Wednesday, 10 December 2025

उर्मिला चरित - 62

  
    उर्मिला चरित - 62

उर्मिला लक्ष्मण (शेषनाग के रूप) की पत्नी, सीता की छोटी बहन व राजा जनक व सुनयना की बेटी थी. जनक के छोटे भाई कुश ध्वज थे, जिनकी पत्नी चंद्रभागा व पुत्रियां मांडवी व श्रुति कीर्ति थीं. वह सांकस्य के राजा थे. उन्हें नागलक्ष्मी या क्षीरसागरा का अवतार भी कहते हैं. उनका जन्म जया एकादशी को हुआ था.
     रामायण समाप्त होने पर सीता, मांडवी व श्रुति कीर्ति के जाने के बाद उर्मिला ने बच्चों को अच्छे संस्कार दे कर सरयू में समाधि ली थी. अंगद व चंद्र केतु उसके पुत्र थे. अंगद को करुपाधेश राज्य का राजा बनाया गया था. चंद्रकेतु को माल्या राज्य का राजा बनाया गया था. 
    संवेदनशीलता, दयालुता, आत्म-समर्पण, शांत स्वभाव, सकारात्मकता, आत्मविश्वास, रचनात्मकता, मंजूरी देने की क्षमता, निष्ठा व अपेक्षा उसकी चारित्रिक विशेषताएं हैं. 
   
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पढ़ते हम इतिहास में, चार युगों का काल,
सतयुग, त्रेता, द्वापर के, बाद कलियुग धमाल.

त्रेता काल विशेष है, सभी करो अभिमान, 
मिथिला नगरी के हुए, राजा जनक महान.

बड़े तपस्वी जनक थे, धन दौलत से दूर, 
नहीं कष्ट कोई सहे, ना कोई मजबूर.

उनकी रानी सुनयना, चाहे इक संतान,
दो बेटी उनको मिलीं, सुंदर रूपवान.

नाम बड़ी का जानकी, बाद उर्मिला जान, 
साथ रहीं, युवती बनीं, थीं बहुत बुद्धिमान.
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पाख उजाला माघ का, जया इकाशी बोल, 
सीता भगिनी उर्मिला, रखें बात का मोल.

क्षीरसागरा भी कहें, दूजा उसका नाम,
नागलक्ष्मी कहें उसे, परिचय बोले काम.

जनक अनुज कुशध्वज रहे, राज करें सांकस्य, 
बेटी उनकी मांडवी, बहन श्रुतिकीर्ति तस्य.

चारों बहनें साथ में, विदुषी एक समान,
शिक्षा ज्ञान था एक सा, होती साथ जवान.

बड़ी हुईं, चिंता बढ़ी, करते जनक विचार,
कौन, कहां, कब वर मिले, शादी को तैयार.
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दशरथ राजा अवध के, पाए चार कुमार,
लछमन, शत्रुघ्न भ्रात थे, भगवन, भरत उदार.

दशरथ से ऋषि मांगते, उनके राजकुमार,
तप में उनकी हो मदद, दानव का संहार.

पुत्र प्रेम दशरथ रहा, मन में था विषाद,
दी राय गुरु वशिष्ठ ने, भर पाया आह्लाद.

आए मिथिला राज में, विश्वामित्र के साथ,
राम, लखन सुत अवध से, रहे जगत के नाथ.

सीता हित स्वयंवर था, हो भंग शिव पिनाक,
वरण करे, वह सफल हो, रखे जनक की नाक.
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आमंत्रित मिथिला रहे, सब जगह के कुमार, 
अवसर पाया राम ने, किया जनक उद्धार.

दशरथ आए अवध से, ले पूरी बारात,
देख भरत सौमित्र को, हृदय न प्रेम समात.

चार भाई देख कर, करते जनक विचार,
बन जाएं यह वर अगर, मेरा हो उद्धार.

पहले समय रही प्रथा, गुरु सुझाव स्वीकार, 
राजा भी मानें उसे, करें नहीं इनकार.

सहमति दशरथ की हुई, मिथिला हर्ष अपार,
चारों बहनें खुश दिखें, आपस बढ़ता प्यार.
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सीता मिलती राम को, उर्मिला लखन पास,
रही भरत की मांडवी, अनुज श्रुति कीर्ति दास.

चारों बहनें आ गईं, साथ अयोध्या धाम,
दशरथ तो राजा रहे, रहे युवराज राम.

मिल जुल कर सब रह रहे, हुआ सुखी परिवार,
जनता भी खुशहाल थी, उचित सभी व्यवहार.

काल चक्र ऐसा चला, हुआ सब उलट फेर,
कैकेई मत्थे चढ़ा, घटनाओं का शेर.

दशरथ के लंबित रहे , दो वरदान उधार,
समय देख कर मांगती, राम करें वन प्यार.
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चौदह वर्ष जंगल में, सुत हो राजकुमार,
हामी भरी मजबूर हो, पिता वचन का प्यार.

सीता पति के संग थी, भाई लखन उदास,
पत्नी देखूं या करूं, सद्विचार का नास.

मलिन उर्मिला थी नहीं, मुख दिखता उत्साह, 
प्रसन्न मन से दूं विदा, दिल की थी यह चाह.

कारण उसको ज्ञात था, क्यों पाया अवतार,
साधारण नारी नहीं, स्वागत को तैयार.

आए स्वामी भुवन में, दिखा थाल में दीप,
उत्साहित थी उर्मिला, लगता लक्ष्य समीप.
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आशा और विश्वास से, लखन मांगते नीर,
पत्नी की सहमति मिली, भूले सारी पीर.

जल लिए उर्मिला सुने, चौदह वर्ष इंतजार,
फौरन पा उठ चल पड़े, वन गमन समाचार.

एक कहानी यह कहे, था उर्मिल कर नीर,
चौदह वर्ष खड़ी रही, हरती भव की पीर.

मिले कथा इतिहास में, मेघनाद वरदान,
जागा चौदह वर्ष जो, बिना नींद आव्हान.

नींद उर्मिला पा गई, लखन नींद के साथ, 
सोती थी सारे समय, हो नाश मेघनाथ. 
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जाग रहे प्रभु भक्ति में, दिया नींद को त्याग,
अविरल सेवा वह करें, सदा राम का राग.

हरण जानकी का हुआ, बुला मारीच राम,
लंकापति रावण धरा, साधु वेश अभिराम.

सीता को थे खोजते, दोनों भाई खिन्न, 
शबरी मिलती मार्ग में, दोनों हुए प्रसन्न.

पता मिला हनुमान का, मदद करें सुग्रीव, 
जामवंत की विद्वता, सेना बने सजीव.

बालि मार कर चल पड़े, सीता जी की खोज,  
रामेश्वर सेतु बना, भरते सेना ओज.
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मेघनाद ने तप किया, पाई शक्ति अचूक,
समर भूमि में लखन पर, वीर घातिनी मूक.
 
गिरे लखन रण भूमि पर, मचता हाहाकार,
चाहा ले चलूं इसको, करें पिता जयकार.

राम दुखी हो कर रहे, भीषण रुदन, विलाप,
रखा लखन सिर गोद में, कह दो उपाय आप.

राय विभीषण से मिली, हनुमत कहें सुषेन,
फौरन दो संजीवनी, बीत न पाए रैन.

