कुंती चरित : -
द्वापर युग की बात है, प्रसिद्ध राजा भोज,
उनकी कन्या थी पृथा, पूजा करती रोज.
सेवा करती अतिथि की, श्रद्धा, भक्ति अपार,
रूपवती, गुण, सुन्दरी, सबका पाय दुलार.
अक्सर ऋषि आते दिखें, राजा जी के राज,
सेवा कुंती कर रही, पूरी निष्ठा, लाज.
एक बार की बात है, मिले दुर्वासा भोज.
स्वागत, सम्मान कर दिया, कुंती लाई खोज.
सेवा से प्रसन्न हुए, कुंती पाई मंत्र,
करे आव्हान किसी का, मिले देवता यंत्र.
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आ कर कोई देवता, दे जाए आशीश,
प्रसन्न कुंती हो गई, दर्शन की बक्शीश.
मंत्र परीक्षा सोच कर, हो जाती हैरान,
जांच करी यदि मंत्र की, जीवन में व्यवधान.
अनजाने में ले लिया, मंत्र का इम्तिहान,
किया आव्हान सूर्य का, मिला पुत्र संतान.
मात बनी विवाह बिना, डर गई लोक लाज,
नहीं खबर घर में करी, क्या कहेगा समाज.
परेशान हो बंद कर, छोड़ा गंगा धार,
हाथ लगा बहता हुआ, रथी वसुसेन पार.
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तेजस्वी सुत पल गया, राधा अधिरथ पूत,
दानवीर धनुर्धर को, बोलें कर्ण सपूत.
राज हस्तिनापुर रहा, शांतनु बने प्रधान,
शासक वीर प्रसिद्ध थे, आस पास में मान.
पीड़ा शांतनु काम की, मानी शर्त मल्लाह,
रही प्रतिज्ञा भीष्म की, नहीं करेंगे ब्याह.
चित्रांगद के अनुज रहे, विचित्रवीर्य नाम,
नाविक पुत्री सुत मिले, गए अल्पायु राम.
वंश चलाने के लिए, किया अनुरोध व्यास,
अंबालिका व अंबिका, सुत थे पांडु धृतराष्ट्र.
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नेत्रहीन धृतराष्ट्र थे, रहे पांडु कमजोर,
दासी संतति विदुर जी, कहें राय पुरजोर.
गांधारी पत्नी रही, साथी बन धृतराष्ट्र,
पति से सहानुभूति में, पट्टी बांधी टाट.
भाई गांधारी रहा, शकुनि अनुज का नाम,
उसे कष्ट बहु भॉंति थे, बदला लेना काम.
नाना छल उसने रचे, बने पांडु युवराज,
जीजा राजा ना बना, आदर नहीं समाज.
राज हस्तिनापुर दिया, पांडु एक ही नाम,
नहीं कहीं विरोध हुआ, नेत्रहीन की खाम.
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रचा स्वयंवर भोज ने, आए राजकुमार,
कृपा, आशीश भीष्म की, खुशियों की भरमार.
कुंती वरती पांडु को, डाला भीष्म प्रभाव,
रानी बन कर आ गई, दिखता नहीं अभाव.
माद्री भी पत्नी बनी, कुमारी मद्र देश,
भाई उसके शल्य थे, प्रिय थी गदा विशेष.
पिकनिक करते पांडु को, दिखे ऋषि रति विचार,
भूल पांडु से हो गई, ऋषि पर किया प्रहार.
ऋषि ने श्राप पांडु दिया, कर न सकें सहवास,
यही कमी उसकी रही, बाधा बनी प्रवास.
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कुंती संतति के लिए, मंत्र दुर्वासा जाप,
धर्मराज, पवनदेव दें, युधिष्ठिर, भीम आप.
इंद्र दिए वर रूप में, प्रिय अर्जुन संतान,
माद्री को भी कह सकी, आश्विनी आव्हान.
बहना माद्री ने जने, नकुल और सहदेव,
जुड़वां दोनों पल रहे, पिता पांडु थे देव.
वन विहार में पांडु को, चढ़ा काम आवेग,
माद्री थी सहवास में, शाप दिखाया नेग.
निधन पांडु का हो गया, माद्री माने दोष,
सती हुई पति साथ में, कुंती करती रोष.
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राजा बन धृतराष्ट्र ने, मानी भीष्म सलाह,
शिक्षा सब को एक सी, गुरू द्रोण की राह.
सभी सुतों को पालते, रख उनमें सम भाव,
संतति सभी निपुण बनें, रहे ना कुछ अभाव.
एक ग्लानि मन में रही, इसका राजा अंध,
राय मान कर वह चले, लगे सदा प्रतिबंध.
