Sunday, 9 March 2025

विदुर चरित - 60


विदुर चरित 
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बात रही इतिहास की, शांतनु का था राज, 
राजन हस्तिनापुर के, होता सुखी समाज.

राजा की इच्छा जगी, बढ़ा काम का वेग,
मोहित गंगा पर हुए, दिखा नदी आवेग.

गंगा ने प्रस्ताव पर, कह दी अपनी बात,
राजा कुछ पूछे नहीं, वरना छोड़ूं साथ.

बेटे सात बहा दिए, गंगा जी की धार,
पूछ सके राजा नहीं, दिया ना पुत्र प्यार.

अष्टम सुत के जन्म पर, राजा तोड़ा शोक,
उसे छोड़ गंगा गई, वापस अपने लोक.
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तेजवान बालक बड़ा, देवव्रत रखा नाम,
भीष्म नाम बोला गया, जानो उसके काम.

कन्या एक और दिखी, मोहित होते राज,
पता चला जब बाद में, नाविक रहा समाज.

कामातुर शांतनु कहें, कन्या कर दो दान,
शर्त पिता उसके रखे, राज करे संतान.

शंका नाविक ने करी, संतति करती चाह,
भीष्म तब लें शपथ कहें, जीवन में न विवाह.

सत्यवती सुंदर रही, राजा हुए उदास,
पता भीष्म को जब चला, नहीं राज की आस.
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दो सुत सत्यवती जने, बड़े चित्रांगद नाम, 
विचित्रवीर्य अनुज हुए, पिता गए गोधाम.

काशिराज विवाह रचा, अपनी कन्या तीन,
जा कर भीष्म हरे उन्हें, हित था भाई दीन. 

अंबा वा अंबालिका, रही अंबिका संग,
लाए अपने साथ में, छुए न उनके अंग.

अंबा चाहे और को, वापस कर सम्मान, 
स्वीकारा ना प्रेम ने, वापस सह अपमान.  

मना भीष्म ने कर दिया, हुआ बुरा जब हाल,
मैं अब मरने जा रही, बनूं बाद में काल.
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दोनों भाई भी मरे, बिना किसी संतान,
वंश चलाने के लिए, किया व्यास आव्हान.

नयन बंद कर अंबिका, नेत्रहीन धृतराष्ट्र,
पीत हुई अंबालिका, पांडु देखते राष्ट्र.

दासी भेजी रानियां, अगली बार प्रयास,
भक्ति भाव से वह गई, ऋषि व्यास के पास.

दासी सुत को मिल गया, विदुर भक्त का नाम,
नहीं राज में रुचि रही, जपते हरदम राम.

व्यास पिता थे विदुर के, भीष्म चाचा समान,
दासी नाम परीश्रमी, नहीं मिला सम्मान.
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बचपन से करते रहे, उनकी रक्षा भीष्म,
तीनों बंधु अलग रहे, ज्यों बेर,आम, नीम.

शिक्षा, दीक्षा सम रही, सभी गुण का विकास,
शेष रही मानसिकता, संतति समझें दास.

बुद्धि, बल, सहनशीलता, सारी उसके पास,
मान भीष्म समान उन्हें, राज सभा की आस.

कौरव, पांडव सब कहें, काका विदुर महान,
खड़ी समस्या जब हुई, वही बचाते जान.

राज सभा ने विदुर को, दिया खास सम्मान,
माना महामंत्री उन्हें, दे कर प्रमुख स्थान.
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नीति, तर्क, प्रस्ताव रहे, हरदम उनके पास,
गलत बात को काट दें, कर विरोध, विश्वास.

बाद निधन के पांडु के, धृतराष्ट्र लें कमान,
अग्रज होने से उन्हें, मिला पूर्ण सम्मान.

निष्ठा से धृतराष्ट्र ने, देखा अपना राज,
महासचिव उनको बना, हर्षित हुआ समाज.
   
पैनी नजर विदुर रखें, गतिविधि चारों ओर,
घटना कहीं घटित हो, मिले सूचना फोर.

दिखा खोट नीयत लगा, ईर्ष्या थी संतान,
बच्चे खेलें साथ में, गुरुजन रखते ध्यान.
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शत कौरव धृतराष्ट्र सुत, दुर्योधन का मान,
उन के अग्रज युधिष्ठिर, नीति धर्म सम्मान.