हनुमत भेजें राम ने, लाओ बूटी द्रोण,
पूरा पर्वत उठा ले, उड़े अवध की ओर.
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हनुमत उड़ते देख कर, करते भरत विचार,
कहीं निशाचर रात में, अद्भुत करे विहार.

उसे गिराने के लिए, भरत छोड़ते तीर,
राम राम कह घायल हुए, उड़ते हनुमत वीर.

पीड़ा में ही कह गए, घटना क्रम इतिहास,
दुखी अवध जनता हुई, माता का विश्वास.

ढाढस भेजें राम को, भेजूं दोनों भ्रात,
दिखा विश्वास उर्मिला, करें विश्राम तात.

लखन अहित संभव नहीं, मम पतिव्रत महान, 
उनका सिर प्रभु गोद में, यह है उनकी शान.
-----50
सूर्योदय होगा नहीं, ना बीते यह रात, 
दो दिवस आराम करें, चिंता की क्या बात.

समझी पति की वेदना, रहा समय आभास,
फिर भी मन में दिख रहा, गजब आत्म विश्वास.

विदा किया हनुमान को, प्रार्थना पति स्वास्थ्य, 
पूरी निष्ठा पति रही, वह उसके आराध्य.

सकुशल आए लखन जब, सीता दीदी साथ,
जोश भरा स्वागत किया, ले कर पति का हाथ.

सीता संग लव कुश थे, रहा राम दरबार,
उन्हें राम को सौंप कर, धरा को नमस्कार.
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सीता सुत पालन किया, जैसे अपनी जान,
भगिनी सुत अंतर नहीं, ज्यों खुद की संतान,

उसे मिले पति लखन से, दो कुमार अवधेश.
चंद्रकेतु, अंगद बसे, माल्या, करुपाधेश.

काल, राम की भेंट में, कोई नहीं प्रवेश,
मृत्यु दंड पाए लखन, दुर्वासा का वेश.

सीता बाद लखन गए, पालन कर्ता धाम,
क्षीरसिन्धु मौजूद थे, जब आएंगे राम.

चारों भ्रात के सुत को, सौंपे उनके देश, 
भरत, सौमित्र साथ में, बैकुंठ में प्रवेश.
-----60
गई उर्मिला साथ में, तज देती यह लोक,
नाम अमर उसका हुआ, नहीं किसी को शोक.

माता, पत्नी साथ में, छोड़ अयोध्या धाम, 
बैठे राम विमान में, सभी करें विश्राम.
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Sunday, 14 September 2025

दुर्वासा चरित - 65


  1⃣ 4⃣ - 0⃣ 9⃣ - 2⃣ 5⃣

        आज, आप की सेवा में स्वरचित *दुर्वासा चरित* के सभी 6⃣ 5⃣ दोहे एक साथ प्रस्तुत हैं : -

*ब्रह्मा जी के सुत रहे, मिला दुर्वासा नाम,
शिव जी के अवतार भी, रहा क्रोध ऋषि काम.

अनुसूया माता रहीं, अत्रि पिता संसार,
ज्ञान जगत का ले लिया, साथ में अहंकार.

दत्तात्रेय, चंद्र रहे, दुर्वासा के भ्रात,
मिला नहीं प्रमाण कहीं, कहे अंत की बात.

और्व ऋषि भ्रमण करें, पुत्री कदली साथ,
दुर्वासा से बात कर, देते उसका हाथ.

क्रोधी दोनों ही रहे, पर सौ गुनाह माफ, 
पत्नी सोती रह गई, पूजा मुहूर्त साफ.
-----5
दुर्वासा ने श्राप से, किया क्रोध का अंत, 
कदली बदली राख में, नहीं काम वह संत. 

देवों से आशीश पा, कदली हुई महान, 
पूजा उसकी सब करें, बिना बीज वरदान.

अंत लखन में भूमिका, ऋषि वर योगदान,
काल चक्र कारण बना, लखन स्वर्ग आव्हान.

सीता बाद गमन करें, लखन अधिक प्रिय भ्रात,
अनुमति नहीं कोई सुने, गुप्त राम की बात.

पहरा देते लखन थे, दुर्वासा का आदेश,
ध्यान अयोध्या हित धरा, अंदर किया प्रवेश, 
----10
दंड कहें अपराध का, रहा नियति का खेल,
लखन जा बैकुंठ बसें, रच देवों का मेल.

दिया श्राप महादेव को, तजें जटा का रूप, 
चाहें अंबा से मिलन, बनें जगत के भूप.

दुर्वासा ने भेंट में, इंद्र दिया इक हार,
डाल ऐरावत गले, कर दिया तिरस्कार.

क्रोधित दुर्वासा हुए, दिया इंद्र को श्राप,
नहीं संपदा साथ हो, साथ रहेंगे पाप.

शक्ति हीन देवता बने, असुर राज हथियाय, 
विष्णु से की प्रार्थना, हमको लेउ बचाय.
------15
सागर मंथन में मिला, अमरत का परसाद, 
केवल देवों को दिया, करते असुर फसाद.

देव लोक की अप्सरा, विचर रही आकाश,  
पुंजिकस्थला नाम रहा, निकली ऋषि के पास, 

ऋषि तप में बाधा पड़ी, दुर्वासा का क्रोध,
बन जाए वह वानरी, तभी अपराध बोध. 

उस ने तप शिव का किया, पाया यह वरदान,
दिया जन्म शिवांश को, रहा नाम हनुमान.

कृष्ण रुक्मिणी घूमते, अपनी शादी बाद,
दुर्वासा आश्रम में, ले लें आशीर्वाद.
----20
दिया निमंत्रण महल में, आ कर दें आशीश,
शर्त रखी रथ हो अलग, अश्व द्वारकाधीश.

लगी प्यास जब राह में, श्याम निकाली धार,
पांव लगाया भूमि में, ऐसा जल तैयार.

श्राप दिया तब क्रोध में, मिलें न बारह साल,
राजा, रानी अलग हों, कुदरत करे कमाल.

खेद रुक्मिणी को हुआ, बारह वर्ष वियोग,
सागर को छोड़ा नहीं, खारे जल का रोग.

पांव लगाने से हुआ, दुर्वासा से वैर,
कारण होगा अंत का, वही श्याम का पैर.
-----25
एक बार द्वारका में, ऋषि आए बरसात,
अतिथि नहीं उन को कहे, स्वागत से घबरात. 

घूम रहे तो मिल गए, महल द्वारकाधीश, 
अलग झोंपड़ी बोल दी, तब देंगे आशीश.

आग लगा कर आ गए, अतिथि का अधिकार,
खीर पकाए रुक्मिणी, तब स्वागत स्वीकार.

थोड़ा खा कर फेंक दी, ऊपर श्याम शरीर, 
पूरे बदन इसे मलो, ऋषिवर कहते पीर.

तलवे छोड़ कान्हा मले, पैर पर ना प्रसाद,
बोले दुर्वासा तभी, रहा कवच अपवाद.
----30
इस कारण तब भील ने, किया श्याम का अंत, 
लिया तीर उस पैर में, तजे प्रान भगवंत.

अंबरीष के अतिथि बन, राजन तप में लीन,
एकादशी का व्रत रखा, द्वादशी पारण बीन.

दुर्वासा आए वहां, भोजन का आव्हान,
पारण पहले अतिथि से, रहा काल विधान.

प्रकट जटा कृत्या करी, हो नाश अंबरीष, 
राजन भक्ति विपति हरे, छोड़ सुदर्शन ईश.

