विदुर चरित
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बात रही इतिहास की, शांतनु का था राज,
राजन हस्तिनापुर के, होता सुखी समाज.
राजा की इच्छा जगी, बढ़ा काम का वेग,
मोहित गंगा पर हुए, दिखा नदी आवेग.
गंगा ने प्रस्ताव पर, कह दी अपनी बात,
राजा कुछ पूछे नहीं, वरना छोड़ूं साथ.
बेटे सात बहा दिए, गंगा जी की धार,
पूछ सके राजा नहीं, दिया ना पुत्र प्यार.
अष्टम सुत के जन्म पर, राजा तोड़ा शोक,
उसे छोड़ गंगा गई, वापस अपने लोक.
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तेजवान बालक बड़ा, देवव्रत रखा नाम,
भीष्म नाम बोला गया, जानो उसके काम.
कन्या एक और दिखी, मोहित होते राज,
पता चला जब बाद में, नाविक रहा समाज.
कामातुर शांतनु कहें, कन्या कर दो दान,
शर्त पिता उसके रखे, राज करे संतान.
शंका नाविक ने करी, संतति करती चाह,
भीष्म तब लें शपथ कहें, जीवन में न विवाह.
सत्यवती सुंदर रही, राजा हुए उदास,
पता भीष्म को जब चला, नहीं राज की आस.
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दो सुत सत्यवती जने, बड़े चित्रांगद नाम,
विचित्रवीर्य अनुज हुए, पिता गए गोधाम.
काशिराज विवाह रचा, अपनी कन्या तीन,
जा कर भीष्म हरे उन्हें, हित था भाई दीन.
अंबा वा अंबालिका, रही अंबिका संग,
लाए अपने साथ में, छुए न उनके अंग.
अंबा चाहे और को, वापस कर सम्मान,
स्वीकारा ना प्रेम ने, वापस सह अपमान.
मना भीष्म ने कर दिया, हुआ बुरा जब हाल,
मैं अब मरने जा रही, बनूं बाद में काल.
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दोनों भाई भी मरे, बिना किसी संतान,
वंश चलाने के लिए, किया व्यास आव्हान.
नयन बंद कर अंबिका, नेत्रहीन धृतराष्ट्र,
पीत हुई अंबालिका, पांडु देखते राष्ट्र.
दासी भेजी रानियां, अगली बार प्रयास,
भक्ति भाव से वह गई, ऋषि व्यास के पास.
दासी सुत को मिल गया, विदुर भक्त का नाम,
नहीं राज में रुचि रही, जपते हरदम राम.
व्यास पिता थे विदुर के, भीष्म चाचा समान,
दासी नाम परीश्रमी, नहीं मिला सम्मान.
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बचपन से करते रहे, उनकी रक्षा भीष्म,
तीनों बंधु अलग रहे, ज्यों बेर,आम, नीम.
शिक्षा, दीक्षा सम रही, सभी गुण का विकास,
शेष रही मानसिकता, संतति समझें दास.
बुद्धि, बल, सहनशीलता, सारी उसके पास,
मान भीष्म समान उन्हें, राज सभा की आस.
कौरव, पांडव सब कहें, काका विदुर महान,
खड़ी समस्या जब हुई, वही बचाते जान.
राज सभा ने विदुर को, दिया खास सम्मान,
माना महामंत्री उन्हें, दे कर प्रमुख स्थान.
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नीति, तर्क, प्रस्ताव रहे, हरदम उनके पास,
गलत बात को काट दें, कर विरोध, विश्वास.
बाद निधन के पांडु के, धृतराष्ट्र लें कमान,
अग्रज होने से उन्हें, मिला पूर्ण सम्मान.
निष्ठा से धृतराष्ट्र ने, देखा अपना राज,
महासचिव उनको बना, हर्षित हुआ समाज.
पैनी नजर विदुर रखें, गतिविधि चारों ओर,
घटना कहीं घटित हो, मिले सूचना फोर.
दिखा खोट नीयत लगा, ईर्ष्या थी संतान,
बच्चे खेलें साथ में, गुरुजन रखते ध्यान.
