
शिकायत को बेकरार हो , 
पर , तुम मेरी सास हो ,
हाँ , तुम मेरी सास हो .
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जन्मदिन

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जन्मदिन की शुभ कामना , देते परिचित , मित्र ,
व्हाट्सैप पर मिल रहे , संदेश अनेक विचित्र ,
संदेश अनेक विचित्र , लगी अपनों की कतार ,
भाँति भाँति कलरव करें , अपने यार हज़ार ,
प्रीत हमारी बनी रहे , सालों साल , जन्मों जनम ,
खुशियाँ यूँ ही बाँटते रहेंं , मुबारक हो जन्मदिन .
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भैया

भैया आया परदेस से , दीदी जोहती बाट ,
बदल गए रंग ढंग , बदल गए हैं ठाठ ,
बदल गए हैं ठाठ , नौकरी की आदत डाली ,
खान पान , परिधान की , शान झलकती निराली ,
बदले तेवर देख के , लगे न उसको हैया ,
बना रहे सकुशल , स्वस्थ , मेरा प्यारा भैया .
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पिता 

बच्चा बढ़ता देख के, बाप दिया मुस्काय .
चतुर चार चर्चा करें, खुशी न दामन आय.
खुशी न दामन आय, फूल के होवें कुप्पा .
मन गर्वित हर्षित रहे , मारें सब सों गप्पां ,
तकलीफ़ कोई न उसे होय , खाए न वो गच्चा ,
सदा सर्वदा खुशहाल रहे , मेरा प्यारा बच्चा .
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देवर

देवर छेड़े , भाभी को , कर अपनेपन का एहसास .
बचाए उसको मान से , जब डाँटे उसकी सास ,
जब डाँटे उसकी सास , करता भाभी की पैरवी ,
छेड़ खानी के खेल में , ज्यों परंपरा निभाए मौलवी ,
डरे न भाभी उस से , न दिखलाए वो तेवर ,
बड़े नसीब वाली वो भाभी , जो पा जाए देवर .
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भाभी

भाभी आ कर बना रही ,  तालमेल से परिवार ,
देवर उसमें दे रहा , सहयोग अपरम्पार ,
सहयोग अपरम्पार , पल्लवित प्यार की कली ,
सूझबूझ से दोनों की , नाना बिपदाएँ टलीं ,
सरल , सुखद , मृदुहास , संपन्नता की चाभी ,
परिवार का केंद्र बन गई , सबकी प्यारी भाभी .
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अपनी रजत जयंती

चलो आज एक कहानी दोहराएँ, 
अपने अतीत से स्वयँ जुड़ जाएँ.

