Monday, 23 February 2026

अश्वत्थामा चरित - 55


अश्वत्थामा चरित - माता कृपाचार्य की बहन कृपी और पिता द्रोणाचार्य. द्रोणाचार्य भारद्वाज ऋषि और घृताची अप्सरा के पुत्र थे. अश्वत्थामा सप्त चिरंजीवियों में से एक. अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, और परशुराम. 
माना जाता है कि ये दिव्य शक्तियों से संपन्न हैं और आज भी पृथ्वी पर मौजूद हैं. 

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मिले द्रोण भरद्वाज को, दिया पिता का नाम, 
बनी घृताची अप्सरा, उनकी माता नाम.

उनकी शादी कृपी से, कृपाचार्य थे भ्रात, 
सुत अश्वत्थामा हुआ, करे गरीबी बात.

मणि मस्तक पर थी लगी, दिखी जन्म के साथ , 
वीर महान बहुत रहा, सीख पिता के हाथ.

करती रक्षा वह सदा, दानव, किन्नर दैत्य, 
पिता उसे अजेय कहें, सबको जीते ध्येय.

सुत को दूध मिला नहीं, होते द्रोण निराश, 
हाल गरीबी देख कर, करें नौकरी आस.
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चावल घोल पिला दिया, छोटा लाल अबोध,
नहीं सामर्थ्य कुछ रही, हृदय अपराध बोध.

निर्धन बामन द्रोण थे, नहीं जीविका पास,
तब गुरु भाई भीष्म ने, दी जीवन की आस.

ब्राह्मण करता चाकरी, भीष्म राज दरबार,
शिक्षा को सम्मान दे, युवराज हुए उदार.

पा नाम देवव्रत का, बड़ा हुआ युवराज,
परशुराम शिक्षा दिए, योद्धा बना समाज. 

नाविक सुता सत्यवती, कर ले प्रणय विचार, 
शासक उसके लाल हो, मिले पहला अधिकार.
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भीष्म कहते ठान लिया, नहीं करूं मैं ब्याह,
उसके सुत जल्दी मरे, करी व्यास से चाह.

सहमत नहीं व्यास रहे, पर माता आदेश,
अंधे, दुर्बल सुत रहे, विदुर नीति संदेश.

कौरव, पांडव सुत हुए, शासन का अधिकार,
चुना भीष्म ने द्रोण को, शिक्षा का आधार.

राज सुतों के साथ ही, शिक्षा पाता लाल,
अस्त्र-शस्त्र वह सीखता, कोई नहीं मलाल.

द्रुपद राजकुमार रहे, पिता पृषत पांचाल,
कंपाला के राज का, पृषति होते लाल. 
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आश्रम भारद्वाज रहा, द्रुपद पाते ज्ञान,
शिक्षा पाते द्रोण भी, सहपाठी थे मान.

मीत दोनों द्रोण, द्रुपद, आश्रम में थे यार,
द्रोण बहुत गरीब रहे, द्रुपद राज कुमार.

बड़े हुए, अंतर मिला, राजा जनता साथ,
समझ उपेक्षा द्रोण ने, चढ़ा उपहास माथ.

वैरी बनते काल वश, कभी रहे जो मीत,
पद, वैभव, पैसा मिला, बढ़ा वैर जग रीत.

शिक्षण चुनते द्रोण तब, जीवन का आधार,
सीखें शासन लाल सब, भीष्म बृहत परिवार.
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शिक्षा सुत को भी दिए, शांतनु वंशज साथ,
भीम, युधिष्ठिर साथ में, दुर्योधन का हाथ.

सारी शिक्षा लाल को, सिखा दिया उपयोग,
ज्ञान सभी हथियार का, अनुपम शक्ति प्रयोग.

मीत बनाया हो युवा, कौरव राजकुमार,
पांडव से विवाद हुआ, जो शासन हकदार.

बड़ा तपस्वी वह रहा, पा ब्रह्मा वरदान,
नहीं किसी से मर सके, अद्भुत मणि का मान.

बहुत प्रेम करते पिता, उनका उस पर विश्वास,
मात पिता का लाड़ला, उससे जीवन श्वास.
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राज नहीं पांडव मिले, ना माना युवराज, 
हारे कृष्ण समझा कर, होता चकित समाज.