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शत कौरव धृतराष्ट्र सुत, दुर्योधन का मान,
उन के अग्रज युधिष्ठिर, नीति धर्म सम्मान.
मानें कौरव यह सदा, राजा उनके बाप,
करते बाल शरारतें, मन में रख कर पाप.
भीष्म, द्रोण थे राज में, पाते नहीं नकार,
राजा का खाया नमक, उसके भागीदार.
बढ़ता उन का हौसला, देते शकुनि सलाह,
राजा भी लाचार थे, पुत्र मोह था राह.
अपने भांजे के लिए, शकुनि रचें षड्यंत्र,
दुर्योधन का हित लखें, मिलता शासन तंत्र.
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अग्रज दुर्योधन रखे, सदा वैर का भाव,
सीमा लांघ कुमार ने, अनुचित जमा प्रभाव.
लाक्षागृह बनवा दिया, रखी योजना गुप्त,
पता विदुर को चल गया, पांडव होते लुप्त.
उनके जीवन के लिए, बनवा गुप्त मार्ग,
सीमा पार कुंती को, भेज दिए सब भाग.
मदद सही की वह करें, रखें इरादे नेक,
प्रतिनिधि राजसभा बने, सीमा रहीं अनेक.
राजकुमार बहुत करे, चाचा का अपमान,
सिंहासन के साथ थे, दासी सुत प्रमान.
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सत्ता से बाहर रखे, था प्रयास हर बार,
बटवारे के भाग को, हड़पें राजकुमार.
रहा बहाना द्यूत का, शकुनि खेलते दांव,
राज सभा भी देख ले, छल के अपने पांव.
चीर हरण पर खिन्नता, द्यूत पर भी विरोध,
आगे उसके झुक गए, बिना किसी प्रतिरोध.
कहने पर माना नहीं, जिद्दी राज कुमार,
क्रोध दिला, अनुचित कहे, बात वह लगातार.
बारह वर्ष वन में रखा, ले पत्नी को साथ,
सहमत नहीं भाग मिले, रहा शकुनि का हाथ.
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रोक कुन्ती को लिया, पांडव लें बनवास,
राज महल में ना रहें, प्रस्तुत है आवास.
मान रखा धृतराष्ट्र का, दे अग्रज सम्मान,
किया विरोध अनुचित का, रख कर अपना मान.
पांडव भेजें कृष्ण को, दूर करें अवरोध.
खोजें हल ऐसा कहीं, बिना अधिक विरोध.
अपनी बात अड़ा रहा, बिना समर नहिं राज,
अपमानित कर कृष्ण को, छोड़ी सबकी लाज.
दर्शन विराट रूप के, देते खुद भगवान,
भीष्म, विदुर लें समझ, नहीं युवराज भान.
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सरल हृदय के विदुर को, पची नहीं यह बात,
राजनीति से दूर हो, बाहर रातों रात.
मिलने कृष्ण चले गए, विदुरानी के पास,
छिलके केले खा लिए, रखा बुआ विश्वास.
गलत जिद के विरोध में, रहे युद्ध से दूर,
महाभारत लड़े नहीं, रखी नज़र भरपूर.
निर्णय निकला समर का, गए पांडव जीत,
गांधारी सुत सब मरे, नाना वीर शहीद.
राज युधिष्ठिर को मिला, किया धर्म से राज,
सुखी प्रजा सारी रही, हर्षित सकल समाज.
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राज पाट को छोड़ कर, थामा भाई हाथ,
विदुर तीर्थ यात्रा चले, भाई, भाभी साथ.
गांधारी, कुंती, विदुर, चले धृतराष्ट्र साथ,
आश्रम में ऋषि व्यास के, करें सत्संग बात.
मान राय भगवान की, मिलने चले सम्राट,
दर्शन पूर्वज के करें, सभी जोहते बाट.
धर्मराज को ज्ञान दें, सभी नीति का सार,
सूक्ष्म शरीर घुस गया, सम्राट के दिल पार.
रहा उद्देश्य तीर्थ का, कर लें जीवन अंत,
नमन आज हम सब करें, विदुर समकक्ष संत.
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