कृत्या का संहार कर, चक्र चला ऋषि ओर, 
करें देव सब प्रार्थना, दुर्वासा को छोड़.
-----35
हू-हू इक गंधर्व था, पूर्व जन्म का हाल,
करता ठिठोली मुनि से, श्राप करे बेहाल.

दुर्वासा तप कर रहे, हू-हू आया राह, 
अनजाने टकरा गया, उसे बनाते ग्राह. 

हो जाएगा मगर वह, रहता सागर तीर,
हरि दर्शन का वर दिया, हर कर उसकी पीर.

इंद्रद्युम्न जब तप करे, सत्कार गया भूल,
जड़मति होकर गज बने, ग्रसे ग्राह का मूल.

मुक्ति दे, उद्धार किया, इंद्रद्युम्न कल्यान,
नाम मिला जय विजय का, ईश्वर का वरदान.
----40
माता होती मेनका, रही कण्व के पास, 
पिता विश्वामित्र रहे, नहीं मिलन की आस.

यौवन में उसको हुआ, प्यार राज दुष्यंत,   
गर्भवती वह हो गई, चिंतन गहन अनंत.

दुर्वासा जा घूमते, आश्रम कण्व पधार,
चिंतित रही शकुन्तला, ना करा नमस्कार. 

दुर्वासा ने क्रोध में, दिया बालिका श्राप,
भूलेगा राजा तुझे, याद रखो यह पाप.

करें कण्व जब प्रार्थना, बने ऋषि दयावान,
आए याद उसे जहां, देखे प्रेम निशान.
-----45
सरवर में मुद्रिका गिरी, गई बुझाने प्यास, 
मछुआरे ने ला दिखा, दुष्यंत रखी आस.

गलत पाठ सुन वेद का, करे शारदा हास,
नदी छोड़ मानव बने, कटु वचनों का त्रास.

इसी तरह की बात कुछ, होती गंगा साथ,
बहन पार्वती ने कहा, फेंको जल नर माथ.

इस विधि से वह कर सके, शिव जी को प्रसन्न, 
किया टोटका बहन ने, दुर्वासा अवसन्न.

शापित तब गंगा हुई, बनी नीर की धार, 
नदी रूप बहती रहे, पाए सब का प्यार.
----50
देते नहीं शाप सदा, अक्सर दें वरदान, 
दुर्वासा के चित्त का, नहीं किसी को भान.

प्रसन्न यदि किसी पर हों, कर दें कृपा अपार, 
अद्भुत वर समृद्ध करें, भरें खुशी भंडार.

एक बार पधारे, कुंत भोज के द्वार, 
कुंती ने सेवा करी, दी आशीश अपार.

ऋषिवर ने कुंती दिया, खास एक वरदान,
मंत्र जाप से हो सके, किसी देव का ध्यान. 

कुंती थी तब बालिका, कुंवारी नादान, 
अनजाने में कर लिया, परीक्षण का निशान.
-----55
विनय जिज्ञासा में करी, सूर्य देव आव्हान.
उसे सूर्य ने दे दिया, पुत्र प्राप्ति वरदान. 

रहे कुवारी बालिका, जन कितनी संतान,
दुर्वासा ने साथ में, उसे दिया वरदान.

दुर्वासा प्रसन्न हुए, हो द्रौपदी अक्षीर, 
करें मदद मुसीबत में, हरी चीर की पीर. 

पांडव थे बनवास में, लाए शिष्य हजार,
दुर्योधन की चाल थी, दुर्वासा दें खार.

तप से पाई द्रौपदी, भोजन का भंडार,
अक्षय पात्र के रूप में, मिला उसे उपहार.
-----60
आ कर बोले स्नान करूं, भोजन की हो रीत,
जीम द्रौपदी तब चुकी, अक्षय पात्र भी रीत.

याद द्रौपदी कृष्ण करे, चखा लगा इक पात,
पेट भरा सब शिष्य का, टाल दिया अपघात.

लीन रहा भगवान में, दुर्वासा का रूप,
चाहे जहां भ्रमण करें, सब देवों के भूप.

बनता कारण क्रोध का, सब जग में पहचान,
फिर भी उन के तेज से, रहा कौन अनजान.

दुर्वासा के निधन का, मिलता नहीं प्रमान,
नाम अमर फिर भी हुआ, करते सब सम्मान.
-----65*
  
   इस शृंखला को पूरे मनोयोग से पढ़ने व सराहने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार.  जो मित्र किसी कारणवश इसे पूरा न पढ़ सके हों, उनकी सुविधा के लिए इस शृंखला के सभी *65* दोहे एक साथ पोस्ट किए जा रहे हैं.

 सादर. 
   🌹💐🙏

Friday, 25 July 2025

विनय की सेवा निवृत्ति


विनय की सेवानिवृत्ति 


लाल विनय ने कर दिया, घर में आज कमाल, 
खेल खेल में कर लिए, पूरे षट्दश साल.


बीसलपुर का परिवार रहा, जिसमें जन्म लिए विनय जहां.
झांकी वाले सारे कहते, बड़े रौब से वहां पर रहते.
बाग बगीचे उनके होते, खेत खलिहान माली जोते.
पापा पीलीभीत पधारे, तभी विनय भाई अवतारे.
पहले से चार बहनें पाईं, मिले एक बड़े से भाई.
माता जी से लाड़ लड़ाते, सभी लोग उन्हें दुलराते.
शम्मू भैया उन्हें बुलाते, बाल सुलभ हरकत दुहराते.
माता जी घुटने की रोगी, मीठी दवा समझ कर भोगी.
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मुखड़ा लाल था, बुखार लगा, दिखा वैद्य को रोग भगा.
आए बरेली, भाई कारण, चले स्कूल कष्ट निवारण.
सिटी पार्क में नाम लिखाया, मामी संग स्कूल जाया.
होते कक्षा पांच में फेल, कला विषय था सबका खेल.
फेल छात्र को मिला दाखिला, छठी क्लास में फिर गुल खिला.
छात्र रहे मेधावी सुंदर, सभी शिक्षकों की रहती नजर.
अपनी क्लास में प्रथम रहते, पढ़ने में डांट खा लेते. 
होम वर्क ना रहता बाकी, खेल कूद में रुचियां जागी.
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हाई स्कूल में प्रथम आए, घर भर में धाक जमाए.
राजकीय स्कूल की पढ़ाई, भली समझ में उसकी आई.
इसी बीच था लक्ष्य सामने, इंजीनियर से कम न माने.
श्रेणी प्रथम वहां भी आई, बरेली कालेज अपनाई.
लगातार वह प्रयास करते, कंप्टीशन में आगे रहते.
एम. एन. आर. उनको भाया, यांत्रिकी में नंबर आया.
छात्रालय में करी पढ़ाई, रीत जगत ने वहां सिखाई.
बड़ौदा में ट्रेनिंग पाई, चुर्क जा नौकरी निभाई.
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बी.पी.सी.एल. उनको भाई, मुंबई नगरी उन्हें सुहाई.
पास बड़ौदा के वह लगती, मात-पिता को तसल्ली करती.
रहे साथ के लोग मिल कर, करते मस्ती नहीं कहीं डर.
समझी घर की जिम्मेदारी, देखी बहनें सभी कुंवारी,
क्षेत्र बदल कर चले बरेली, कालोनी में फ़्लैट ले ली.
तीन बहन का ब्याह रचाया, मन वांछित साथी पाया.
निन्यानवे में पिता सिधारे, शोकातुर थे बच्चे सारे.
छोड़ बरेली आए मथुरा, नौकरी में घर पाए सुथरा.
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रितु वहां पर घर में आई, सारे घर में रौनक छाई, 
रुड़की में हुआ तबादला, आई वर्तिका भाग्य बदला, 
प्रतिमा की शादी करवाई, अपना घर कानपुर बसाई.
काल चक्र से मुंबई आए, कालोनी में घर वह पाए,
फिर आई रिषिका महारानी, सबसे गुणी, हुई बिरानी,
समय समय प्रोमोशन पाते, बोली में नम्रता लाते,
अब हो रहे वरिष्ठ साठ के, बसें जहां रहें ठाठ से,
बिटियों की शादी हो जाए, रहें सुखी, पति के संग जाएं.
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सुखी रहें हर हाल में, अपने प्यारे भ्रात,
पत्नी संग मौज करें, सबसे अच्छी बात.