युद्ध बिना कुछ भी नहीं, उसका सारा राज,
सेना ले कर कृष्ण से, छोड़ श्याम युवराज.

अश्वत्थामा भी लड़ा, कौरव सेना साथ, 
सेनापति भीष्म रहे, द्रोण, जयद्रथ हाथ.

चक्र व्यूह में फंस गया, एक अभिमन्यु वीर, 
योद्धा सात घेर लिए, हरते जीवन पीर.

द्रुपद सुत धृष्टद्युम्न था, पांचाली का भ्रात,
वह भी महाभारत में, लड़ता पांडव साथ.
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कूटनीति थी कृष्ण की, मरवाया गजराज, 
अश्वत्थामा मर गया, कह रहे धर्म राज.

अश्वत्थामा पर टिका, पिता द्रोण विश्वास,
अर्धसत्य युधिष्ठिर कह, तोड़ी जीवन श्वास.

धृष्टद्युम्न सर काट कर, गुरू द्रोण का अंत,
बेटे ने बदला लिया, युद्ध बाद में हंत.

बाद द्रोण के कर्ण ने, पा सेनापति भार,
घोर लड़ाई वह लड़ा, गया मृत्यु के द्वार.

सत्रह दिन में युद्ध का, अंत कर्ण के साथ,
शल्य, शकुनि को भी मिला, सेना नायक हाथ.
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नायक अगले दिन बने, अर्जुन के गुरु भ्रात,
युद्ध भयंकर हो रहा, बचे चार ही साथ.

अश्वत्थामा को मिली, रण की बुझती जोत, 
व्यापक विचित्र शांति थी, नाच रही थी मौत.

समर भूमि में शव दिखें, रहे कभी थे वीर,
प्राण छोड़ कर चल बसे, थे निर्जीव शरीर.

हाल समर का देखता, बर्बरीक का शीश,
उसे काट लटका दिया, दे अपना आशीश. 

दुर्योधन तब कर रहा, प्रायश्चित इतिहास,
पांडव अब होंगे मगन, रहे विजय अहसास.
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नेता गड़ता शर्म से, चला नदी विश्राम,
श्वास रोक आसन लिया, जल समाधि अभिराम.

याद प्रतिज्ञा को करे, सौ कौरव संहार,
भीम ने निर्देश लिए, माधव का उपकार.

गदा युद्ध ललकार कर, भीम करते प्रहार, 
दुर्योधन विकलांग कर, बना दिया लाचार. 

अश्वत्थामा मित्र को, दिया वचन इस बार,
मैं पांडवों से ले लूं, आज रात प्रतिकार.

विजय रात्रि को चल दिए, कृष्ण नदी के तीर,
पांडव दें श्रद्धांजली, हते समर में वीर.
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सोए थे उस रात को, सब पांडव संतान,
शिविर में गैर हाजिरी, दिखते पिता समान.

धृष्टद्युम्न को मार कर, चला शिविर की ओर, 
पांचों पांडव सुतों के, शीश काट कर भोर.

पता लगा जब भ्रम हुआ, उसको होता खेद,
लक्ष्य हुआ पूरा नहीं, दिखा नहीं कुछ भेद.

लौटे पांडव शिविर में, देखा हाहाकार,
उलटे पैर निकल पड़े, किस का अत्याचार.

समझाया जब कृष्ण ने, अश्वत्थामा कृत्य,
जब तक मणि मस्तक रहे, गुरु पुत्र नहीं वध्य.
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दोषी पांचाली रहा, उसे दंड अधिकार,
जीवित कृपी पुत्र रहे, माता का चीत्कार.

सबकी यह सहमति बनी, मस्तक मणि निकाल,
घायल कर छोड़ा उसे, क्रन्दन हो विकराल.

वह तभी से घूम रहा, सहता सारी पीर,
दें कर जीवन द्रौपदी, कष्ट दिया गंभीर.

अब वह मर सकता नहीं, हो गया चिरंजीव,
अद्भुत एक वीर हुआ, पाया विचित्र नसीब.

