Sunday, 9 March 2025

मंदोदरी चरित - 64


मंदोदरी चरित : -

मिले पुराणों में कथा, दैवी कन्या मान,
शिव जी के आशीश से, मायासुर संतान.

मायासुर दानव रहा, असुर का महाराज,
पत्नी हेमा साथ में, संभाल रही राज.

हेमा रहती भक्ति में, शिव चरणों में लीन, 
पुत्री रही मंदोदरी, सब गुणों में प्रवीन.

एक बार की बात है, हुईं पार्वती क्रुद्ध,
हेमा तनया तन दिखी, शिव की भभूत शुद्ध.

उस ने गुस्से में दिया, मंदोदरी को श्राप,
बन जाए वह मेंढकी, कटें राम से पाप.
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अवधि शाप की कम करी, शिव की मानी राय, 
परशुराम थे खोजते, रावण हेतु उपाय,

बारह साल की अवधि तक, चले मेंढकी श्राप,
सघन वनों में वह रही, काटे अपना पाप.

परशुराम से भेंट में, मिलता नारी रूप, 
कृपा पार्वती की रही, पाए गुण अनूप.

मयदानव को दे दिया, लालन पालन भार,
हेमा ने मन से दिए, सभी भले संस्कार.

कन्या वह अद्वितीय थी, पाया सुंदर रूप,
विद्यावान के साथ ही, उसके गुण अनूप. 
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उस ने करी उपासना, शिव की भक्त महान, 
हो प्रसन्न शिव ने दिया, उसको यह वरदान.

उसे पंच कन्या कहा, मिला चिर-सती मान, 
रावण से विवाह हुआ, पटरानी सम्मान.

बड़ी बहन मंदोदरी, मायासुर संतान,
धन्यमालिनी लघु रही, माना एक समान.

धन्यमालिनी साथ में, मंदोदरी की सौत,
तेजस्वी थे पुत्र भी, उनसे डरती मौत.

पति का भला विचारती, धरती हर पल ध्यान, 
गलत बात, व्यवहार हो, देती राय निदान.
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पूर्ण समर्पण, प्यार दे, दिल से पति को मान,
अनुपम अनिंद्य सुंदरी, बनती रावण शान.

पति-पग में निष्ठा रही, पति ही था ईमान, 
पति की थी‌ हितकारिणी, पति में बसती जान.

पालन दानव रूप में, पा समग्र संस्कार, 
लंका का वैभव मिला, उन सबको उपहार.

ऋषियों से शिक्षा मिली, पाया समुचित ज्ञान,
रावण भीषण तप करे, मिले विविध वरदान.

रावण माता कैकसी, विश्व श्रवा थे बाप,  
उसके पिता ब्राह्मण ऋषि, काटें सबके पाप.
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बहुत बड़ा शिव भक्त था, अनुपम पाया ज्ञान,
काटे अपने शीश दस, पा शिव का वरदान.

लंका मांगी दान में, दो, सदा हो प्रसन्न,
दानी भोले नाथ ने, हुए बिना अवसन्न.

रची कहानी शौर्य की, भरा पूर्ण अभिमान,
देव सभी बंदी बने, तीन लोक सम्मान.

रावण माता दानवी, दुर्गुण मिले अनेक, 
ज्ञान पिता से पा लिया, गुण की मिटती रेख.

राहु, शनि और केतु थे, उसके कारावास,
महा भक्त शिव का बना, इसका था आभास.
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जीता तीनों लोक को, बना काल भी दास,
आया अहंकार उसे, मंदोदरी उदास.

इस अहंकार ने किए, गलत अनेकों काम,
अनुचित के विचार बिना, लिया वैर श्रीराम.

ज़िक्र अन्य रानी मिले, जो रही विष्णु भक्त,
रावण चिढ़ा, मार दिया, नहीं हुआ आसक्त.

जिसके सुत नरांतक थे,  देवांतक और प्रहस्त,
निस्संदेह वीर रहे, रावण भी आश्वस्त.

मंदोदरी ने सुत जने, बड़ा था मेघनाद, 
अक्षय उसका अनुज था, आया उसके बाद.
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त्रिशरा था सुत धन्यमालिनी, अतिकाय बनी मात,
सब संतान रावण से, काल तलक घबरात.

मेघनाद को पिता ने, दिया मान युवराज,
बड़ा तपस्वी वह रहा, जीत लिया देवराज.