मानें कौरव यह सदा, राजा उनके बाप,
करते बाल शरारतें, मन में रख कर पाप.

भीष्म, द्रोण थे राज में, पाते नहीं नकार,
राजा का खाया नमक, उसके भागीदार.

बढ़ता उन का हौसला, देते शकुनि सलाह,
राजा भी लाचार थे, पुत्र मोह था राह.

अपने भांजे के लिए, शकुनि रचें षड्यंत्र,
दुर्योधन का हित लखें, मिलता शासन तंत्र.
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अग्रज दुर्योधन रखे, सदा वैर का भाव,
सीमा लांघ कुमार ने, अनुचित जमा प्रभाव.

लाक्षागृह बनवा दिया, रखी योजना गुप्त,
पता विदुर को चल गया, पांडव होते लुप्त.

उनके जीवन के लिए, बनवा गुप्त मार्ग,   
सीमा पार कुंती को, भेज दिए सब भाग.

मदद सही की वह करें, रखें इरादे नेक,
प्रतिनिधि राजसभा बने, सीमा रहीं अनेक.

राजकुमार बहुत करे, चाचा का अपमान,
सिंहासन के साथ थे, दासी सुत प्रमान.
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सत्ता से बाहर रखे, था प्रयास हर बार,
बटवारे के भाग को, हड़पें राजकुमार.

रहा बहाना द्यूत का, शकुनि खेलते दांव,
राज सभा भी देख ले, छल के अपने पांव.

चीर हरण पर खिन्नता, द्यूत पर भी विरोध,
आगे उसके झुक गए, बिना किसी प्रतिरोध.

कहने पर माना नहीं, जिद्दी राज कुमार, 
क्रोध दिला, अनुचित कहे, बात वह लगातार.

बारह वर्ष वन में रखा, ले पत्नी को साथ,
सहमत नहीं भाग मिले, रहा शकुनि का हाथ.
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रोक कुन्ती को लिया, पांडव लें बनवास,
राज महल में ना रहें, प्रस्तुत है आवास.

मान रखा धृतराष्ट्र का, दे अग्रज सम्मान,
किया विरोध अनुचित का, रख कर अपना मान.

पांडव भेजें कृष्ण को, दूर करें अवरोध.
खोजें हल ऐसा कहीं, बिना अधिक विरोध.

अपनी बात अड़ा रहा, बिना समर नहिं राज,
अपमानित कर कृष्ण को, छोड़ी सबकी लाज.

दर्शन विराट रूप के, देते खुद भगवान,
भीष्म, विदुर लें समझ, नहीं युवराज भान.
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सरल हृदय के विदुर को, पची नहीं यह बात,
राजनीति से दूर हो, बाहर रातों रात.

मिलने कृष्ण चले गए, विदुरानी के पास,
छिलके केले खा लिए, रखा बुआ विश्वास.

गलत जिद के विरोध में, रहे युद्ध से दूर,
महाभारत लड़े नहीं, रखी नज़र भरपूर.

निर्णय निकला समर का, गए पांडव जीत,
गांधारी सुत सब मरे, नाना वीर शहीद.

राज युधिष्ठिर को मिला, किया धर्म से राज,
सुखी प्रजा सारी रही, हर्षित सकल समाज.
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राज पाट को छोड़ कर, थामा भाई हाथ, 
विदुर तीर्थ यात्रा चले, भाई, भाभी साथ.

गांधारी, कुंती, विदुर, चले धृतराष्ट्र साथ,
आश्रम में ऋषि व्यास के, करें सत्संग बात.

मान राय भगवान की, मिलने चले सम्राट,
दर्शन पूर्वज के करें, सभी जोहते बाट.

धर्मराज को ज्ञान दें, सभी नीति का सार, 
सूक्ष्म शरीर घुस गया, सम्राट के दिल पार.

रहा उद्देश्य तीर्थ का, कर लें जीवन अंत,
नमन आज हम सब करें, विदुर समकक्ष संत.
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मंदोदरी चरित - 64


मंदोदरी चरित : -

मिले पुराणों में कथा, दैवी कन्या मान,
शिव जी के आशीश से, मायासुर संतान.

