श्री बलराम चरित
द्वापर में राजा हुए, नाम रहा उग्रसेन,
मथुरा उनका राज था, सचिव थे शूरसेन.
उनके सुत वसुदेव थे, वीर, धीर, गंभीर,
यौवन में ही हर सके, सभी जनों की पीर.
बहन चचेरी कंस की, जो था राजकुमार,
सुता देवकी भूप की, बनी वसुदेव प्यार.
कंस सारथी बन चला, भेज उन्हें ससुराल,
पति पत्नी दोनों दिखें, लगते थे खुशहाल.
विधना ने लीला रची, बोल पड़ा आकाश,
अष्टम सुत बहन का, बने काल विनाश.
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सुन अंबर से घोषणा, लगा बढ़ा आघात,
चिंता मामा कंस की, बढ़ रही दिन रात.
कंस सोचता वध करूँ, ले लूँ इसकी जान,
समझाया वसुदेव ने, भेंट करूँ संतान.
मति भ्रम उसका हो गया, किसे आठवाँ मान,
जन्म मरण के फेर में, पहला किसको जान.
कैसे बदला ले सकूँ, दिया जेल में डाल,
पहरा और कड़ा किया, आने वाला लाल.
छह सुत का वध हो चुका, घटना घटी विचित्र,
गर्भ देवकी का गिरा, खेला ईश चरित्र.
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भ्रूण देवकी से लिया, दिया रोहिणी मात,
रानी थी वसुदेव की, छिपी रही वह बात.
इस विधि गर्भ बदल गया, रही प्रभु करामात,
उचित समय पैदा हुआ, बनी रोहिणी मात.
जन्म वसुलाल का हुआ, दैवी शक्ति अपार,
संकर्षण का नाम दे, लिया मनुज अवतार.
तनिक बड़े भाई बने, दाऊ कहते श्याम,
रक्षा करते हर जगह, साथ रहें बलराम.
मथुरा में जन्म लिए, पंडित रखते नाम,
देख मुहूर्त उन्हें कहा, यह होगा बलराम.
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गर्भ आठवां रुक गया, जन्म लिया अवतार,
कारा में ही आ गए, कृष्ण रूप इस बार.
जन्म योग माया दिया, ललना जसुदा मात,
उस से ही बदली गई, कान्हा की सौगात.
पता नहीं कैसे घटा, अजब सा चमत्कार
हत्या चाहे जब करे, सावधान हर बार.
तू क्या मारेगा मुझे, प्रकट हुआ अवतार,
गोकुल में पैदा हुआ, कर देगा उद्धार.
दोनों साथ पले बढ़े, श्याम और बलराम,
गोकुल में बचपन गया, माखन मिश्री धाम.
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दाऊ तो बलराम थे, नन्हे माखनचोर,
भाँति भाँति लीला करें, बालक नन्द किशोर.
गाय चराते लाल थे, रख कर हल को हाथ,
उनको हलधर भी कहें, शक्ति रूप थे भ्रात.
कंस भिड़ाता जुगत रहा, क्या कर सकूँ उपाय,
मंत्र, तंत्र की शक्ति से, अष्टम सुत मर जाय.
सारे बालक मर सकें, ऐसा रच षडयंत्र,
सभी कला, जादूगरी, फूँक दिए कुछ मंत्र.
आवाहन पर आ गए, राक्षस और पिशाच,
किसी तरह से मार दूँ, करें प्रताड़ित नाच,
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नाना क्रीड़ा वे करें, गोकुल में हैरान,
करतब उनके देख कर, हो रहे परेशान.
रूप काग, वक के धरे, करें जतन, लें जान,
दूध पिलाती पूतना, कान्हा हरते प्रान.
भेजा असुर प्रलंब को, लेने उनकी जान,
उलटे असुर मार दिया, हर कर उसके प्रान.
धेनुक वनमाली बना, धरा गधे का रूप,
गायों में जा कर मिला, करते विनाश भूप.
दोनों जन भेजे गए, बनें सीख, पढ़ आर्य,
गुरुकुल में शिक्षा दें, संदीपनि आचार्य.
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देवी गुरु माँ थी सुमुखि, करती सबको प्यार,
दाऊ या सुदामा हों, रखा एक व्यवहार.
अस्त्र, शस्त्र में निपुण थे, मिला कैशोर्य भ्रात,
गदा युद्ध शिक्षक बने, समझ नियम की बात.
छल से भेजा कंस ने, चतुर सचिव अक्रूर,
गोकुल को दे सांत्वना, लाएं भ्रात जरूर.
वहाँ पहुंच कर ले रहे, मथुरा का सब हाल,
मुष्टिक कुश्ती में हना, मारें दाऊ लाल.
मार कंस को दे दिया, नाना जी को राज,
मथुरा की हर्षित प्रजा, सुदृढ़ किया समाज.
---35
कंस साथ राजा रहे, जरासंध कुछ खास,
महावीर योद्धा कहें, रखिए हमको पास.
मरा जमाई कंस जब, था दुखी जरासंध,
जरासंध का वैर था, कृष्ण काटते फंद.
जरासंध से वैर ले, ठाना समर महान,
अपनी शक्ति दिखा सके, उनका ले बलिदान.
दाऊ बोले श्याम से, छोड़ो क्यों हर बार,
एक बार में वार कर, इसका कर उद्धार.
श्याम कहें, छोड़ूँ इसे, लाए मित्र हर बार,
उन्हें मार कर कम करूँ, पापी का संहार.