ऋषिगणों से ली शिक्षा, मिले कई वरदान,
मायावी शक्तियां मिलीं, आसुर शक्ति महान.

स्वामी अनुपम वर रहे, मिला तंत्र मंत्र ज्ञान,
बल साहस अद्भुत मिला, हुए वीर बलवान.

रही वीर मृदु भाषिणी, पति सेवा में लीन,
नेक राय उसकी सदा, करती पति गमगीन.
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लगते उसे जहां कहीं, पति के गलत विचार, 
कोशिश करे सुधर सके, बीच था अहंकार.

बिना नाक सूपर्णखा, रावण का अपमान,
सीता हरण सुझाव का, कर विरोध जी जान.

सीता की सुध ले रहे, महावीर हनुमान,
भांपी तब मंदोदरी, घटना चक्र महान.

सेतु बांध पूजा करें, हों पंडित लंकेश, 
मंदोदरी बतला रही, जाएंगे हृदयेश.

गई साथ मंदोदरी, पूजा हो संपन्न, 
शिव लिंग रामेश्वर का, करा किया स्थापन्न.
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ले कर सीता साथ में, चल पड़ी यज्ञ स्थान,
रावण भी तब कर सका, महायज्ञ अनुष्ठान.

करी प्रार्थना शारदा, दो सुबुद्धि पतिदेव,
मुक्ति दक्षिणा में कहें, राम साधना देव.

पत्नी धर्म निभा रही, चाहे पति कल्यान,
सही गलत कहती सदा, रख कर कुल का मान.

गलत बात पर टोकती, धरती ध्यान विशेष,
सहे उपेक्षा सजन की, माने सब आदेश.

माता के अधिकार का, करती उचित प्रयोग, 
शिक्षा दे कुल, नीति की, अवसर का उपयोग.
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सहमत नहीं कभी हुई, नन्द छेड़ती राम,
नाक कटा कर आ गई, सूपनखा घर धाम.

सीता हरण सहमति नहीं, रावण ले कर साथ,
नहीं राय मारीच की, हो गुनाह में हाथ.

लंका में सीता रखी, उपवन अशोक छांव,
रावण दे जब त्रास का, खेल दिखा भय दांव.

हाथ पकड़ कर रोकती, जब वध को तैयार,
एक माह के समय की, रावण की मनुहार.

बार बार समझा कहे, पति से यह अनुरोध,
आग लगा लंका गए, करें नहीं प्रतिरोध.
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लात मार कर भ्रात को, नहीं किया कुछ ठीक,
हो बदनामी आप की, गलत पड़ेगी लीक.

रावण ने पूजा करी, बन सके वह अजेय,
पता चला हनुमान को, किया भंग अंजनेय.

अंदर से धकिया लिया, लाए रानी खींच,
देख उठा आवेश में, वध हित मुक्का भींच.

समझाया हनुमान ने, पूजन विधि संपूर्ण,
कोई भी हो प्रार्थना, पत्नी बिना अपूर्ण.

कहा विभीषण चाहिए, रावण वध का बाण,
हनुमत ज्योतिष वेश में, फूंक वचन के प्राण.
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अपनी बात बता कहें, जनता मन की बात,
जगा विश्वास सभी में, मंदोदरी कह जात.

पता बाण का जब लगा, हनुमत बनते मूल,
खंभ तोड़ कर बाण ले, चले मिटाने शूल. 

उसी बाण से मर गया, असुर राज लंकेश,
रावण निकट लखन गए, धर्म नीति संदेश.

आहत थी मंदोदरी, पति निधन समाचार,
फिर भी वह संतुष्ट थी, रावण बेड़ा पार.

रावण के विभीषण थे, लंका के सम्राट,
नीति धर्म से राज से, जनता का दुख बाट.
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असुर वंश कैसे चले, थी चिंता की बात,
किया विभीषण साथ में, पुनर्विवाह इक रात.

यह भी एक कारण था, रहे मित्रता राम,
शासन भी विधिवत चले, अमर राज्य का नाम.

राज करे मंदोदरी, छाई सुख समृद्धि,
न्याय, धर्म स्थापना, अमन चैन अभिवृद्धि.

रही पंच कन्या अमर, पाया ऋषि आशीश,
नेक काम में याद हो, करते याद गिरीश.
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