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कुंती चरित - 68




     कुंती चरित : -


द्वापर युग की बात है, प्रसिद्ध राजा भोज,
उनकी कन्या थी पृथा, पूजा करती रोज.

सेवा करती अतिथि की, श्रद्धा, भक्ति अपार,
रूपवती, गुण, सुन्दरी, सबका पाय दुलार.

अक्सर ऋषि आते दिखें, राजा जी के राज,
सेवा कुंती कर रही, पूरी निष्ठा, लाज.

एक बार की बात है, मिले दुर्वासा भोज.
स्वागत, सम्मान कर दिया, कुंती लाई खोज.

सेवा से प्रसन्न हुए, कुंती पाई मंत्र,
करे आव्हान किसी का, मिले देवता यंत्र. 
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आ कर कोई देवता, दे जाए आशीश, 
प्रसन्न कुंती हो गई, दर्शन की बक्शीश.

मंत्र परीक्षा सोच कर, हो जाती हैरान,
जांच करी यदि मंत्र की, जीवन में व्यवधान.

अनजाने में ले लिया, मंत्र का इम्तिहान, 
किया आव्हान सूर्य का, मिला पुत्र संतान.

मात बनी विवाह बिना, डर गई लोक लाज,
नहीं खबर घर में करी, क्या कहेगा समाज.

परेशान हो बंद कर, छोड़ा गंगा धार, 
हाथ लगा बहता हुआ, रथी वसुसेन पार.
------10
तेजस्वी सुत पल गया, राधा अधिरथ पूत,
दानवीर धनुर्धर को, बोलें कर्ण सपूत.

राज हस्तिनापुर रहा, शांतनु बने प्रधान,
शासक वीर प्रसिद्ध थे, आस पास में मान.

पीड़ा शांतनु काम की, मानी शर्त मल्लाह,
रही प्रतिज्ञा भीष्म की, नहीं करेंगे ब्याह.

चित्रांगद के अनुज रहे, विचित्रवीर्य नाम, 
नाविक पुत्री सुत मिले, गए अल्पायु राम.

वंश चलाने के लिए, किया अनुरोध व्यास,
अंबालिका व अंबिका, सुत थे पांडु धृतराष्ट्र.
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नेत्रहीन धृतराष्ट्र थे, रहे पांडु कमजोर,
दासी संतति विदुर जी, कहें राय पुरजोर.

गांधारी पत्नी रही, साथी बन धृतराष्ट्र,
पति से सहानुभूति में, पट्टी बांधी टाट.

भाई गांधारी रहा, शकुनि अनुज का नाम,
उसे कष्ट बहु भॉंति थे, बदला लेना काम.

नाना छल उसने रचे, बने पांडु  युवराज,
जीजा राजा ना बना, आदर नहीं समाज.

राज हस्तिनापुर दिया, पांडु एक ही नाम,
नहीं कहीं विरोध हुआ, नेत्रहीन की खाम.
------20
रचा स्वयंवर भोज ने, आए राजकुमार,
कृपा, आशीश भीष्म की, खुशियों की भरमार.

कुंती वरती पांडु को, डाला भीष्म प्रभाव,
रानी बन कर आ गई, दिखता नहीं अभाव.

माद्री भी पत्नी बनी, कुमारी मद्र देश,
भाई उसके शल्य थे, प्रिय थी गदा विशेष.

पिकनिक करते पांडु को, दिखे ऋषि रति विचार,
भूल पांडु से हो गई, ऋषि पर किया प्रहार.  

ऋषि ने श्राप पांडु दिया, कर न सकें सहवास,
यही कमी उसकी रही, बाधा बनी प्रवास. 
------25
कुंती संतति के लिए, मंत्र दुर्वासा जाप,
धर्मराज, पवनदेव दें, युधिष्ठिर, भीम आप.

इंद्र दिए वर रूप में, प्रिय अर्जुन संतान,
माद्री को भी कह सकी, आश्विनी आव्हान.

बहना माद्री ने जने, नकुल और सहदेव,
जुड़वां दोनों पल रहे, पिता पांडु थे देव.

वन विहार में पांडु को, चढ़ा काम आवेग,
माद्री थी सहवास में, शाप दिखाया नेग.

निधन पांडु का हो गया, माद्री माने दोष, 
सती हुई पति साथ में, कुंती करती रोष.
------30
राजा बन धृतराष्ट्र ने, मानी भीष्म सलाह,
शिक्षा सब को एक सी, गुरू द्रोण की राह.

सभी सुतों को पालते, रख उनमें सम भाव,
संतति सभी निपुण बनें, रहे ना कुछ अभाव.

एक ग्लानि मन में रही, इसका राजा अंध,
राय मान कर वह चले, लगे सदा प्रतिबंध.

कुंती भी स्वीकारती, सिंहासन धृतराष्ट्र,  
कोई नहीं विरोध था, दुर्योधन युवराज.

बेटा दुर्योधन चुना, अपना राजकुमार,
बड़े युधिष्ठिर को तजा, बिना किसी प्रतिकार.
----35
जलने दुर्योधन लगा, देख पांडव बुद्धि,
उसकी अकल घूम गई, पनपी जब दुर्बुद्धि. 

रही शत्रुता भीम से, दोनों गदा प्रवीर, 
विष मिलाया भोजन में, फेंका नदिया नीर, 

बेहोशी में भीम गए, तल नदिया पाताल,
नाग लोक स्वागत करे, उसकी थी ननिहाल.

दस सहस्त्र गज बल मिला, नाग लोक उपहार,
वापस आकर मात ने, खूब लुटाया प्यार.

मामा शकुनी रच रहे, कुरु वंश में प्रपंच,
नाना विधि से छल करें, नहीं तनिक भी रंच.
-----40
रचा स्वयंवर द्रुपद ने, अग्नि सुता का प्यार,
पांचों पाण्डव साथ में, लिए कन्हैया यार.

खुश खबरी दी मात को, लाए सुंदर चीज,
बिन देखे आदेश दे, बांट लो मिल अजीज.

पूरी बात पता लगी, मिले उसे पति पॉंच,
चाह द्रौपदी की रही, नाना गुण मिल साॅंच.

छीनें राज पांडव से, अपने पासे डाल,
बुला युधिष्ठिर को लिया, शौक द्यूत का पाल.

हारे पांडव द्यूत में, सारे भाई, राज,
लगी द्रौपदी दाॅंव पर, देखे सकल समाज.
-----45
सभी बड़े मौजूद थे, पर दिखते लाचार.
छल से हर कर शकुनि ने, किया गलत व्यवहार.

