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विरह वेदना में विकल, बेटी चली स्वगेह,
प्रेम पिता पर मानती, नम नैनों का नेह,
नम नैनों का नेह, हुलस हिया जाए,
भोजन पानी न कुछ, हलक के नीचे जाए,
पति संग प्रसन्न मन, आवे कुछ इस तरह,
विदा होन से तड़पे जिया, न सतावे विरह.
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बेटी घर की शान है, बाहर घर का मान,
बेटी से ही सुखी बने, सारा जगत जहान.
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पढ़ कर बेटी सुशिक्षित बनी, पाए पूर्ण संस्कार,
आत्म विश्वास भी बढ़ गया, जब व्यक्त हुआ व्यवहार.
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बेटी नामक जीव को, दो पूरा प्यार,
स्वयं सुखी रहे, और सूखी रखे परिवार.
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बेटी प्रेम की खान है, बनती घर की शान,
क्रीड़ा से मुदित करे, रखे लाज व मान .
रखे लाज व मान, समर्पण भाव अपनाती.
सेवा करती रात-दिन, सभी समस्या सुलझाती,
पढ़-लिख, नौकरी करती, और पकाती रोटी.
इसीलिए सुझाता, कोख़ में न मारो बेटी.
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पापा तो अब बन गए , दे दो ऐसे संस्कार
जन कर बेटी , वह भी , करे एक उपकार.
करे एक उपकार , संस्कृति को बचाए जीवे जीवन शान से , सब के मन भाए ,
लालन पालन हो ऐसा , भविष्य उस को सौंपा ,
गर्व करो , उस पर , हर्षित हो जाओ पापा .
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बेटी में गुण बहुत हैं , करो सदा सम्मान .
न रखो उपेक्षिता , अनुभव करो अभिमान ,
अनुभव करो अभिमान , उसकी कला निखारो ,
दे कर ऊँची शिक्षा , उसका जीवन सुधारो ,
बने स्वावलम्बी , कमाए अपनी रोटी ,
गर्व से बोलो , ये है मेरी प्यारी बेटी .
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बेटा – बेटा रटते रटते, भई जीव की शाम,
कहे - सुने से आ गया, करने बाकी काम,
करने बाकी काम, बैठ कर हिसाब लगाया,
किसको कितना बाटूँ, किसके हिस्से कितना आया,
व्यर्थ ही जीव भटकता, माया – मोह है लपेटा,
ऐश करोगे जीवन भर, गर, बेटी को मानो बेटा.
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