---40
सत्रह बार युद्ध करें, दें जरासंध छोड़.
राजा लाए हर दफा, घेर-घार कर जोड़.
दुर्योधन को दे दिया, गदा युद्ध का ज्ञान,
भीम शिष्य उनके बने, दोनों एक समान.
दोनों भाई रख रहे, अपने गुरु का मान,
ऐसी ना नौबत रही, आपस भिड़ें महान.
कान्हा को हरदम मिला, दाऊ का सहयोग,
मिल कर दोनों ने किया, शांतिपूर्ण उपयोग.
लगा शान्ति अब छा गई, चलते अपने धाम,
नगर द्वारिका में बसे, श्याम और बलराम.
---45
ब्रह्मा ने खुश हो दिया, रेवत को वरदान,
उसका ब्याह दाऊ से, कर दो कन्यादान.
रही छब्बीस हाथ की, रहा रेवती नाम,
खींचा हल, छोटा किया, नाम रहा बलराम.
ब्याह रेवती से किया, मात पिता आराम,
कान्हा हरते रुक्मिणी, लाए चारों धाम.
बहन सुभद्रा भेज दी, पांडव अर्जुन साथ,
रही भूमिका कृष्ण की, उसने थामा हाथ.
जामवंती सुत रहा, साम्ब रहा था नाम,
प्रेम लक्ष्मणा से हुआ, ब्याह गंधर्व काम.
---50
दुर्योधन नाराज था, शादी के विपरीत,
बंदी बना साम्ब दिखा, कैसे निभेगी रीत.
पता चला बलराम को, हल ले आए साथ,
समझ नहीं आया उसे, गुस्सा दाऊ माथ.
धरा डुबाऊँ सोचते, दाऊ करें विचार,
युद्ध टला, विवाह हुआ, बसा दिया परिवार.
कौरव अत्याचार में, रहे दूर विश्राम,
शान्त रहें, तीरथ करें, घूम चले बलराम.
उनके पीछे घट गया, घटना का इतिहास,
लाक्षागृह, विष भीम को, खेल शकुनि परिहास.
---55
सभा कौरवों की रही, दुर्योधन युवराज,
महाराज बोले नहीं, साधा मौन समाज.
हारे पांडव द्यूत में, खो बैठे सब राज,
दुखी द्रौपदी रो रही, देखे सकल समाज.
चीर द्रौपदी का हरा, रहे पांडव मौन,
धर्मराज की नीतियाँ, आगे बोले कौन.
रहे कर्ण भी साथ में, दुष्ट शकुनि की चाल,
नहीं एक कौरव फंसा, उनके मायाजाल.
दासी सुत युयुत्सु रहा, करे नीति की बात,
एक विकर्ण भी नहीं, युवराज के साथ.
----60
दावत दी धृतराष्ट्र ने, फिर से करिए खेल,
मना नहीं युधिष्ठिर की, सोचा होगा मेल.
दोबारा फिर द्यूत का, राजा का आदेश,
शायद इस बार बदला, राज सभा परिवेश.
पहले से ही तय करी, हार जीत की शर्त,
हों बारह साल बन में, और अज्ञात पर्त.
साथ द्रौपदी को लिया, पूरा कर बनवास,
बिना युद्ध कुछ ना मिले, ऐसा दे आभास.
राजी से माना नहीं, कौरव का युवराज,
सेना मांगी कृष्ण से, हरि का अर्जुन नाज,
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दोनों पक्षों के मरे, जाने माने वीर,
भाग गया युवराज भी, भीतर सरवर नीर.
जब ललकारा भीम ने, गदा युद्ध आव्हान,
जीत दिखी युवराज की, गांधारी वरदान.
किया इशारा भीम को, करो जाँघ पर वार,
मारो दुर्बल अंग पर, अपनी गदा प्रहार.
यात्रा से वापस हुए, तब भाई बलराम,
लगे डाटने भीम को, उसने किया प्रणाम.
दाऊ से कान्हा कहें, आने में की देर,
इतना सब कुछ हो चुका, तब पूछे हो खैर.
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रण में जीवित बच गया, अश्वत्थामा वीर,
उसके मस्तक मणि लगी, सबकी हरती पीर.
साथ दिया युवराज का, पांडव वध से चैन,
मार दिए पाँचों तनय, भ्रम हो गया रैन.
दुर्योधन भी मर गया, मिला श्याम सहयोग,
अश्वत्थामा घिर गया, दे मणि पाया रोग.
दाऊ बसते द्वारका, रहे कृष्ण के साथ,
छाया सदृश रहे वहाँ, सिर पर रख कर हाथ.
सुत उल्मुख निशत्थ हुए, सुता वत्सला नाम,
आयु भली जी कर चले, प्रभु लोक के धाम.
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सबने देखा निकलता, मुख से उनके नाग,
किया प्रवेश समुद्र में, योग से प्राण त्याग.
त्रेता युग में राम से, लखन हुए नाराज,
छोटा नहीं बनाइए, कहता सकल समाज.
दिया वचन तब राम ने, अगले युग में सत्य,
होगे भ्राता तुम बड़े, उस जीवन का तथ्य.
द्वापर युग में वह हुए, कृष्ण रूप में राम,
छोटे तो कान्हा हुए, लखन बड़े बलराम.
मिलती हमको प्रेरणा, रहो भ्रात के साथ,
उससे बढ़ती एकता, जोड़ो दोनों हाथ.
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