राज सभा में कर्ण ने, उस से कहा दुराव,
पहले से पति पांच हैं, छठा यार प्रस्ताव.

शर्त बदल कर उन्हें दिया, बारह साल प्रवास,
एक साल अज्ञात रहें, नहीं तो फिर प्रयास.

कुंती ने बनवास में, चुना सुतों का साथ, 
बच्चों को आशीश का, सिर पर रखती हाथ.

एक साल का बाद में, रहा अज्ञातवास,
विदुर किया अनुरोध तो, उसके घर में वास.
----50
बीत गया बनवास भी, नहीं पा सके राज, 
नहीं कुछ प्रतिरोध हुआ, धरता मौन समाज.

समझाने को चल दिए, शांति दूत बन श्याम, 
दिखा रूप विराट दिया, बना नहीं कुछ काम.

सेनापति पितामह थे, जानें कुंती राज,
वंचित कर्ण युद्ध रखा, दुर्योधन नाराज.

बाद पितामह द्रोण थे, योद्धा कौरव राज,
कर्ण वहां सैनिक बने, आहत पांडु समाज.

कौरव शिविर कुंती थी, घायल कर्ण इलाज,
नकुल सहदेव साथ ले, रूप चिकित्सक राज.
-----55
ममता अपने पुत्र की, सारे पुत्र समान, 
लोक लाज में ना कहे, बड़ा कर्ण को मान.

विनती करती कर्ण से, हते न उसके लाल,
अर्जुन केवल लक्ष्य है, शेष सुरक्षित काल.

माता कुंती एक दिन, गई कर्ण के पास,
राय इंद्र ने दी उसे, ऐसा था विश्वास.

इन्द्र छलते कर्ण से, कवच अभेद्य मांग,
भूल सब नि:शस्त्र गया, अर्जुन हरते प्रान.

तर्पण समर बाद करें, पूर्वज का युवराज,
कुंती तब घोषित करे, अनुज तुम धर्मराज.
----60
पूछें कुंती से सभी, कह देती वह राज, 
अग्रज कहती कर्ण को, पहना देते ताज.

राज महल में आ गई, दे पुत्रों को प्यार,
काफी समय बीत गया, सिंहासन परिवार. 

राय विदुर से मिल गई, जाएं तीरथ आप,
गांधारी धृतराष्ट्र भी, वन में धोने पाप.

ज्ञान युधिष्ठिर को दिया, विदुर हुए विलीन,  
राज कर्म पूरा हुआ, छोड़े गुरुजन तीन.

आग लगी वन वास में, तीनों लिए लपेट, 
कुंती तन का अंत हो, आत्मा मन का पेट.
-----65
ममता की मूरत रही, कुंती उसका नाम,
नाम अमर इतिहास में, याद रखेंगे काम.

एक सीख ले लीजिए, जांच नहीं वरदान,
गलती अनजाने हुई, दुर्वासा अपमान.

करी जांच कुंती नहीं, सूर्य का आव्हान, 
महाभारत टल सकता, होनी है बलवान.
-----

Friday, 6 June 2025

कुंती चरित - 68

*कुंती चरित : -

द्वापर युग की बात है, प्रसिद्ध राजा भोज,
उनकी कन्या थी पृथा, पूजा करती रोज.

सेवा करती अतिथि की, श्रद्धा, भक्ति अपार,
रूपवती, गुण, सुन्दरी, सबका पाय दुलार.

अक्सर ऋषि आते दिखें, राजा जी के राज,
सेवा कुंती कर रही, पूरी निष्ठा, लाज.

एक बार की बात है, मिले दुर्वासा भोज.
स्वागत, सम्मान कर दिया, कुंती लाई खोज.

सेवा से प्रसन्न हुए, कुंती पाई मंत्र,
करे आव्हान किसी का, मिले देवता यंत्र. 
-----
आ कर कोई देवता, दे जाए आशीश, 
प्रसन्न कुंती हो गई, दर्शन की बक्शीश.

मंत्र परीक्षा सोच कर, हो जाती हैरान,
जांच करी यदि मंत्र की, जीवन में व्यवधान.

अनजाने में ले लिया, मंत्र का इम्तिहान, 
किया आव्हान सूर्य का, मिला पुत्र संतान.

मात बनी विवाह बिना, डर गई लोक लाज,
नहीं खबर घर में करी, क्या कहेगा समाज.

परेशान हो बंद कर, छोड़ा गंगा धार, 
हाथ लगा बहता हुआ, रथी वसुसेन पार.
------10
तेजस्वी सुत पल गया, राधा अधिरथ पूत,
दानवीर धनुर्धर को, बोलें कर्ण सपूत.

राज हस्तिनापुर रहा, शांतनु बने प्रधान,
शासक वीर प्रसिद्ध थे, आस पास में मान.

पीड़ा शांतनु काम की, मानी शर्त मल्लाह,
रही प्रतिज्ञा भीष्म की, नहीं करेंगे ब्याह.

चित्रांगद के अनुज रहे, विचित्रवीर्य नाम, 
नाविक पुत्री सुत मिले, गए अल्पायु राम.

वंश चलाने के लिए, किया अनुरोध व्यास,
अंबालिका व अंबिका, सुत थे पांडु धृतराष्ट्र.
-------
नेत्रहीन धृतराष्ट्र थे, रहे पांडु कमजोर,
दासी संतति विदुर जी, कहें राय पुरजोर.

गांधारी पत्नी रही, साथी बन धृतराष्ट्र,
पति से सहानुभूति में, पट्टी बांधी टाट.

भाई गांधारी रहा, शकुनि अनुज का नाम,
उसे कष्ट बहु भॉंति थे, बदला लेना काम.

नाना छल उसने रचे, बने पांडु  युवराज,
जीजा राजा ना बना, आदर नहीं समाज.

राज हस्तिनापुर दिया, पांडु एक ही नाम,
नहीं कहीं विरोध हुआ, नेत्रहीन की खाम.
------20
रचा स्वयंवर भोज ने, आए राजकुमार,
कृपा, आशीश भीष्म की, खुशियों की भरमार.

कुंती वरती पांडु को, डाला भीष्म प्रभाव,
रानी बन कर आ गई, दिखता नहीं अभाव.

माद्री भी पत्नी बनी, कुमारी मद्र देश,
भाई उसके शल्य थे, प्रिय थी गदा विशेष.

पिकनिक करते पांडु को, दिखे ऋषि रति विचार,
भूल पांडु से हो गई, ऋषि पर किया प्रहार.  

ऋषि ने श्राप पांडु दिया, कर न सकें सहवास,
यही कमी उसकी रही, बाधा बनी प्रवास. 
------25
कुंती संतति के लिए, मंत्र दुर्वासा जाप,
धर्मराज, पवनदेव दें, युधिष्ठिर, भीम आप.

इंद्र दिए वर रूप में, प्रिय अर्जुन संतान,
माद्री को भी कह सकी, आश्विनी आव्हान.

बहना माद्री ने जने, नकुल और सहदेव,
जुड़वां दोनों पल रहे, पिता पांडु थे देव.

वन विहार में पांडु को, चढ़ा काम आवेग,
माद्री थी सहवास में, शाप दिखाया नेग.

