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जीवन परिचय
आज एक कथा सुनाऊँ , बोली मेरी ज़ुबान ,
आप बीती , विचित्र है , यह अनुपम दास्तान .
बड़ौदा नगर में अवतरित हुई , नन्ही एक परी ,
जीवन में जिसने आन कर , अरमानों की दुनिया भरी .
नन्हीं कली ने आँखें खोलीं , खुशियों से भर दी झोली .
सुन उसकी किल्लोल किलकारी , माता उस पर जाए वारी .
रोदन उसका करुण मैं माना , मन का भाव न फिर भी जाना .
माता उसको जनम से जानी , उसकी हर हरकत पहचानी .
बोतल का जब दूध नकारा , कालोनी माँ मच्यो हाहाकारा .
बाल सुलभ क्रीड़ा दिखलाई , मृदु मुस्कान से जिय हरषाई .
सब से मिल कर लाड़ लड़ाई , भाई से प्रीत भली निभाई .
सभी विधाओं में प्रतिभाजन कीन्हा , पूरे मनोयोग से अंत कर दीन्हा .
खेल कूद में माहिर जानी , प्रतियोगिता में न कोई सानी .
पढ़ने में जो ध्यान लगाया , मान गए सब चतुराया .
आवश्यक केवल पाठ दोहराया , बाकी सब को धता बताया .
नृत्य गान में कोचिंग लीन्हीं , सबके दिल मोहित कर लीन्हीं .
अपनाई भाषा जहाँ निवासी , मन से वहाँ की बनी प्रवासी .
गुजरात , असम की याद दिलवाई , ज्ञान तमिल का पूरा पाई .
नौकरी सारी मस्ती में बिताई , जीवन का पूरा आनंद उठाई .
एक चरण जीवन में आए , अंकित श्री जबहिं सुहाए .
शादी का निर्णय ले लीन्हा , मन मुदित हमारा कीन्हा .
चेहरे पर नूर अनोखा आया , अंकित से नव जीवन पाया .
अंकित रोहित दो सुंदर भाई , प्यार की रीत बनी बनाई .
सविनय बिनय को शीष नवावें , रश्मि जी का आभार जतावें .
करें कहाँ तक भली बड़ाई , उनसे सज्जन हम नहिं पाई .
राँची में है दृश्य अनूठा , भरत मिलाप भी पीछे छूटा .
आशाओं के अंबार लगाए , अपेक्षाओं के स्वप्न सजाए .
पाए हम उम्मीद से ज़्यादा , संशय नहीं रत्ती भर आधा .
सुंदर आयोजन वे कर पाए , हरषित भए अतिथि जो आए .
सभी संबंधी आदर पाए , मन ही मन सब मुस्काए .
अब से आपकी हो गई बेटी , मान , शान सभी समेटी .
समधी जी अनुग्रह कीन्हा , समधन ने आशिष दे दीन्हा .
उज्जवल कुल का नाम कराए , चार चाँद उसमें लगवाए .
शुभ आचरण से सबको लुभाए , सब के मन मे वो बस जाए .
पिया के मन वो भाए , जीवन का आनंद उठाए .
ऐसी शुभकामना हम दे जाएँ , व्यवहार से उसके जग हरषाए .
माँ पापा से आशिष पाए , सबके दिल में वह बस जाए .
कुल परिवार को रहे समेटे , भक्ति भाव से उन्हें लपेटे .
नित नव आशिष वह पाए , खुशियों से घर को चमकाए .
सगे संबंधी प्यार लुटाएँ , करते तारीफ़ न वो थक पाएँ .
सब का दिल वह जीत ले जाए , एक नया स्थान बनाए .
प्रसन्न दिखे , जब वो मायके आए , अंकित को ' मेहमान ' बताए .
मेहमान हमारे जब घर आवें , मुदित भाव से उन्हें रिझावें .
रहे सदा आशीष हमारी , सुखी रहे मुग्धा प्यारी .
मुक्त कंठ , नम नयन से , स्वागत करते आज ,
सफ़ल दाम्पत्य जीवन का , हो मधुर आगाज .
जीवन बने सुखी सफ़ल , रहे न कोई विषाद ,
प्रसन्न करें घर वापसी , दे कर आशीर्वाद .