कुंती भी स्वीकारती, सिंहासन धृतराष्ट्र,
कोई नहीं विरोध था, दुर्योधन युवराज.
बेटा दुर्योधन चुना, अपना राजकुमार,
बड़े युधिष्ठिर को तजा, बिना किसी प्रतिकार.
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जलने दुर्योधन लगा, देख पांडव बुद्धि,
उसकी अकल घूम गई, पनपी जब दुर्बुद्धि.
रही शत्रुता भीम से, दोनों गदा प्रवीर,
विष मिलाया भोजन में, फेंका नदिया नीर,
बेहोशी में भीम गए, तल नदिया पाताल,
नाग लोक स्वागत करे, उसकी थी ननिहाल.
दस सहस्त्र गज बल मिला, नाग लोक उपहार,
वापस आकर मात ने, खूब लुटाया प्यार.
मामा शकुनी रच रहे, कुरु वंश में प्रपंच,
नाना विधि से छल करें, नहीं तनिक भी रंच.
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रचा स्वयंवर द्रुपद ने, अग्नि सुता का प्यार,
पांचों पाण्डव साथ में, लिए कन्हैया यार.
खुश खबरी दी मात को, लाए सुंदर चीज,
बिन देखे आदेश दे, बांट लो मिल अजीज.
पूरी बात पता लगी, मिले उसे पति पॉंच,
चाह द्रौपदी की रही, नाना गुण मिल साॅंच.
छीनें राज पांडव से, अपने पासे डाल,
बुला युधिष्ठिर को लिया, शौक द्यूत का पाल.
हारे पांडव द्यूत में, सारे भाई, राज,
लगी द्रौपदी दाॅंव पर, देखे सकल समाज.
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सभी बड़े मौजूद थे, पर दिखते लाचार.
छल से हर कर शकुनि ने, किया गलत व्यवहार.
राज सभा में कर्ण ने, उस से कहा दुराव,
पहले से पति पांच हैं, छठा यार प्रस्ताव.
शर्त बदल कर उन्हें दिया, बारह साल प्रवास,
एक साल अज्ञात रहें, नहीं तो फिर प्रयास.
कुंती ने बनवास में, चुना सुतों का साथ,
बच्चों को आशीश का, सिर पर रखती हाथ.
एक साल का बाद में, रहा अज्ञातवास,
विदुर किया अनुरोध तो, उसके घर में वास.
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बीत गया बनवास भी, नहीं पा सके राज,
नहीं कुछ प्रतिरोध हुआ, धरता मौन समाज.
समझाने को चल दिए, शांति दूत बन श्याम,
दिखा रूप विराट दिया, बना नहीं कुछ काम.
सेनापति पितामह थे, जानें कुंती राज,
वंचित कर्ण युद्ध रखा, दुर्योधन नाराज.
बाद पितामह द्रोण थे, योद्धा कौरव राज,
कर्ण वहां सैनिक बने, आहत पांडु समाज.
कौरव शिविर कुंती थी, घायल कर्ण इलाज,
नकुल सहदेव साथ ले, रूप चिकित्सक राज.
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ममता अपने पुत्र की, सारे पुत्र समान,
लोक लाज में ना कहे, बड़ा कर्ण को मान.
विनती करती कर्ण से, हते न उसके लाल,
अर्जुन केवल लक्ष्य है, शेष सुरक्षित काल.
माता कुंती एक दिन, गई कर्ण के पास,
राय इंद्र ने दी उसे, ऐसा था विश्वास.
इन्द्र छलते कर्ण से, कवच अभेद्य मांग,
भूल सब नि:शस्त्र गया, अर्जुन हरते प्रान.
तर्पण समर बाद करें, पूर्वज का युवराज,
कुंती तब घोषित करे, अनुज तुम धर्मराज.
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पूछें कुंती से सभी, कह देती वह राज,
अग्रज कहती कर्ण को, पहना देते ताज.
राज महल में आ गई, दे पुत्रों को प्यार,
काफी समय बीत गया, सिंहासन परिवार.
राय विदुर से मिल गई, जाएं तीरथ आप,
गांधारी धृतराष्ट्र भी, वन में धोने पाप.
ज्ञान युधिष्ठिर को दिया, विदुर हुए विलीन,
राज कर्म पूरा हुआ, छोड़े गुरुजन तीन.
आग लगी वन वास में, तीनों लिए लपेट,
कुंती तन का अंत हो, आत्मा मन का पेट.
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ममता की मूरत रही, कुंती उसका नाम,
नाम अमर इतिहास में, याद रखेंगे काम.
एक सीख ले लीजिए, जांच नहीं वरदान,
गलती अनजाने हुई, दुर्वासा अपमान.
करी जांच कुंती नहीं, सूर्य का आव्हान,
महाभारत टल सकता, होनी है बलवान.
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