निधन पांडु का हो गया, माद्री माने दोष, 
सती हुई पति साथ में, कुंती करती रोष.
------30
राजा बन धृतराष्ट्र ने, मानी भीष्म सलाह,
शिक्षा सब को एक सी, गुरू द्रोण की राह.

सभी सुतों को पालते, रख उनमें सम भाव,
संतति सभी निपुण बनें, रहे ना कुछ अभाव.

एक ग्लानि मन में रही, इसका राजा अंध,
राय मान कर वह चले, लगे सदा प्रतिबंध.

कुंती भी स्वीकारती, सिंहासन धृतराष्ट्र,  
कोई नहीं विरोध था, दुर्योधन युवराज.

बेटा दुर्योधन चुना, अपना राजकुमार,
बड़े युधिष्ठिर को तजा, बिना किसी प्रतिकार.
----35
जलने दुर्योधन लगा, देख पांडव बुद्धि,
उसकी अकल घूम गई, पनपी जब दुर्बुद्धि. 

रही शत्रुता भीम से, दोनों गदा प्रवीर, 
विष मिलाया भोजन में, फेंका नदिया नीर, 

बेहोशी में भीम गए, तल नदिया पाताल,
नाग लोक स्वागत करे, उसकी थी ननिहाल.

दस सहस्त्र गज बल मिला, नाग लोक उपहार,
वापस आकर मात ने, खूब लुटाया प्यार.

मामा शकुनी रच रहे, कुरु वंश में प्रपंच,
नाना विधि से छल करें, नहीं तनिक भी रंच.
-----40
रचा स्वयंवर द्रुपद ने, अग्नि सुता का प्यार,
पांचों पाण्डव साथ में, लिए कन्हैया यार.

खुश खबरी दी मात को, लाए सुंदर चीज,
बिन देखे आदेश दे, बांट लो मिल अजीज.

पूरी बात पता लगी, मिले उसे पति पॉंच,
चाह द्रौपदी की रही, नाना गुण मिल साॅंच.

छीनें राज पांडव से, अपने पासे डाल,
बुला युधिष्ठिर को लिया, शौक द्यूत का पाल.

हारे पांडव द्यूत में, सारे भाई, राज,
लगी द्रौपदी दाॅंव पर, देखे सकल समाज.
-----45
सभी बड़े मौजूद थे, पर दिखते लाचार.
छल से हर कर शकुनि ने, किया गलत व्यवहार.

राज सभा में कर्ण ने, उस से कहा दुराव,
पहले से पति पांच हैं, छठा यार प्रस्ताव.

शर्त बदल कर उन्हें दिया, बारह साल प्रवास,
एक साल अज्ञात रहें, नहीं तो फिर प्रयास.

कुंती ने बनवास में, चुना सुतों का साथ, 
बच्चों को आशीश का, सिर पर रखती हाथ.

एक साल का बाद में, रहा अज्ञातवास,
विदुर किया अनुरोध तो, उसके घर में वास.
----50
बीत गया बनवास भी, नहीं पा सके राज, 
नहीं कुछ प्रतिरोध हुआ, धरता मौन समाज.

समझाने को चल दिए, शांति दूत बन श्याम, 
दिखा रूप विराट दिया, बना नहीं कुछ काम.

सेनापति पितामह थे, जानें कुंती राज,
वंचित कर्ण युद्ध रखा, दुर्योधन नाराज.

बाद पितामह द्रोण थे, योद्धा कौरव राज,
कर्ण वहां सैनिक बने, आहत पांडु समाज.

कौरव शिविर कुंती थी, घायल कर्ण इलाज,
नकुल सहदेव साथ ले, रूप चिकित्सक राज.
-----55
ममता अपने पुत्र की, सारे पुत्र समान, 
लोक लाज में ना कहे, बड़ा कर्ण को मान.

विनती करती कर्ण से, हते न उसके लाल,
अर्जुन केवल लक्ष्य है, शेष सुरक्षित काल.

माता कुंती एक दिन, गई कर्ण के पास,
राय इंद्र ने दी उसे, ऐसा था विश्वास.

इन्द्र छलते कर्ण से, कवच अभेद्य मांग,
भूल सब नि:शस्त्र गया, अर्जुन हरते प्रान.

तर्पण समर बाद करें, पूर्वज का युवराज,
कुंती तब घोषित करे, अनुज तुम धर्मराज.
----60
पूछें कुंती से सभी, कह देती वह राज, 
अग्रज कहती कर्ण को, पहना देते ताज.

राज महल में आ गई, दे पुत्रों को प्यार,
काफी समय बीत गया, सिंहासन परिवार. 

राय विदुर से मिल गई, जाएं तीरथ आप,
गांधारी धृतराष्ट्र भी, वन में धोने पाप.

ज्ञान युधिष्ठिर को दिया, विदुर हुए विलीन,  
राज कर्म पूरा हुआ, छोड़े गुरुजन तीन.

आग लगी वन वास में, तीनों लिए लपेट, 
कुंती तन का अंत हो, आत्मा मन का पेट.
-----65
ममता की मूरत रही, कुंती उसका नाम,
नाम अमर इतिहास में, याद रखेंगे काम.

एक सीख ले लीजिए, जांच नहीं वरदान,
गलती अनजाने हुई, दुर्वासा अपमान.

करी जांच कुंती नहीं, सूर्य का आव्हान, 
महाभारत टल सकता, होनी है बलवान.
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Sunday, 9 March 2025

विदुर चरित - 60


विदुर चरित 
---
बात रही इतिहास की, शांतनु का था राज, 
राजन हस्तिनापुर के, होता सुखी समाज.

राजा की इच्छा जगी, बढ़ा काम का वेग,
मोहित गंगा पर हुए, दिखा नदी आवेग.

गंगा ने प्रस्ताव पर, कह दी अपनी बात,
राजा कुछ पूछे नहीं, वरना छोड़ूं साथ.

बेटे सात बहा दिए, गंगा जी की धार,
पूछ सके राजा नहीं, दिया ना पुत्र प्यार.

अष्टम सुत के जन्म पर, राजा तोड़ा शोक,
उसे छोड़ गंगा गई, वापस अपने लोक.
-----5
तेजवान बालक बड़ा, देवव्रत रखा नाम,
भीष्म नाम बोला गया, जानो उसके काम.

कन्या एक और दिखी, मोहित होते राज,
पता चला जब बाद में, नाविक रहा समाज.

कामातुर शांतनु कहें, कन्या कर दो दान,
शर्त पिता उसके रखे, राज करे संतान.

शंका नाविक ने करी, संतति करती चाह,
भीष्म तब लें शपथ कहें, जीवन में न विवाह.

सत्यवती सुंदर रही, राजा हुए उदास,
पता भीष्म को जब चला, नहीं राज की आस.
----10
दो सुत सत्यवती जने, बड़े चित्रांगद नाम, 
विचित्रवीर्य अनुज हुए, पिता गए गोधाम.

काशिराज विवाह रचा, अपनी कन्या तीन,
जा कर भीष्म हरे उन्हें, हित था भाई दीन. 

अंबा वा अंबालिका, रही अंबिका संग,
लाए अपने साथ में, छुए न उनके अंग.

अंबा चाहे और को, वापस कर सम्मान, 
स्वीकारा ना प्रेम ने, वापस सह अपमान.  

मना भीष्म ने कर दिया, हुआ बुरा जब हाल,
मैं अब मरने जा रही, बनूं बाद में काल.
-----15
दोनों भाई भी मरे, बिना किसी संतान,
वंश चलाने के लिए, किया व्यास आव्हान.