गणना उसकी सात में, बलि, व्यास, परशुराम,
कृपा, हनु, विभीषण सहित, अश्वत्थामा नाम.
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Wednesday, 4 February 2026

जामवंत चरित - 57



जामवंत चरित - 57 

  जामवंत को ब्रह्मा का अंशावतार और अग्नि पुत्र कहा जाता है, जिन्हें अमर होने का वरदान प्राप्त था. सतयुग में वामन अवतार, त्रेता युग में राम और द्वापरयुग में कृष्ण जी के काल में उनकी उपस्थिति का उल्लेख है. इन्हें *ऋक्षराज* भी कहा जाता है. यह भी कहा जाता है कि वह ब्रह्मा जी की जमुहाई से उत्पन्न हुए थे, और बहुत बलवान थे. वह अग्नि देव और गंधर्व कन्या के पुत्र कहे जाते हैं. उनकी पत्नी का नाम जयवंती था. जामवंती उनकी पुत्री थी, जो बाद में श्री कृष्ण की पत्नी बनीं. नारद और हिमवत उनके भाई कहे जाते हैं.


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ब्रह्मा की संतति हुए, मानव में भगवंत,
मिला नाम संसार में, सब कहें जामवंत.

दैवी पुरुष बोल कर, सब करते सम्मान,
अष्ट चिरंजीवी गिनें, दीर्घायु वरदान. 

ब्रह्मा जमुहाई लिए, प्रकट हुई संतान,
रूप विलक्षण मिल गया, इस वेश भगवान.

माता जयवंती कहें, नारद, हिमवत भ्रात,
भालू लगते सभी को, रही सोच अज्ञात.

ऋक्षराज बन हो बड़े, जग में करते नाम,
त्रेता, द्वापर युग रहे, बने भक्त प्रभु राम.
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कहते अग्नि देव पिता, अति बली जन्म जात, 
मात कहें गंधर्व को, सुनी सुनाई बात. 

अधिक आयु थी राम से, कहते वानर जात,
वेद, शास्त्र, पुराण के, ज्ञाता रहे विख्यात.

कहते अमर उन्हें सभी, युगों में योगदान,
लोहा उनका मानते, कहें सभी विद्वान.

सतयुग के भी मिल रहे, आज भी कुछ प्रमाण, 
किस्से उनके तेज के, करते सब सम्मान.

रहे उपस्थित यज्ञ में, कराते असुर राज, 
पौत्र रहे प्रह्लाद के, बालि यजमान आज. 
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भांपा अपनी बुद्धि से, वामन का वरदान,
सब देवों का हो भला, असुरों का कल्यान.

वामन ने दो पग रखे, मांग बालि से दान,
तब तक जामवंत करें, धरा के सात ध्यान.

चक्र सात में नख लगा, महामेरु शीर्ष पाप,
शिखर भंग जब हो गया, दिया बलहीन श्राप,

अनुपम बल उनका कहे, नहीं उचित अभिमान,
फौरन बूढ़े बन गए, लिया बुद्धि प्रतिदान.

द्वापर युग में महान था, प्रभु राम का नाम, 
उनको भी सहयोग दे, कुछ यादगार काम.
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जामवंत उसको मिले, करें समझ की बात,
बनते सचिव सुग्रीव के, हर उसका आपात.

मयदानव का पुत्र था, रहा दुंदुभी नाम,
भाई था मंदोदरी, आतंकी बदनाम.

गज दस हज़ार का बली, रखता भैंसा रूप,
तप कर शिव से वर लिया, था अभिमान अनूप.

सागर व हिमवान ने, उकसाया अभिमान,
समर बालि से वह करे, तभी बढ़ेगी शान.

मुष्टिक एक प्रहार कर, बालि ने किया अंत,
शव उस का उछाल दिया, फेंका आश्रम संत.
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आश्रम रहा मतंग का, रिष्यमूक आधार, 
श्राप बालि को ऋषि दिया, निषिद्ध योजन चार.

बालि के गलत कोप से, थे सुग्रीव भयभीत,
लिया लाभ तब श्राप का, जा कर बसे सप्रीत.

ऋषि आश्रम में सेविका, शबरी उसका नाम,
कहें मतंग अंत समय, सेवा करना राम.

कहना तब तुम राम से, गमन गिरि रिष्यमूक,
हो सुग्रीव से मित्रता, करो प्रयास अचूक.

जामवंत उसको मिलें, करें समझ की बात,
जो हों सचिव सुग्रीव के, हर उसका आपात.
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बल, बुद्धि के योग रहे, ऋक्षराज जामवंत, 
धैर्य सहित थी वीरता, बात कहें श्रीमंत.