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चालीसा
मुग्धा चालीसा (प्रिय मुग्धा की रजत जयंती पर)
कन्या के जन्म से जीवन साकार हो गया, वास्तविकता से परिचय और साक्षात्कार हो गया,
देख के मुखड़ा उस का , मिट गई चिंता सारी, खुशियाँ दो गुनी हो गईं, कर ली नई तैयारी,
‘ बिल्ली ‘ उस का नाम धराए, मुँह दबा कर दूध पिलाए,
दूध पीने में नखरे दिखलाए, कटोरी चम्मच तैयार कराए.
शौच निमित्त पॉटी पर बिठाए, उठ - उठ, भाग - भाग कर जाए,
रो – रो कर घर सर पे उठाए, सारे घर को नाच नचाए,
भाई से उलटी क्रियाएँ सारी, मानो विरोध की पूरी तैयारी,
बाल सुलभ क्रीडाएँ दिखलाती, सब का मन मोहित कर जाती.
मंचन, निर्देशन में रुचि दिखलाती, फैशन की नानी बन जाती,
पढ़ने लिखने में नाम कमाती, सदा कक्षा में अव्वल आती.
सबसे मेल मिलाप जतलाती, सब में लोकप्रिय बन जाती,
साहस पूर्ण दुष्कर कार्य कर आती, पूरे जोश से उसे निभाती ,
नहीं कभी भी भरमाती, अपने फंडे स्पष्ट बताती.
रूढि परंपराओं से बिलगाती, अलग से अपना स्थान बनाती ,
नृत्य, खेल में नाम कमाती, सम्भाषण में रौब जमाती,
हँस हँस कर बस से स्कूल को जाती, वापस आ कर दिन चर्या बताती.
भावुक हो कर शोक जताती, दिल से मदद को आगे आती,
जब भी रोने को आती, पूरे वेग से आँखें भर आती,
हर दल – मंडल में धाक जमाती, बच्चे – बूढ़े सब में मिल जाती,
समाज सेवा में भी आगे आती, दुखियों का दर्द मिटा जाती,
हर सँस्कृति में रम जाती, उस के सद्गुण अपनाती,
भाषा – भेद मिटा जाती, सब को प्रेम से वह अपनाती,
सभी जगह भाग्य आज़माती, पूरी शक्ति से वह जुट जाती,
सब धर्मों को सम्मान जताती, चर्च, गुरुद्वारे भी वह जाती,
मुस्लिम अपने दोस्त बनाती, असमियों के सँग बिहू गाती,
तमिल मूवी देख के आती, पंजाबी में जोक सुनाती,
नीति शास्त्र की अच्छी ज्ञाता, दर्शन धर्म उसे है भाता,
किस्से कहानी में मन रम जाता, अपनों पर स्नेह उमड़ आता,
पिकनिक, भ्रमण में नवाचरण आता, साहसिक विचार मन को भाता.
वाहन का पक्का लाइसेंस बनवाया, पर गीयर उस को समझ ना आया,
सद्भावना, स्नेह, विवेक की थाती, वाक्पटुता उस में समाती,
नर -- नारी का भेद मिटाती, सब कुछ सँभव वह कर जाती,
भक्ति, श्रृद्धा जैसे दीया और बाती, निष्ठा से सिंचित कर पाती,
अँध विश्वास को दूर भगाती, फ़ालतू बातें उसे न भातीं,
भारी विपदाएँ हँस कर सह जाती, व्यर्थ की चिंता न उसे सताती,
नए नाश्ते हमें खिलाती, साथ में कुछ भी भर कर ले जाती,
‘ कैलोरी ‘ का ध्यान दिलाती, ‘ हरित चाय ‘ सब को पिलवाती,
नव फैशन को नित अपनाती, शीशे में छबि निरखाती,
हर मुद्रा में फ़ोटो खिंचवाती, ‘ फेस बुक ‘ पर उसे सजाती,
मित्रों को ढाढस बँधवाती, सम्यक् तारीफें करती जाती,
चिंता केवल हमें सताती, बस, थोड़ी सी पतली हो जाती,
अच्छे से शादी हो जाती, जब उमर अपनी पच्चीस बताती.
रहे सुखी सदा, बसाए अपना घर सँसार, हम सब का आशीष मिलता रहे बारंबार,
नित नव कलाओं से , विकसित हुई आज की नारी, न कोई दूजी, केवल ‘ मुग्धा ’ हमारी.
- दिनेश कुमार , 11.04.2014.
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