नयन बंद कर अंबिका, नेत्रहीन धृतराष्ट्र,
पीत हुई अंबालिका, पांडु देखते राष्ट्र.

दासी भेजी रानियां, अगली बार प्रयास,
भक्ति भाव से वह गई, ऋषि व्यास के पास.

दासी सुत को मिल गया, विदुर भक्त का नाम,
नहीं राज में रुचि रही, जपते हरदम राम.

व्यास पिता थे विदुर के, भीष्म चाचा समान,
दासी नाम परीश्रमी, नहीं मिला सम्मान.
----20
बचपन से करते रहे, उनकी रक्षा भीष्म,
तीनों बंधु अलग रहे, ज्यों बेर,आम, नीम.

शिक्षा, दीक्षा सम रही, सभी गुण का विकास,
शेष रही मानसिकता, संतति समझें दास.

बुद्धि, बल, सहनशीलता, सारी उसके पास,
मान भीष्म समान उन्हें, राज सभा की आस.

कौरव, पांडव सब कहें, काका विदुर महान,
खड़ी समस्या जब हुई, वही बचाते जान.

राज सभा ने विदुर को, दिया खास सम्मान,
माना महामंत्री उन्हें, दे कर प्रमुख स्थान.
----25
नीति, तर्क, प्रस्ताव रहे, हरदम उनके पास,
गलत बात को काट दें, कर विरोध, विश्वास.

बाद निधन के पांडु के, धृतराष्ट्र लें कमान,
अग्रज होने से उन्हें, मिला पूर्ण सम्मान.

निष्ठा से धृतराष्ट्र ने, देखा अपना राज,
महासचिव उनको बना, हर्षित हुआ समाज.
   
पैनी नजर विदुर रखें, गतिविधि चारों ओर,
घटना कहीं घटित हो, मिले सूचना फोर.

दिखा खोट नीयत लगा, ईर्ष्या थी संतान,
बच्चे खेलें साथ में, गुरुजन रखते ध्यान.
----30
शत कौरव धृतराष्ट्र सुत, दुर्योधन का मान,
उन के अग्रज युधिष्ठिर, नीति धर्म सम्मान.

मानें कौरव यह सदा, राजा उनके बाप,
करते बाल शरारतें, मन में रख कर पाप.

भीष्म, द्रोण थे राज में, पाते नहीं नकार,
राजा का खाया नमक, उसके भागीदार.

बढ़ता उन का हौसला, देते शकुनि सलाह,
राजा भी लाचार थे, पुत्र मोह था राह.

अपने भांजे के लिए, शकुनि रचें षड्यंत्र,
दुर्योधन का हित लखें, मिलता शासन तंत्र.
----35
अग्रज दुर्योधन रखे, सदा वैर का भाव,
सीमा लांघ कुमार ने, अनुचित जमा प्रभाव.

लाक्षागृह बनवा दिया, रखी योजना गुप्त,
पता विदुर को चल गया, पांडव होते लुप्त.

उनके जीवन के लिए, बनवा गुप्त मार्ग,   
सीमा पार कुंती को, भेज दिए सब भाग.

मदद सही की वह करें, रखें इरादे नेक,
प्रतिनिधि राजसभा बने, सीमा रहीं अनेक.

राजकुमार बहुत करे, चाचा का अपमान,
सिंहासन के साथ थे, दासी सुत प्रमान.
----40
सत्ता से बाहर रखे, था प्रयास हर बार,
बटवारे के भाग को, हड़पें राजकुमार.

रहा बहाना द्यूत का, शकुनि खेलते दांव,
राज सभा भी देख ले, छल के अपने पांव.

चीर हरण पर खिन्नता, द्यूत पर भी विरोध,
आगे उसके झुक गए, बिना किसी प्रतिरोध.

कहने पर माना नहीं, जिद्दी राज कुमार, 
क्रोध दिला, अनुचित कहे, बात वह लगातार.

बारह वर्ष वन में रखा, ले पत्नी को साथ,
सहमत नहीं भाग मिले, रहा शकुनि का हाथ.
-----45
रोक कुन्ती को लिया, पांडव लें बनवास,
राज महल में ना रहें, प्रस्तुत है आवास.

मान रखा धृतराष्ट्र का, दे अग्रज सम्मान,
किया विरोध अनुचित का, रख कर अपना मान.

पांडव भेजें कृष्ण को, दूर करें अवरोध.
खोजें हल ऐसा कहीं, बिना अधिक विरोध.

अपनी बात अड़ा रहा, बिना समर नहिं राज,
अपमानित कर कृष्ण को, छोड़ी सबकी लाज.

दर्शन विराट रूप के, देते खुद भगवान,
भीष्म, विदुर लें समझ, नहीं युवराज भान.
-----50
सरल हृदय के विदुर को, पची नहीं यह बात,
राजनीति से दूर हो, बाहर रातों रात.

मिलने कृष्ण चले गए, विदुरानी के पास,
छिलके केले खा लिए, रखा बुआ विश्वास.

गलत जिद के विरोध में, रहे युद्ध से दूर,
महाभारत लड़े नहीं, रखी नज़र भरपूर.

निर्णय निकला समर का, गए पांडव जीत,
गांधारी सुत सब मरे, नाना वीर शहीद.

राज युधिष्ठिर को मिला, किया धर्म से राज,
सुखी प्रजा सारी रही, हर्षित सकल समाज.
-----55
राज पाट को छोड़ कर, थामा भाई हाथ, 
विदुर तीर्थ यात्रा चले, भाई, भाभी साथ.

गांधारी, कुंती, विदुर, चले धृतराष्ट्र साथ,
आश्रम में ऋषि व्यास के, करें सत्संग बात.

मान राय भगवान की, मिलने चले सम्राट,
दर्शन पूर्वज के करें, सभी जोहते बाट.

धर्मराज को ज्ञान दें, सभी नीति का सार, 
सूक्ष्म शरीर घुस गया, सम्राट के दिल पार.

रहा उद्देश्य तीर्थ का, कर लें जीवन अंत,
नमन आज हम सब करें, विदुर समकक्ष संत.
-----60



 




मंदोदरी चरित - 64


मंदोदरी चरित : -

मिले पुराणों में कथा, दैवी कन्या मान,
शिव जी के आशीश से, मायासुर संतान.

मायासुर दानव रहा, असुर का महाराज,
पत्नी हेमा साथ में, संभाल रही राज.

हेमा रहती भक्ति में, शिव चरणों में लीन, 
पुत्री रही मंदोदरी, सब गुणों में प्रवीन.

एक बार की बात है, हुईं पार्वती क्रुद्ध,
हेमा तनया तन दिखी, शिव की भभूत शुद्ध.

उस ने गुस्से में दिया, मंदोदरी को श्राप,
बन जाए वह मेंढकी, कटें राम से पाप.
----05
अवधि शाप की कम करी, शिव की मानी राय, 
परशुराम थे खोजते, रावण हेतु उपाय,

बारह साल की अवधि तक, चले मेंढकी श्राप,
सघन वनों में वह रही, काटे अपना पाप.

परशुराम से भेंट में, मिलता नारी रूप, 
कृपा पार्वती की रही, पाए गुण अनूप.

मयदानव को दे दिया, लालन पालन भार,
हेमा ने मन से दिए, सभी भले संस्कार.