मायासुर दानव रहा, असुर का महाराज,
पत्नी हेमा साथ में, संभाल रही राज.

हेमा रहती भक्ति में, शिव चरणों में लीन, 
पुत्री रही मंदोदरी, सब गुणों में प्रवीन.

एक बार की बात है, हुईं पार्वती क्रुद्ध,
हेमा तनया तन दिखी, शिव की भभूत शुद्ध.

उस ने गुस्से में दिया, मंदोदरी को श्राप,
बन जाए वह मेंढकी, कटें राम से पाप.
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अवधि शाप की कम करी, शिव की मानी राय, 
परशुराम थे खोजते, रावण हेतु उपाय,

बारह साल की अवधि तक, चले मेंढकी श्राप,
सघन वनों में वह रही, काटे अपना पाप.

परशुराम से भेंट में, मिलता नारी रूप, 
कृपा पार्वती की रही, पाए गुण अनूप.

मयदानव को दे दिया, लालन पालन भार,
हेमा ने मन से दिए, सभी भले संस्कार.

कन्या वह अद्वितीय थी, पाया सुंदर रूप,
विद्यावान के साथ ही, उसके गुण अनूप. 
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उस ने करी उपासना, शिव की भक्त महान, 
हो प्रसन्न शिव ने दिया, उसको यह वरदान.

उसे पंच कन्या कहा, मिला चिर-सती मान, 
रावण से विवाह हुआ, पटरानी सम्मान.

बड़ी बहन मंदोदरी, मायासुर संतान,
धन्यमालिनी लघु रही, माना एक समान.

धन्यमालिनी साथ में, मंदोदरी की सौत,
तेजस्वी थे पुत्र भी, उनसे डरती मौत.

पति का भला विचारती, धरती हर पल ध्यान, 
गलत बात, व्यवहार हो, देती राय निदान.
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पूर्ण समर्पण, प्यार दे, दिल से पति को मान,
अनुपम अनिंद्य सुंदरी, बनती रावण शान.

पति-पग में निष्ठा रही, पति ही था ईमान, 
पति की थी‌ हितकारिणी, पति में बसती जान.

पालन दानव रूप में, पा समग्र संस्कार, 
लंका का वैभव मिला, उन सबको उपहार.

ऋषियों से शिक्षा मिली, पाया समुचित ज्ञान,
रावण भीषण तप करे, मिले विविध वरदान.

रावण माता कैकसी, विश्व श्रवा थे बाप,  
उसके पिता ब्राह्मण ऋषि, काटें सबके पाप.
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बहुत बड़ा शिव भक्त था, अनुपम पाया ज्ञान,
काटे अपने शीश दस, पा शिव का वरदान.

लंका मांगी दान में, दो, सदा हो प्रसन्न,
दानी भोले नाथ ने, हुए बिना अवसन्न.

रची कहानी शौर्य की, भरा पूर्ण अभिमान,
देव सभी बंदी बने, तीन लोक सम्मान.

रावण माता दानवी, दुर्गुण मिले अनेक, 
ज्ञान पिता से पा लिया, गुण की मिटती रेख.

राहु, शनि और केतु थे, उसके कारावास,
महा भक्त शिव का बना, इसका था आभास.
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जीता तीनों लोक को, बना काल भी दास,
आया अहंकार उसे, मंदोदरी उदास.

इस अहंकार ने किए, गलत अनेकों काम,
अनुचित के विचार बिना, लिया वैर श्रीराम.

ज़िक्र अन्य रानी मिले, जो रही विष्णु भक्त,
रावण चिढ़ा, मार दिया, नहीं हुआ आसक्त.

जिसके सुत नरांतक थे,  देवांतक और प्रहस्त,
निस्संदेह वीर रहे, रावण भी आश्वस्त.

मंदोदरी ने सुत जने, बड़ा था मेघनाद, 
अक्षय उसका अनुज था, आया उसके बाद.
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त्रिशरा था सुत धन्यमालिनी, अतिकाय बनी मात,
सब संतान रावण से, काल तलक घबरात.

मेघनाद को पिता ने, दिया मान युवराज,
बड़ा तपस्वी वह रहा, जीत लिया देवराज.