इतिहास को याद यादगार बनाएँ, 
स्मृतियों को पंख लगाएँ.
एक मित्र से संबंध बढ़ाएँ, अपना जीवन उसे दिलाएँ.
समाज परिवार सब को बतलाएँ, एक अटूट बंधन निभाएँ,
24 नवम्बर, 1985 को ध्यान में लाएँ, 25 वर्ष पूर्व आँख जमाएँ,
अपने स्वप्नों को साकार बनाएँ, अपने अरमानों को पंख लगाएँ,
बंधु बान्धवों  सहित बारात ले जाएँ, इलाहाबाद में डेरा लगाएँ,
बरेली से मार्ग में शाहजहाँपुर, सीतापुर, लखनऊ, व रायबरेली जाएँ,
नाश्ता, खाना खाएँ, नाच कूद कर गाना गाएँ,
सँध्या समय त्रिवेणी जाएँ, प्राइमरी स्कूल में अभिवादन पाएँ,
द्वारचार रात्रि में करवाएँ, वर्मा जी का अभिनंदन पाएँ,
गुड्डी, गुड्डो, लल्ली, वंदना , अनेकानेक नाम गिनवाएँ,
प्यारी पत्नी उपहार में पाएँ, ईश्वर का शुक्र मनाएँ,
अपने परिवार से परिचित करवाएँ, नई रस्मो-रीति सिखाएँ,
व्यवहार की बात बताएम, सुघड़ गृहिणी का विश्वास जमाएँ,
लाड- प्यार से उसे दुलराएँ, कभी – कभी घुड़की भी बतलाएँ,
लाकर बड़ौदा गृहस्थी जमाएँ,  नित नव सामान सजाएँ,
घूमने फिर आबू जाएँ, साथ में अम्बा जी के दर्शन पाएँ,
मित्रों से आमंत्रण पाएँ, बाद में पार्टी उन्हें खिलाएँ,
एक पुरानी कार दिलवाएँ, जिस पर बैठ सभी इतराएँ,
प्यारा सा एक नाम हुझाएँ, सखी नाम से वो शरमाएँ,
आजवा में पिकनिक मनाएँ, यादगार उसे बतलाएँ,
कुछ नए करतब दिखलाएँ, फ़ील्ड पार्टी में स्थान बनाएँ,
जब भी हम फील्ड में जाएँ, आशंकित, आतंकित उन्हें करवाएँ,
सूरत हमारी देख सुख पाएँ, मन ही मन हम खैर मनाएँ,
सुनिए -  सुनिए कह कर चिल्लाएँ, हम से घर के काम कराएँ ,
टूर आदि पर प्रतिबंध लगाएँ, बाहर जाने से कतराएँ,
फिर भी विदेश घूम कर आए, कुछ उपहार सभी ने पाए,
बहनों ने प्रस्ताव सुझाए, कुछ के चेहरे ईर्ष्या से कुम्हलाए,
विश्रुत भैया ने प्यार जगाए, बाल सुलभ क्रीडा दिखलाए,
दादा – दादी से आशिष पाए, बुआ- चाचा एक खिलौना पाए,
तोतली बोली से सब हर्षाए,नित नव गतियाँ पाए,
रोते हुए स्कूल को जाएँ, शाम को मानों भूत चढ़ जाए,
खाने में जब नखरे आएँ, पूरी लौकी में सन जाएँ,
देसी घी की सब्ज़ी ले जाएँ, झाड़ी को अर्पित कर आएँ,  
भूख के कारण वो चिल्लाए, सिर में रोज़ दर्द बताए, 
यह बात किसी को समझ न आए, बच्चों से सब खबरें पाएँ,
फिर आई मुग्धा बेचारी, बिली कूद कूद कर हारी,
ऐसी नई कला दिखलाई, भैया को नानी याद दिलाई,
जोरहाट में जब हम आए, डर के कारण जी ना पाए,   
एक रात बहुत घबराए, सुबह को सब जीवित पाए,
तब जीवन का अर्थ समझ में आया, प्रभु की कृपा से नवजीवन पाया,
कॉलोनी में समय बिताया, तब आनंद असम का आया,
दूभर जीवन  मुंबई में पाए, भाग दौड़ से उबर न पाए,
ऑफ़्शोर की नई परेशानी, फिर हमने हार न मानी,
पत्नी ने अच्छा साथ निभाया, घर का दायित्व खूब निभाया,
ग्यारह साल का समय निकाला, कविता में काफी नाम कमाया,
बालकों ने शिक्षा ले लीन्हीं,  अपनी अभिरुचि ज़ाहिर कीन्हीं,
भाई – बहनों की शादी रचवाई,  लेकिन रजनी का नंबर नाहीं,
क्रूर काल ने पिता को छीना, पर अन्य कुछ संबंधी दीन्हा ,
साथ कुछ नातेदार आए, उन सबसे संबंध बढ़ाए,
एक शाम कारैक्काल के आदेश आए, सुन कर ही जी घबराए,
फिर भी सपत्नीक यहाँ पर आए, विश्रुत को हॉस्टल में रख आए,
रीति रिवाज़, भाषा चलन अपनाए, फिर भी सब में घुल न पाए,
रिश्तेदार यहाँ कुछ आए, शेष कागज़ी प्लान बनाए,
घर परिवार रहा सब मानी, पति सेवा की नहिं सानी,
सदा कल्याण परिवार का चाहा, चहे जितना द्वन्द  मचाया,
ईश्वर भक्ति में विश्वास जगाया, मानव सेवा में जीवन चलवाया,
दया, ममता, तयाग की मूरत जानी, पति हित में जानी पहचानी,
सभी जानवर खूब गिधाए, रोटी उनको रोज़ खिलाए,
इसी कशमकश में बीते साल साल पचीस,
मुग्धा भी नौकरी पा गई, रही कृपा जगदीश.
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