कन्या वह अद्वितीय थी, पाया सुंदर रूप,
विद्यावान के साथ ही, उसके गुण अनूप. 
-----10
उस ने करी उपासना, शिव की भक्त महान, 
हो प्रसन्न शिव ने दिया, उसको यह वरदान.

उसे पंच कन्या कहा, मिला चिर-सती मान, 
रावण से विवाह हुआ, पटरानी सम्मान.

बड़ी बहन मंदोदरी, मायासुर संतान,
धन्यमालिनी लघु रही, माना एक समान.

धन्यमालिनी साथ में, मंदोदरी की सौत,
तेजस्वी थे पुत्र भी, उनसे डरती मौत.

पति का भला विचारती, धरती हर पल ध्यान, 
गलत बात, व्यवहार हो, देती राय निदान.
----15
पूर्ण समर्पण, प्यार दे, दिल से पति को मान,
अनुपम अनिंद्य सुंदरी, बनती रावण शान.

पति-पग में निष्ठा रही, पति ही था ईमान, 
पति की थी‌ हितकारिणी, पति में बसती जान.

पालन दानव रूप में, पा समग्र संस्कार, 
लंका का वैभव मिला, उन सबको उपहार.

ऋषियों से शिक्षा मिली, पाया समुचित ज्ञान,
रावण भीषण तप करे, मिले विविध वरदान.

रावण माता कैकसी, विश्व श्रवा थे बाप,  
उसके पिता ब्राह्मण ऋषि, काटें सबके पाप.
-----20
बहुत बड़ा शिव भक्त था, अनुपम पाया ज्ञान,
काटे अपने शीश दस, पा शिव का वरदान.

लंका मांगी दान में, दो, सदा हो प्रसन्न,
दानी भोले नाथ ने, हुए बिना अवसन्न.

रची कहानी शौर्य की, भरा पूर्ण अभिमान,
देव सभी बंदी बने, तीन लोक सम्मान.

रावण माता दानवी, दुर्गुण मिले अनेक, 
ज्ञान पिता से पा लिया, गुण की मिटती रेख.

राहु, शनि और केतु थे, उसके कारावास,
महा भक्त शिव का बना, इसका था आभास.
-----25
जीता तीनों लोक को, बना काल भी दास,
आया अहंकार उसे, मंदोदरी उदास.

इस अहंकार ने किए, गलत अनेकों काम,
अनुचित के विचार बिना, लिया वैर श्रीराम.

ज़िक्र अन्य रानी मिले, जो रही विष्णु भक्त,
रावण चिढ़ा, मार दिया, नहीं हुआ आसक्त.

जिसके सुत नरांतक थे,  देवांतक और प्रहस्त,
निस्संदेह वीर रहे, रावण भी आश्वस्त.

मंदोदरी ने सुत जने, बड़ा था मेघनाद, 
अक्षय उसका अनुज था, आया उसके बाद.
------30
त्रिशरा था सुत धन्यमालिनी, अतिकाय बनी मात,
सब संतान रावण से, काल तलक घबरात.

मेघनाद को पिता ने, दिया मान युवराज,
बड़ा तपस्वी वह रहा, जीत लिया देवराज.

ऋषिगणों से ली शिक्षा, मिले कई वरदान,
मायावी शक्तियां मिलीं, आसुर शक्ति महान.

स्वामी अनुपम वर रहे, मिला तंत्र मंत्र ज्ञान,
बल साहस अद्भुत मिला, हुए वीर बलवान.

रही वीर मृदु भाषिणी, पति सेवा में लीन,
नेक राय उसकी सदा, करती पति गमगीन.
-----35
लगते उसे जहां कहीं, पति के गलत विचार, 
कोशिश करे सुधर सके, बीच था अहंकार.

बिना नाक सूपर्णखा, रावण का अपमान,
सीता हरण सुझाव का, कर विरोध जी जान.

सीता की सुध ले रहे, महावीर हनुमान,
भांपी तब मंदोदरी, घटना चक्र महान.

सेतु बांध पूजा करें, हों पंडित लंकेश, 
मंदोदरी बतला रही, जाएंगे हृदयेश.

गई साथ मंदोदरी, पूजा हो संपन्न, 
शिव लिंग रामेश्वर का, करा किया स्थापन्न.
-----40
ले कर सीता साथ में, चल पड़ी यज्ञ स्थान,
रावण भी तब कर सका, महायज्ञ अनुष्ठान.

करी प्रार्थना शारदा, दो सुबुद्धि पतिदेव,
मुक्ति दक्षिणा में कहें, राम साधना देव.

पत्नी धर्म निभा रही, चाहे पति कल्यान,
सही गलत कहती सदा, रख कर कुल का मान.

गलत बात पर टोकती, धरती ध्यान विशेष,
सहे उपेक्षा सजन की, माने सब आदेश.

माता के अधिकार का, करती उचित प्रयोग, 
शिक्षा दे कुल, नीति की, अवसर का उपयोग.
-----45
सहमत नहीं कभी हुई, नन्द छेड़ती राम,
नाक कटा कर आ गई, सूपनखा घर धाम.

सीता हरण सहमति नहीं, रावण ले कर साथ,
नहीं राय मारीच की, हो गुनाह में हाथ.

लंका में सीता रखी, उपवन अशोक छांव,
रावण दे जब त्रास का, खेल दिखा भय दांव.

हाथ पकड़ कर रोकती, जब वध को तैयार,
एक माह के समय की, रावण की मनुहार.

बार बार समझा कहे, पति से यह अनुरोध,
आग लगा लंका गए, करें नहीं प्रतिरोध.
----50
लात मार कर भ्रात को, नहीं किया कुछ ठीक,
हो बदनामी आप की, गलत पड़ेगी लीक.

रावण ने पूजा करी, बन सके वह अजेय,
पता चला हनुमान को, किया भंग अंजनेय.

अंदर से धकिया लिया, लाए रानी खींच,
देख उठा आवेश में, वध हित मुक्का भींच.

समझाया हनुमान ने, पूजन विधि संपूर्ण,
कोई भी हो प्रार्थना, पत्नी बिना अपूर्ण.

कहा विभीषण चाहिए, रावण वध का बाण,
हनुमत ज्योतिष वेश में, फूंक वचन के प्राण.
------55
अपनी बात बता कहें, जनता मन की बात,
जगा विश्वास सभी में, मंदोदरी कह जात.

पता बाण का जब लगा, हनुमत बनते मूल,
खंभ तोड़ कर बाण ले, चले मिटाने शूल. 

उसी बाण से मर गया, असुर राज लंकेश,
रावण निकट लखन गए, धर्म नीति संदेश.

आहत थी मंदोदरी, पति निधन समाचार,
फिर भी वह संतुष्ट थी, रावण बेड़ा पार.

रावण के विभीषण थे, लंका के सम्राट,
नीति धर्म से राज से, जनता का दुख बाट.
------60
असुर वंश कैसे चले, थी चिंता की बात,
किया विभीषण साथ में, पुनर्विवाह इक रात.

यह भी एक कारण था, रहे मित्रता राम,
शासन भी विधिवत चले, अमर राज्य का नाम.

राज करे मंदोदरी, छाई सुख समृद्धि,
न्याय, धर्म स्थापना, अमन चैन अभिवृद्धि.

रही पंच कन्या अमर, पाया ऋषि आशीश,
नेक काम में याद हो, करते याद गिरीश.
------