ऋषिगणों से ली शिक्षा, मिले कई वरदान,
मायावी शक्तियां मिलीं, आसुर शक्ति महान.

स्वामी अनुपम वर रहे, मिला तंत्र मंत्र ज्ञान,
बल साहस अद्भुत मिला, हुए वीर बलवान.

रही वीर मृदु भाषिणी, पति सेवा में लीन,
नेक राय उसकी सदा, करती पति गमगीन.
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लगते उसे जहां कहीं, पति के गलत विचार, 
कोशिश करे सुधर सके, बीच था अहंकार.

बिना नाक सूपर्णखा, रावण का अपमान,
सीता हरण सुझाव का, कर विरोध जी जान.

सीता की सुध ले रहे, महावीर हनुमान,
भांपी तब मंदोदरी, घटना चक्र महान.

सेतु बांध पूजा करें, हों पंडित लंकेश, 
मंदोदरी बतला रही, जाएंगे हृदयेश.

गई साथ मंदोदरी, पूजा हो संपन्न, 
शिव लिंग रामेश्वर का, करा किया स्थापन्न.
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ले कर सीता साथ में, चल पड़ी यज्ञ स्थान,
रावण भी तब कर सका, महायज्ञ अनुष्ठान.

करी प्रार्थना शारदा, दो सुबुद्धि पतिदेव,
मुक्ति दक्षिणा में कहें, राम साधना देव.

पत्नी धर्म निभा रही, चाहे पति कल्यान,
सही गलत कहती सदा, रख कर कुल का मान.

गलत बात पर टोकती, धरती ध्यान विशेष,
सहे उपेक्षा सजन की, माने सब आदेश.

माता के अधिकार का, करती उचित प्रयोग, 
शिक्षा दे कुल, नीति की, अवसर का उपयोग.
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सहमत नहीं कभी हुई, नन्द छेड़ती राम,
नाक कटा कर आ गई, सूपनखा घर धाम.

सीता हरण सहमति नहीं, रावण ले कर साथ,
नहीं राय मारीच की, हो गुनाह में हाथ.

लंका में सीता रखी, उपवन अशोक छांव,
रावण दे जब त्रास का, खेल दिखा भय दांव.

हाथ पकड़ कर रोकती, जब वध को तैयार,
एक माह के समय की, रावण की मनुहार.

बार बार समझा कहे, पति से यह अनुरोध,
आग लगा लंका गए, करें नहीं प्रतिरोध.
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लात मार कर भ्रात को, नहीं किया कुछ ठीक,
हो बदनामी आप की, गलत पड़ेगी लीक.

रावण ने पूजा करी, बन सके वह अजेय,
पता चला हनुमान को, किया भंग अंजनेय.

अंदर से धकिया लिया, लाए रानी खींच,
देख उठा आवेश में, वध हित मुक्का भींच.

समझाया हनुमान ने, पूजन विधि संपूर्ण,
कोई भी हो प्रार्थना, पत्नी बिना अपूर्ण.

कहा विभीषण चाहिए, रावण वध का बाण,
हनुमत ज्योतिष वेश में, फूंक वचन के प्राण.
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अपनी बात बता कहें, जनता मन की बात,
जगा विश्वास सभी में, मंदोदरी कह जात.

पता बाण का जब लगा, हनुमत बनते मूल,
खंभ तोड़ कर बाण ले, चले मिटाने शूल. 

उसी बाण से मर गया, असुर राज लंकेश,
रावण निकट लखन गए, धर्म नीति संदेश.

आहत थी मंदोदरी, पति निधन समाचार,
फिर भी वह संतुष्ट थी, रावण बेड़ा पार.

रावण के विभीषण थे, लंका के सम्राट,
नीति धर्म से राज से, जनता का दुख बाट.
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असुर वंश कैसे चले, थी चिंता की बात,
किया विभीषण साथ में, पुनर्विवाह इक रात.

यह भी एक कारण था, रहे मित्रता राम,
शासन भी विधिवत चले, अमर राज्य का नाम.

राज करे मंदोदरी, छाई सुख समृद्धि,
न्याय, धर्म स्थापना, अमन चैन अभिवृद्धि.

रही पंच कन्या अमर, पाया ऋषि आशीश,
नेक काम में याद हो, करते याद गिरीश.
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