मंत्री बने सुग्रीव के, मिला साथ हनुमान, 
बाली को प्रवेश नहीं, रिष्यमूक का स्थान.

सीता को हर ले गया, रावण दैत्य महान,
राम लखन थे खोजते, वन बाग परेशान.

घटनाएं घटीं उसी तरह, विधि जो रचा विधान, दर्शन शबरी को हुए, ज्यों पा ली भगवान.

शबरी से मिल कर बढ़े, रिष्यमूक की राह, 
मार्ग में हनुमान मिले, दर्शन जिनकी चाह.
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बाली वध के बाद में, राजा बने सुग्रीव,
जामवंत को सचिव चुन, सीता सुध संजीव.

वानर सेना साथ में, ले कर जटायु राय,
दक्षिण में वह सब चले, सागर तट पर आय.

सागर देखा सामने, सेना हुई हताश,
पार उसे कैसे करें, जामवंत की आश.

देखा तब हनुमान को, कर साहस संचार,
क्षमता याद दिला उन्हें, कर लो सागर पार.

ऊर्जा बचपन में दिखी, गुरु जन थे हैरान,
शाप क्रोध में तब दिया, शक्ति भूल हनुमान.
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विनती करते केसरी, कम प्रभाव हो जाय, 
वापस उसे शक्ति मिले, कोई याद दिलाय.

जामवंत ने तब कहा, जीवन का उद्देश्य,
अर्पित राम काज करो, एकमात्र हो ध्येय.

सागर पार कूद चले, लंका में हनुमान,
सीता मिल, लंका जला, रखा विभीषण मान.

वानर लंका जा सकें, रचना सेतु उपाय, 
जामवंत ने तब कहा, पूजन हित आचार्य.

पहले पूजा कर सकें, लंकेश इंतजाम,  
जामवंत लाए बुला, सफल किया अंजाम.
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युद्ध राम से जब हुआ, वीर भिड़ा लंकेश, 
रावण मूर्छित हो गया, मुष्टिक एक संदेश.

अधिक आयु के बाद भी, उसकी शक्ति अपार,
चाह अधूरी रह गई, देखे रावण हार.

समझ राम फौरन गए, शेष अभी अभिमान.
द्वापर युग में लड़ सकें, दिया उन्हें वरदान.

लंबी आयु उन्हें मिली, निरखी लीला राम,
त्रेता से द्वापर हुआ, जीवन था निष्काम.

सत्राजित राजा रहे, द्वापर युग में खास,
सूर्य देव के भक्त थे, पा स्यंतक मणि पास.
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मणि देती सोना उसे, हर दिन तोला आठ, 
जीवन में अभाव नहीं, बड़े निराले ठाठ.

रक्षा प्रसेनजित करें, सत्राजित के भ्रात, 
उस मणि को देखें सदा, रखते अपने साथ.

एक दिन शेर ने किया, उस का काम तमाम, 
गया खोह में मणि लिए, जामवंत के धाम.

जामवंत ने मणि लखी, दिया सुता उपहार,
मणि को खिलौना समझा, जामवंती बहार.

भाई की हत्या सुनी, सत्राजित आरोप,
मणि चुराई कृष्ण ने, मोह स्वर्ण का कोप.
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धन का था अभाव नहीं, व्यर्थ लांछन श्याम,
खोजा मणि को खोह में, करो नहीं बदनाम.

जामवंत से भिड़ गए, पूर्व जन्म के राम, 
दिन अठाइस समर चली, पूरी इच्छा काम.

अंत में पहचान लिया, श्याम राम के रूप,
शरण का निवेदन किया, सुता नहीं अनुरूप.

अपनाई जामवंती, दिए अनेकों तर्क,
बड़ी तो रुक्मिणी रही, उससे रखा न फर्क.

मणि वापस सत्राजित को, नहीं करी स्वीकार,
बेटी सत्यभामा दे, मणि अद्भुत उपहार.
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दोनों रानी श्याम की, मणि का बनता फेर, 
नहीं अभाव स्वर्ण कभी, काल चक्र अंधेर.

लोग आज भी कह रहे, जामवंत बलवान,
बीच हमारे रह रहे, अदृश्य रूप भगवान.
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